राजस्थान के मैदानी प्रदेश


मैदानी प्रदेश
 राजस्थान के मैदानी प्रदेश को  पूर्वी मैदान के नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि अधिकांशतः यह राज्य के पूर्वी भाग में स्थित है। पूर्वी मैदान, राजस्थान का एक विशिष्ट भौगोलिक प्रदेश हैं इसमें धौलपुर एवं सवाई माधोपुर के अतिरिक्त टोंक जिलें सम्मिलित हैं। यह सम्पूर्ण प्रदेश नदियों द्वारा निर्मित मैदानी भाग है इसमें बनास बेसिन, यमुनान्तरण प्रदेश एवं उत्तरी चम्बल बेसिन सम्मिलित है।

प्राकृतिक स्वरूप
इस प्रदेश का भू-आकृतिक स्वरूप विविधता से युक्त है। प्रदेश का उत्तरी भाग मेंजलोढ़ मृदा है, इस पर कुछ सिस्ट और क्वार्टजाइट की एकाकी पहाड़ियाँ स्थित है। दक्षिणी पूर्व में सेण्डास्टोन है जो अपर विन्ध्यन समूह का है। बनास बेसिन जलोढ़ मृदा से युक्त है, साथ ही देहली क्रम की शैल टोंक के निकट की पहाड़ियों के रूप में हैं। सवाई माधोपुर क्षेत्र में प्री-अरावली विन्ध्यन की परतदार शैलों की प्रधानता है।
  धरातलीय दृष्टि से यद्यपि यह मैदानी प्रदेश है किन्तु सवाई माधोपुर और धौलपुर के क्षेत्र में नीची पहाड़ियाँ हैं। उत्तरी एवं मध्य भरतपुर जिला उपजाऊ मैदान है जो यमुना के मैदान का पश्चिमोत्तर भाग है तथा उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से युक्त है। इसके दक्षिण भाग में अनियमित पहाड़ियाँ हैं जिन्हें डाँग (कंदह) कहते है। धौलपुर नगर के द.प. में पहाडियाँ विस्तृत है। भरतपुर के पूर्व में भी मण्डहोली नाम की पहाड़ी है, इसकी अधिकतम ऊँचाई 216 मीटर है।

 बनास बेसिन समतल मैदानी भाग है। इसके सीमावर्ती क्षेत्र में पहाड़ियाँ हैं। करौली क्षेत्र में पहाड़ियाँ ऊँची तथा सघन है तथा कटा-फटा प्रदेश है। धौलपुर एवं सवाई माधौपुर के चम्बल नदी के सहारे का क्षेत्र अत्यधिक कटाव से बीहड के रूप में है। सवाई माधौपुर में रणथम्भौर किला एक पहाड़ी पर स्थित है जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 505 मीटर है। इस प्रदेश में प्रवाहित नदियों में प्रमुख हैं-चम्बल, बाणगंगा, गम्भीर, रूपारेल, पार्वती, बनास, मोरेल, माशी और सोहादारा। इन सभी नदियों एवं इनकी सहायक नदियों से यह सम्पूर्ण प्रदेश नदी निर्मित मैदान के रूप में है।

जलवायु की दृष्टि से यह प्रदेश उष्ण-आर्द्र है। राज्य के पूर्वो त्तर प्रदेश में होने के कारण यह प्रदेश पर्याप्त वर्षा प्राप्त करता है। यहाँ का वार्षिक वर्षा का औसत 65सेमी. है, जो प्रतिवर्ष परिवर्तित होता रहता है। सम्पूर्ण वर्षा का 90 प्रतिशत जुलाई से सितम्बर के मध्य होता है। कभी-कभी लगातार कई दिनों तक वर्षा होती रहती है। ग्रीष्मकाल में अधिकतम तापमान 470से.ग्रे. और न्यूनतम 250से.ग्रे. रहता है। जबकि शीतकाल में न्यूनतम तापमान 40से 80से.ग्रे. तक हो जाता है। सामान्यतया इस प्रदेश की जलवायु सम है, ग्रीष्म काल में धूल भरी आंधियाँ, वर्षाकाल में मूसलाधार वर्षा और शीतकाल सामान्य होता है।

