राजस्थानी चित्रकला


2. चित्रकला
राजस्थानी चित्रकला का उद्भवकाल पन्द्रहवीं शताब्दी माना जाता है। राजपूतकाल में भित्तिचित्र, पोथीचित्र, काष्ठपाट्टिका चित्र और लघुचित्र बनाने की परम्परा रही हैं। अधिकांश रियासतों के चित्र बनाने के तौर-तरीकों के स्थान के अनुसार मौलिकता और सामाजिक-राजनैतिक परिवेश के कारण अनेक चित्रशैलियों का विकास हुआ यथा-मेवाड़, मारवाड़, बून्दी, बीकानेर, जयपुर, किशनगढ़ और कोटा चित्रशैली है. राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से चित्रकला के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे।  राजपूतकालीन चित्रकला में निम्नलिखित शैलियाँ आती है -


बून्दी शैली - मेवाड़ से प्रभावित, राव सुरजन से प्रारम्भ बून्दी शैली उम्मेदसिंह के समय तक उन्नति के शिखर पर पहुँची थी। लाल, पीले रंगो की प्रचुरता, छोटा कद, प्रकृति का सतरंगी चित्रण इस चित्र शैली की विशेषता रही है। रागमाला , बारहमासा, रसिक प्रिया एवं आखेट के दृश्य इस चित्रकला के प्रमुख दृश्य है. रसिकप्रिया, कविप्रिया, बिहारी सतसई, नायक-नायिका भेद, ऋतुवर्णन बून्दी चित्रशैली के प्रमुख विषय थे। इस शैली में पशु-पक्षियों का श्रेष्ठ चित्रण हुआ है, इसलिए इसे ‘पशु पक्षियों की चित्रशैली’ भी कहा जाता है। यहाँ के चित्रकारों में सुरजन, अहमदअली, रामलाल, श्री किशन और साधुराम मुख्य थे।


मेवाड़ शैलीमेवाड़ राज्य राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन केन्द्र माना जा सकता हैं। महाराणा अमरसिंह के शासनकाल में इस चित्रशैली का अधिक विकास हुआ। लालःपीले रंग का अधिक प्रयोग, गरूड़नासिका, परवल की खड़ी फांक से नत्रे , घुमावदारवलम्बी अंगुलियां, अंलकारों की अधिकता और चेहरों की जकड़न आदि इस शैली की प्रमुख विषेशताएँ हैं। मेवाड़ शैली के चित्रों का विषय श्रीमद्भागवत्, सूरसागर, गीतगोविन्द, कृष्णलीला, दरबार के दृष्य, शिकार के दृष्य आदि थे। इस चित्रशैली के चित्रकारों में मनोहर, गंगाराम, कृपाराम, साहिबदीन और जगन्नाथ प्रमुख हैं। राजा अमरसिंह के काल से इस षैली पर मुगल प्रभाव दिखाई देता है। 


बीकानेर शैली - महाराजा अनूपसिंह के समय इस शैली का वास्तविक रूप में विकास हुआ। लाल, बेंगनी, सलेटी और बादामी रंगो का प्रयोग, बालू के टीलों का अंकन, लम्बी इकहरी नायिकाएं, मेघमंडल, पहाड़ों आैर फूल पत्तियों का आलेखन इस शैली की प्रमुख विषेशताएँ रही है। शिकार, रसिक प्रिया, रागमाला, शृंगारिक आख्यान विशेष रहे हैं। इस शैली पर पंजाब कलम, मुगल शैली और मारवाड़ शैली का प्रभाव पाया जाता है।


किशनगढ़ शैली - यह राजपतू कालीन चित्रकला की अत्यन्त आकर्षक शैली है। इस शैली का सर्वाधिक विकास राजानागरीदास के समय में हुआ। उभरी हुई ठोड़ी, नेत्रों की खंजनाकृति बनावट, धनुषाकार भौंए, गुलाबीअदा, सुरम्यसरोवरों का अंकन इस चित्रशैली के चित्रों की प्रमुख विषेशताएं है ‘बनी ठनी’ इस चित्रशैली की सर्वोत्तमकृति है, जिसे भारतीय चित्रकला का ‘मोनालिसा’ भी कहा जाता है। इसका चित्रण निहालचन्द ने किया था। इस षैली के चित्रों में कला, प्रेम और भक्ति का सर्वांगीण सामन्जस्य पाया जाता है। प्रमुख कलाकार - निहाल चंद, अमीर चंद, धन्ना, छोटू आदि


जयपुरी शैली - इस चित्रशैली का काल 1600 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। इस शैली पर राजस्थान मेंमुगल चित्रकला का सर्वाधिक प्रभाव रहा है। सफेद, लाल, पीले, नीले तथा हरे रंग का अधिक प्रयोग, सोने-चाँदी का उपयोग, पुरूष की बलिष्ठता और महिला की कोमलता इस शैली की प्रमुख विशेषता रही है। शाही सवारी, महफिलों, राग-रगं , शिकार, बारहमासा, गीत गोविन्द, रामायण आदि विषय प्रमुख रहें है।


मारवाडी शैलीमारवाड़ में रावमालदेव के समय इस शैली का स्वतन्त्र रूप से विकास हुआ। इस शैली में पुरूष लम्बे चैड़े गठीले बदन के, स्त्रियाँ गठीले बदन की, बादामी आँखें, वेशभूषा ठेठ राजस्थानी और पीले रंग की प्रधानता होती थी। चित्रों के विषय नाथचरित्र, भागवत, पंचतन्त्र, ढोला-मारू, मूमलदे, निहालदे, लोकगाथाएँ होती थी। प्रमुख कलाकारों में भाटी देवदास, भाटी शिवदास, भाटी किशनदास आदि है.


नाथद्वारा शैली - यह शैली अपनी चित्रण विलक्षणता के लिए प्रसिद्ध रही है। यहाँ श्रीनाथजी की छवियों के रूप में ‘पिछवाई चित्रण’ किया जाता है। इस प्रकार राजस्थान चित्रण की दृष्टि से सम्पन्न रहा है। यहाँ पोथीखाना (जयपुर), मानसिंह पुस्तक प्रकाश (जोधपुर), सरस्वती भण्डार (उदयपुर) और स्थानीय महाराजाआंे तथा सामन्तों के संग्रहालयों में चित्रकला का ऐसा समृद्ध भण्डार उपलब्ध है जो न केवल राजस्थान को धनी बनाये हुये है, वरन-भारत की कलानिधि का एक भव्य संग्रह भी है। इसके प्रमुख कलाकार - खूबी राम , घासी राम, रेवाशंकर, पुरुषोत्तम आदि है.


अलवर शैली - यह राजपुताकलिन चित्रकला शैली मुगल शैली एवं जयपुर शैली का मिश्रित रूप है. गुलाम अली, सालिम राग , नन्द राम , बलदेव, जमुनादास, छोटे लाल आदि प्रमुख कलाकार है.
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