राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम [3]


दलित आन्दोलन
स्वतन्त्रतापूर्व राजस्थान में दलितों में भी क्रियाशील जागरण दिखाई देता है। दलितों की स्वतन्त्रता आन्दोलन में भूमिका उनके सामाजिक एवं राजनीतिक जागृति का प्रतीक थीं। यह ध्यातव्य है कि दलितों ने राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेकर राजस्थान में आजादी के आन्दोलन को विस्तृत सामाजिक आधार प्रदान किया। 1920 और 1934 के समय दलितों ने अजमेर-मेरवाड़ा के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया। राजपूताना के दलित जातियों में सामाजिक और राजनीतिक जागृति के चिह्न दिखाई देते हैं। इसका विशेष कारण यह था कि कोटा, जयपुर, धौलपुर और भरतपुर की रियासतों में दलितों का बाहुल्य था। अतः इन राज्यों में दलितों में, सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका प्रदर्शित की। इसी कारण इन राज्यों ने इनकी मांगों की ओर ध्यान दिया। 1945-46 में उणियारा में बैरवा जाति ने नागरिक असमानता विरोधी  आन्दोलन चलाकर अपनी सक्रियता का परिचय दिया।


आर्य समाज की भूमिका
राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत करने एवं शिक्षा प्रसार में स्वामी दयानंद सरस्वती एवं आर्यसमाज ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। स्वामी दयानंद राजस्थान में सर्वप्रथम 1865 ई. में करौली के राजकीय अतिथि के रूप में आए। उन्होंने किशनगढ़, जयपुर,, पुष्कर एवं अजमेर में अपने उपदेश दिए। स्वामीजी का राजस्थान में दूसरी बार आगमन 1881 ई. में भरतपुर में हुआ। वहाँ से स्वामीजी जयपुर, अजमेर, ब्यावर, मसूदा एवं बनेड़ा होते हुए चित्तौड़ पहुँचे, जहाँ कविराज श्यामलदास ने उनका स्वागत किया। महाराणा सज्जनसिंह (1874-1884 ई.) के अनुरोध पर स्वामीजी उदयपुर पहुँचे, वहाँ महाराणा ने उनका आदर-सत्कार किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने उदयपुर में आर्यधर्म का प्रचार किया। उनके उपदेशों को सुनने के लिए मेवाड़ के अनेक सरदार नित्य उनकी सभा में आया करते थे।

  अगस्त, 1882 को स्वामी दयानन्द दुबारा उदयपुर पहुँचे। उदयपुर में स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण की भूमिका लिखी। यहीं फरवरी, 1883 ई. में स्वामीजी के सान्निध्य में परोपकारिणी सभा की स्थापना हुई। कालान्तर में मेवाड़ में विष्णु लाल पंड्या ने आर्य समाज की स्थापना की। 1883 ई. में ही स्वामीजी जोधपुर गए। जोधपुर महाराजा जसवन्तसिंह, सर प्रतापसिंह तथा रावराजा तेजसिंह पर स्वामीजी के उपदेशों का काफी प्रभाव पड़ा। अपने व्याख्यानों में स्वामीजी क्षत्रिय नरेशों के चरित्र संशोधन और गौरक्षा पर विशेष बल दिया करते थे। भरी सभा में उन्होने वेश्यागमन के दोष बतलाये और महाराजा जसवन्तसिंह की नन्हीजान के प्रति आसक्ति पर उन्हें भी फटकार लगाई। कहा जाता है कि नन्हींजान ने स्वामीजी को विष दिलवा दिया, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ गई। स्वामीजी को अजमेर ले जाया गया। काफी चिकित्सा के उपरान्त भी वह स्वस्थ नहीं हुए और अजमेर में ही 1883 ई. में इनका देहान्त हो गया।