प्राकृतिक वनस्पति में यहाँ पतझड़ वाले वनों की प्रधानता है, जिसमें ढाक और खैर की प्रधानता होती है। प्रदेश के दक्षिणी भाग में जहाँ चम्बल के बीहड़ हैं वहाँ झाड़ियाँ, घास और छितरी हुई वनस्पति है। टोंक क्षेत्र में तेंदू, महुआ, गूलर, कारा, खेर, बबूल, बेर, आम, धोकड़ा की प्रधानता है। सवाई माधोपुर क्षेत्र में भी वनों का पर्याप्त विस्तार है।यहाँ तेंदू, खिरनी, गुर्जन, बांस, खेजड़ा, खेर, हिंगोट आदि के वृक्ष प्रधानता से है। कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक घास उगी हुई है जिसे बीड़ कहते हैं। डीग के निकट मण्डेरा बीड़ प्रमुख है।

मृदा - इस प्रदेश में मुख्यतया जलोढ़ मृदा है। बनास बेसिन में चिकनी और रेतीली मिट्टी तथा घाटियों में जलोढ़ मृदा का विस्तार हैं काली मिट्टी भी इस प्रदेश में है। भरतपुर क्षेत्र में काली दुमट मृदा (चिकनोट), भूरी मृदा (मटियार), दोमट, कछार और अनुपजाऊ रेतीली मृदा (भूर) का विस्तार है। जबकि सवाई माधौपुर में गहरी काली, हल्की पीली एवं भूरी मृदा की प्रधानता है।

आर्थिक स्वरूप
कृषि की दृष्टि से पूर्वी मैदानी प्रदेश महत्वपूर्ण है। पर्याप्त वर्षा एवं उपजाऊ मिट्टी के कारण यहाँ विभिन्न कृषि उपजों का उत्पादन होता है। इस प्रदेश में उत्पादित प्रमुख फसलें हैं- गेहूं चावल, बाजरा, सरसों, मक्का, उड़द, मूँग, अरहर, मूँगफली, गन्ना तम्बाकू, मिर्च आदि। अनेक प्रकार के फल एवं सब्जियों का उत्पादन भी यहाँ होता है। जहाँ सिंचाई सुविधा उपलब्ध है वहाँ वर्ष में दो फसलें भी बो ली जाती है।

सिंचाई हेतु इस प्रदेश में कुओं का प्रचलन सर्वाधिक है। इसके अतिरिक्त नहरों एवं तालाबों द्वारा भी सिंचाई की जाती है। भरतपुर-धौलपुर क्षेत्र में विभिन्न आकार के 200 बन्ध या बाँध है, इनसे सीमित रूप में सिंचाई की जात है। भरतपुर फीडर और गुड़गाँव यमुना नहरों से भी यहाँ सिंचाई होती है। टोंक जिले में 25,000  से अधिक कुएँ हैं तथा नदियों के निकट सीधे नदी के जल को रहट द्वारा खेतों में सिंचाई हेतु उपयोग किया जाता है। बीसलपुर बाँध के अतिरिक्त अनेक छोटी सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से इस प्रदेश में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है। खनिजों की दृष्टि से यह  प्रदेश निर्धन है। इस प्रदेश का प्रमुख खनिज इमारती पत्थर है। इस प्रदेश में विन्ध्यन बालू-पत्थर है, जिसका उपयोग न केवल सामान्य इमारतों में अपितु आगरा, सीकर, डीग व मथुरा के प्रसिद्ध भवनों में भी हुआ है। बनास बेसिन में अभ्रक का पर्याप्त भण्डार है। राजमहल क्षेत्र में गारनेट मिलता है सोप, स्टोन निवाई के निकट तथा लोहा बरथल के निकट सीमित मात्रा में है। जिप्सम, मैंगनीज, ताँबा, सिलिका भी यहाँ उपलब्ध है किन्तु उनका खनन लाभकारी नहीं है। चूने का पत्थर सवाईमाधोपुर और गंगापुर तहसीलों में पर्याप्त है जिसका उपयोग सीमेन्ट बनाने में किया जाता है। यहाँ चाइना क्ले तथा घिया पत्थर भी उपलब्ध है।

औद्योगिक विकास की दृष्टि से भी यह प्रदेश पिछड़ा हुआ है। भरतपुर का सेन्ट्रल इण्डिया मशीनरी लिमिटेड (सिमको) तथा धौलपुर हाई-टेक ग्लास फैक्ट्री का यहाँ के उद्योगों में विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त धातु उद्योग, तेल उद्योग, रसायन उद्योगों का भी सीमित विकास हुआ है। कुटीर उद्योगों का यहाँ पर्याप्त विकास हुआ हैं। इसमे सवाई माधौपुर के लकड़ी के खिलौने तथा टोंक में नमदा, दरी, निवाड़ उद्योग प्रमुख है। बीड़ी बनाने का कार्य भी घरेलू उद्यम के रूप में किया जाता है। हैण्डलूम, खण्डसारी, रंगाई-छपाई, चमड़े का सामान आदि भी कुटीर उद्योग के रूप में किये जाते है।