  दयानन्द सरस्वती ने स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी और स्वभाषा पर जोर दिया। उन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को उदयपुर में हिन्दी भाषा में लिखा। अजमेर में आर्य समाज की स्थापना की गई। स्वामी दयानंद सरस्वती एवं आर्य समाज ने राजस्थान में स्वतंत्र विचारों के लिए पृष्ठभूमि तैयार की। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा, वैदिक धर्म, स्वदेशी एवं स्वदेशाभिमान की भावना पैदा की। राजस्थान में राजनीतिक जागृति पैदा करने एवं शिक्षा प्रसार के लिए भी आर्य समाज ने सराहनीय कार्य किया। आर्य समाज की शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी, अंग्रेजी भाषा के साथ ही वैदिक धर्म एवं संस्कृत की शिक्षा भी दी जाने लगी। आर्य समाज ने सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। अजमेर में हरविलास शारदा व चान्दकरण शारदा ने सामाजिक कुरीतियों के विरोध में आवाज उठायी। आर्य समाज ने खादी प्रचार, हरिजन उद्धार, शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपना मिशन बनाया। भरतपुर में जनजागृति पैदा करने वाले मास्टर आदित्येन्द्र व जुगल किशोर चतुर्वेदी आर्यसमाज के ही कार्यकर्त्ता थे।



समाचार पत्रों का योगदान
अत्याचार और शोषण की ज्वाला अज्ञानता में ही पनपती है। अज्ञानता को मिटाने और जन चेतना के प्रसार में प्रेस की भूमिका निर्णायक होती है। राजस्थान में समाचार पत्रों ने जन जागरण में जो योगदान दिया, उसका प्रमाण बिजौलिया किसान आन्दोलन में देखने को मिला। जब बिजौलिया के अत्याचारों का वर्णन प्रताप नामक समाचार पत्र में छपा तो पूरे देश में इस पर चर्चा होने लगी। राजस्थान के राज्यों के आन्तरिक मामलों का ज्ञान समाचार पत्रों के माध्यम से जनता में पहु ँचने लगा। विजय सिंह पथिक,
रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास आदि नेताओं ने राज्य की समस्याओं के विषय में समाचार पत्रों के माध्यम से चर्चा प्रारम्भ की। राजपूताना गजट (1885) और राजस्थान समाचार (1889) बहुत थोड़े समय के पश्चात् ही बन्द हो गये। 1920 में पथिक ने राजस्थान केसरी का प्रकाशन पहले वर्धा से और फिर अजमेर से प्रारम्भ किया। 1922 में राजस्थान सेवा संघ ने नवीन राजस्थान प्रारम्भ किया जिसमें आदिवासी एवं किसान आन्दोलनों का समर्थन किया गया। 1923 में वह बन्द हो गया परन्तु तरूण राजस्थान के नाम से इसका प्रकाशन पुनः प्रारम्भ किया गया। इसमें भी कृषक आन्दोलनों एवं अत्याचारों पर व्यापक चर्चा हुई। इस पत्र के सम्पादन में शोभालाल गुप्त, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास आदि नेताओं ने सराहनीय योगदान दिया। जोधपुर, सिरोही तथा अन्य राज्यों के निरंकुश शासकों के विरुद्ध इस पत्र में आवाज उठाई गई। 1923 में ऋषिदत्त मेहता ने ब्यावर से राजस्थान नाम का साप्ताहिक अखबार निकालना प्रारम्भ किया। 1930 के बाद समाचार पत्रों की संख्या बढ़ी। आगे के वर्षों में नवज्योति नवजीवन, जयपुर समाचार, त्याग भूमि, लोकवाणी आदि पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ होने लगा। त्याग भूमि (1927) में गाँधीवादी विचारधारा का प्रतिपादन होता था और इसका सम्पादन हरिभाऊ उपाध्यक्ष ने किया। इसमें गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम पर अधिक बल दिया गया। देशभक्ति, समाज सुधार, स्त्रियों के उत्थान सम्बन्धी लेख इसमें सामान्यतया होते थे।

 समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की समस्याओं का खुलासा किया। विभिन्न मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति बनाने में योगदान दिया। रियासत से जुड़े आन्दोलनों पर प्रकाश डालकर उन्हें बहस का हिस्सा बनाया। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से शोषण एवं अत्याचार का पर्दाफाश हुआ, उन पर चर्चा होने लगी। रचनात्मक कार्यक्रमों को अपनाने की प्रेस की अपील का अच्छा असर हुआ। शिक्षित वर्ग चाहे कम था, परन्तु लोग अखबार को दूसरों से सुनने में बड़ी रुचि लेने लगे। पढ़े-लिखे लोगों में भी पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में रुचि तेजी से बढ़ी।

शासकों की भूमिका
मेवाड़ के महाराणा फतहसिंह, अलवर के महाराजा जयसिंह और भरतपुर के महाराजा कृष्णसिंह बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राजस्थान के ऐसे शासक थे, जो अपनी प्रगतिशील और राष्ट्रीय विचारधारा और अंग्रेजों को राज्य के अंदरूनी मामलों में दखल देने से रोकने के कारण ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन 19बने। अंग्रेजी शिकंजे से परेशान एवं अपदस्थ मेवाड़ के महाराणा के बारे में तरुण राजस्थान ने अपने 10 जनवरी, 1924 के अंक में लिखा, यदि महाराणा गोरी सरकार के अन्ध भक्त होते तो शायद मेवाड़ के प्राचीन गौरव का नाश करने वाला यह अत्याचारपूर्ण हस्तक्षेप न हुआ होता। यह भी उल्लेखनीय है कि अलवर के शासक जयसिंह ने 1903 के आस-पास बाल-विवाह, अनमेल विवाह और मृत्यु भोज पर रोक लगा दी। रियासत की राजभाषा हिन्दी घोषित कर दी। राज्य में पंचायतों का जाल बिछा दिया। महाराजा ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं सनातन धर्म कॉलेज, लाहौर को उदारतापूर्वक वित्तीय सहायता दी। ऐसे प्रगतिशील शासक से ब्रिटिश सरकार का असन्तुष्ट होना स्वाभाविक था। अन्त में, अलवर महाराजा को निर्वासित होना पड़ा। इस प्रकार, राजस्थान के केवल कतिपय शासकों ने ही यहाँ के जन आन्दोलनों के प्रति सहानुभूति रखने एवं प्रगतिशील विचारों के प्रकटीरण की हिम्मत जुटाई, परन्तु अपवाद स्वयं बेमिसाल होते हैं।


व्यापारी वर्ग की भूमिका
सत्ता के निरंकुश प्रयोग के विरुद्ध आवाज उठाने में व्यापारी वर्ग भी पीछे नहीं रहा। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् इस वर्ग की धारणा एवं विचारधारा सत्ता वर्ग के विरुद्ध होने लगी। कलकत्ता में एक प्रभावशाली मारवाड़ी मण्डल विकसित हो रहा था, जिसने राष्ट्रीय विचारधारा को प्रोत्साहित करने का निश्चय किया। रियासतों में व्यापारी वर्ग को ठिकानेदारों की अहमन्यता खटकती थी। वे राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए अपने धन का प्रयोग करना चाहते थे, जिससे सामन्ती अनुत्तरदायी व्यवहार नियन्त्रित हो सके। रियासतों में राजनीतिक चेतना जागृत करने वालों में कतिपय व्यापारी वर्ग की भूमिका सराहनीय रही, उदाहरणार्थ- बीकानेर में खूबराम सर्राफ तथा सत्यनारायण सर्राफ, जोधपुर में आनन्दराज सुराणा, चांदमल सुराणा, भंवरलाल सर्राफ, प्रयागराम भण्डारी तथा जयपुर में टीकाराम पालीवाल, गुलाबचन्द कासलीवाल आदि।

  ब्यावर के सेठ दामोदरदास राठी एक कुशल उद्योगपति थे किन्तु उनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपाल सिंह खरवा और विजयसिंह पथिक के साथ ही था। क्रांति के मार्ग पर ये पाँचों राष्ट्रवादी नेता एक-दूसरे के पूरक थे। दुर्भिक्ष, बाढ़ या भूकम्प जैसी     प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त जनता की उन्होंने सदैव सेवा की। सेठ राठी हिन्दी भाषा के भारी प्रशंसक थे। उन्होंने 1914 में अपनी कृष्णा मिल के बहीखातों का तथा अपना सम्पूर्ण कार्य हिन्दी में ही करने का संकल्प लेकर
अत्यन्त प्रशंसनीय कार्य किया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अमृतलाल चक्रवर्ती की प्रेरणा से राठी ने ब्यावर में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की और अजमेर-मेरवाड़ा की अदालतों में नागरी लिपि और हिन्दी भाषा के प्रयोग के लिए आन्दोलन चलाया। इससे प्रभावित होकर अंग्रेज कमिश्नर ने राजकीय कार्य नागरी लिपि और हिन्दी भाषा में करना स्वीकार कर लिया था। इस प्रकार एक व्यवसायी एवं उद्योगपति होने के बावजूद सेठ राठी ने स्वभाषा के प्रयोग सहित स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोगों को बढ़ावा देकर राष्ट्र प्रेम की भावना को पोषित किया।