परिवहन  का विकास पूर्वी राजस्थान के मैदानी प्रदेश में पर्याप्त हुआ है। इसे प्रदेश को राजस्थान का पूर्वी द्वार कहा जाता है। मध्यकालीन युग से ही यह प्रदेश परिवहन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। इस प्रदेश में सड़कों का सघन जाल है। यहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग 11 एवं 2 गुजरते है। जयपुर-कोटा मार्ग एक प्रमुख मार्ग है जो निवाई, टोंक, देवली से जाता है। टोंक - सवाईमाधोपुर, मालपुरा - टोडारायसिंह, मालपुरा - दूदू, धौलपुर - भरतपुर, भरतपुर - डीग, डीग से नगर, नगर से सेमली, सवाई माधोपुर - दौसा, मण्डारवर - करौली, गंगापुर - लालसोट आदि अन्य प्रमुख सड़क मार्ग है।

रेलमार्गों की सुविधा सवाई माधोपुर में पर्याप्त है। सवाई माधोपुर एक बड़ा रेल जंक्शन है जो जयपुर, कोटा, दिल्ली, मथुरा, आगरा से जुड़ा है। जयपुर-मम्बई और दिल्ली-बम्बई मार्ग रेलमार्ग यहीं से जाता है। भरतपुर-धौलपुर क्षेत्र में डूपरिया से रानीकुण्ड, बयाना से रूपवास, नदबई से भरतपुर, भरतपुर से चिकसाना तथा मनिया से जाजन अन्य रेलमार्ग है। धौलपुर से वान्तपुरा राज्य की एक मात्र नैरोगेज रेल लाइन है। टोंक एक ऐसा जिला मुख्यालय है जहाँ रेल मार्ग की सुविधा नहीं है। यहाँ चानानी, निवाई, सिरस, जयपुर-सवाई माधोपुर रेल मार्ग के स्टेशन है। जयपुर-टोडारायसिंह मार्ग पर मालपुरा, टोडारायसिंह प्रमुख स्टेशन हैं परन्तु इस रेल-मार्ग को अब हटा दिया गया है।

जनसंख्या
 पूर्वी मैदानी प्रदेश राज्य का एक सघन जनसंख्या वाला प्रदेश है। वर्ष 2001 में यहाँ सर्वाधिक जनसंख्या भरतपुर जिले की 20.98 लाख अंकित की गई। इसी जिले में 414 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर का घनत्व यहाँ के सघन बसाव का स्पष्ट करता है। टोंक जिले की जनसंख्या 12.11 लाख तथा जनसंख्या घनत्व 168 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. है। जबकि सवाई माधोपुर की जनसंख्या 11.16 लाख एवं जनसंख्या घनत्व 248 व्यक्ति है। सवाई माधोपुर से ही करौली एक अलग जिला बनाया गया। धौलपुर की 2001 में जनसंख्या 9.82 लाख तथा जनसंख्या घनत्व 324 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. अंकित किया गया। इस प्रदेश का सबसे बड़ा नगर भरतपुर है जिसकी जनसंख्या वर्ष 2001 में 205104 अंकित की गई। पूर्वी मैदान के अन्य नगर टोंक, सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, गंगापुर सिटी, कामा, नगर, डीग, नदबई, कुम्हेर, भुसावर, वैर, बयाना, बाड़ी, राजाखेडा, देवली, निवाई, उनियारा, हिण्डोन, टोडाभीम और महुआ है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि पूर्वी मैदानी प्रदेश राज्य का भौगोलिक दृष्टि से विशिष्ट प्रदेश है। कृषि पर आधारित यहाँ की अर्थव्यवस्था है। खनिज सीमित होने से, उद्योगो का विकास भी बहुत कम हुआ है। परिवहन की उत्तम सुविधा है। भरतपुर का घना पक्षी विहार और सवाई माधोपुर का राष्ट्रीय वन्य जीव उद्यान तथा रणथम्भौर का किला पर्यटकों के आकर्षण के केन्द्र है।

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