खादी का प्रयोग
राजस्थान के राज्यों में खादी के प्रचार ने स्वतन्त्रता की भावना को लोकप्रिय तथा व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा लोगों को इस आन्दोलन की ओर आकृष्ट किया। गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का प्रचार ऐसा आवरण था, जिस पर किसी निरंकुश शासक को भी आपत्ति करने का औचित्य दिखाई नहीं पड़ता था। खादी का प्रयोग गाँव की निर्धन जनता के लिए एक रोजगार का साधन हो सकता था, इसलिए इस कार्यक्रम को रोकने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी। समय के व्यतीत होने के
साथ-साथ गाँधी टोपी पहनना, खादी का प्रयोग करना स्वतन्त्रता आन्दोलन के हिस्से बन गये। जमनालाल बजाज पर इस आन्दोलन की देखभाल का जिम्मा था। गोकुल भाई भट्ट तथा अन्य खादी कार्यकर्त्ताओं के सम्मानार्थ प्रकाशित ग्रंथों से इन शान्त तथा जनप्रिय चर्चित चेहरों के योगदान पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। खादी को प्रश्रय प्रदान करना, छूआछूत समाप्त करना अथवा हरिजनोद्धार इस युग के नये मूल्यो को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रम थे, जिनसे जनजागरण प्रभावी हो सका।

महिलाओं की भूमिका
राजस्थान में राजनीतिक चेतना और नागरिक अधिकारों के लिए अनवरत चले आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका भी सीमित रहीं। इसमें अजमेर की प्रकाशवती सिन्हा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। 1930 से 1947 तक अनेक महिलाएँ जेल गई। इनका नेतृत्व करने वाली साधारण गृहणियाँ ही थीं, जिनकी गिनती अपने कार्यों तथा उपलब्धियों से असाधारण श्रेणी में की जाती है। इनमें अंजना देवी (पत्नी-रामनारायण चौधरी), नारायण देवी (पत्नी माणिक्य लाल वर्मा), रतन शास्त्री (पत्नी हीरालाल शास्त्री) आदि थीं। 1942 की अगस्त क्रांति में छात्राओं ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। कोटा शहर में तो रामपुरा पुलिस कोतवाली पर अधिकार करने वालों में छात्राएँ भी शामिल थीं। रमादेवी पाण्डे, सुमित्रा देवी भार्गव, इन्दिरा देवी शास्त्री, विद्या देवी, गौतमी देवी भार्गव, मनोरमा पण्डित, मनोरमा टण्डन, प्रियवंदा चतुर्वेदी और विजयाबाई का योगदान उल्लेखनीय रहा। डूँगरपुर की एक भील बाला कालीबाई 19 जून, 1947 को रास्तापाल सत्याग्रह में अपने शिक्षक सेंगाभाई को बचाते हुए शहीद हुई।

क्रांतिकारियों की भूमिका
भारतीय परिप्रेक्ष्य के अनुरूप ही राजपूताना में क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ देखने को मिलती है। यहाँ भी शासक वर्ग ने ब्रिटिश सत्ता के समान ही सामान्यतः राष्ट्रवादी गतिविधियों पर अपना शिकंजा कस दिया। ऐसी परिस्थितियों में क्रांतिकारी गतिविधियों को अपनी जगह बनाने का मौका मिला। बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारियों ने राजपूताना में भी सम्पर्क स्थापित करके अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। राजपूताना में क्रांतिकारी गतिविधियों से सम्बद्ध रहने वालों में विजयसिंह पथिक, अर्जुनलाल सेठी, केसरी
सिंह बारहठ, प्रतापसिंह बारहठ, राव गोपाल सिंह खरवा के नाम गिनाये जा सकते हैं। यद्यपि क्रांतिकारियों का आन्दोलन जन साधारण में अपनी जमीन तैयार न कर सका फिर भी सामंती समाज की बदहाली, शासकों की उदासीनता व अंग्रेजो के दमन की भूमिका अविस्मरणीय रही। राजस्थान में भी पूरे राष्ट्र के समान सामान्यतः गांधीवादी तौर-तरीके ही लोकप्रिय रहे।

  अंग्रेज सरकार क्रांतिकारी गतिविधियों को समाप्त करने पर आमदा थी। इसी सिलसिले में वायसराय लार्डमिण्टो ने अगस्त 1909 में राजस्थान में राजाओं को अपने-अपने राज्यों में क्रांतिकारी साहित्य व समाचार पत्रों पर रोक लगाने तथा क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के निर्देश दिये। फलतः राज्यों ने समाचार पत्रों पर रोक लगाने के साथ ही क्रांतिकारियों के आपसी व्यवहार एवं व्याख्यान देने पर रोक लगा दी। परन्तु राज्यों के ये प्रतिबन्ध कारगर नहीं हुए और दृढ़ प्रतिज्ञ एवं निष्ठावान देशभक्त हिंसात्मक गतिवधियों की ओर प्रवृत्त हुए। राजस्थान के क्रांतिकारियों का जनक शाहपुरा का बारहठ परिवार था। इनमें ठाकुर केसरीसिंह बारहठ राष्ट्रीय परिस्थितियों से भली-भाँति अवगत थे और ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ इनमें तीव्र आक्रोश था। 1903 में केसरी सिंह ने चेतावनी का चूंगटया नामक सोरठा मेवाड़ महाराणा फतहसिंह को लिखकर भेजे, जिसके कारण उन्होंने दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के लिए उन्होंने कुछ लोगों को साथ मिलकर कोटा के महन्त साधु
प्यारेलाल की हत्या कर दी। इस केस में इन्हें बीस वर्ष की सजा दी गई और बिहार की हजारी बाग जेल में रखा गया, परन्तु 1919 में वे शीघ्र जेल से मुक्त हो गये। कोटा पहुँचने पर उन्हें अपने पुत्र प्रतापसिंह की शहादत का समाचार मिला, परन्तु उन्होंने धैर्य रखा। बाद में गांधीजी के सम्पर्क के कारण केसरी सिंह बारहठ अहिंसा के विचारों के पोषक हो गये।

जयपुर में क्रांतिकारियों की पौध तैयार करने वाले अर्जुन लाल सेठी ने राजकीय नौकरी को ठोकर मारकर देश सेवा का कठिन मार्ग चुना। उनके द्वारा स्थापित वर्धमान पाठशाला क्रांतिकारियों की नर्सरी थी। प्रतापसिंह बारहठ जैसे व्यक्ति इस पाठशाला के छात्र थे। इन्हें एक महन्त की हत्या के झूठे आरोप में जेल डाल दिया। जेल से 6 वर्ष बाद मुक्त (1920) होने के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया।
  खरवा ठाकुर गोपालसिंह ने रासबिहारी बोस एवं बंगाल के क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आने के कारण सशस्त्र बल पर स्वतन्त्रता प्राप्ति का मन बनाया। 21 फरवरी, 1915 को सशस्त्र क्रांति की शुरूआत करने या राजस्थान में उत्तरदायित्व खरवा ठाकुर ने लिया। मगर योजना असफल होने पर उन्हें टाडगढ़ में नजर बन्द रख गया। जहाँ से वे फरार हो गये, मगर पुनः बन्दी बनाकर अजमेर जेल में रखा गया। जेल से मुक्त (1920) होने के पश्चात् वे शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न हो गये।कुछ अन्तराल के बाद 1931 में भगतसिंह को फांसी देने से उग्रवादी पुनः सक्रिय हो उठे। अजमेर, और पुष्कर की दीवारों पर भगतसिंह जिन्दाबाद के नारे लिखे गये। चिरंजीलाल ने क्रांतिकारी दल की स्थापना की। ज्वालाप्रसाद शर्मा, रमेशचन्द्र व्यास जैसे लोग क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े।



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