राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम [4]


कवियों का योगदान
राजस्थान की स्वातन्त्र्य चेतना में कवियों ने लोकगीतों के माध्यम से जनता को जाग्रत किया। ये लोक गीत राज्य की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में वहाँ के स्थानीय कवियों तथा गीतकारों द्वारा रचे गये थे। इन गीत एवं कविताओं से परतन्त्रता काल में अशिक्षित ओर अर्द्धशिक्षित जन समूह प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्राप्त करता रहा था। भरतपुर राज्य के निवासी हुलासी का नाम सर्वप्रथम आता है, जिन्होंने वीर रस के गीतों के माध्यम से अंग्रेजों के विरोध करने का आह्वान उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही कर दिया था। इस ब्राह्मण कवि ने अपनी वीर रस की कविताओं में राजस्थान के तत्कालीन राज्यों की तुलना में भरतपुर के वीरों द्वारा अंग्रेजों का अंतिम दम तक विरोध करने का ओजस्वी वर्णन किया है। भरतपुर राज्य के राजनीतिक आन्दोलनों से सम्बन्धित वर्तमान काल में जितनी भी काव्य रचनाएँ हुई हैं, उनमें सबसे अधिक योगदान पूर्णसिंह की रचनाओं का रहा है। ग्रामीण कवि होने के साथ-साथ पूर्णसिंह कर्मठ कार्यकर्त्ता भी था। उसने 1939 से 1947 तक राज्य में जितने भी आन्दोलन हुए, उनमें सक्रियता का प्रदर्शन किया।
समय-समय पर आयोजित सम्मेलनों में इसके गीतों की धूम रहती थी। राजस्थान में जन जागरण का हुकार फूंकने वालों में बूँदी के सूर्यमल्ल मीसण (1815-1868) तथा मारवाड़ के शंकरदान सामोर (1824-1878) का नाम विशेष उल्लेखनीय है।


प्रजामण्डल आन्दोलन
राजस्थान की रियासतों में प्रजामण्डलों के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए नेताओं को कठोर संघर्ष करना पड़ा। यातनाएँ झेलनी पड़ी। कारावास में रहना पड़ा। उनके परिवारो को भारी संकट का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि अपने जीवन को भी दाव पर लगाना पड़ा। प्रजामण्डलों के मार्गदर्शन में ही राजस्थान की विभिन्न रियासतों में राष्ट्रीय आन्दोलन की हलचल हुई। दुर्भाग्य की बात यह रही कि राजस्थान की जनता को तीन शक्तियों यथा-राजा, ठिकानेदार और ब्रिटिश सरकार का सामना
करना पड़ा। ये तीनों शक्तियाँ मिलकर जनता के संघर्ष का दमन करती रहीं। परन्तु राजस्थान की रियासतों में होने वाले आन्दोलनों ने यह प्रमाणित कर दिया कि इन राज्यों की जनता भी ब्रिटिश भारत की जनता के साथ कन्धा मिलाकर भारत को स्वतन्त्र कराना चाहती है। जयपुर में प्रजामण्डल का नेतृत्व जमनालाल बजाज, हीरालाल शास्त्री जैसे दिग्गज नेताओं ने किया जबकि जोधपुर में जयनारायण व्यास के मार्गदर्शन में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए संघर्ष चला, वहीं सिरोही में गोकुल भाई भट्ट के शीर्ष नेतृत्व में।

राजस्थान में राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की पहली पीढ़ी में चार प्रमुख नेताओं का नाम उल्लेखनीय है, यथा-अर्जु नलाल सेठी (1880-1941) केसरीसिंह बारहठ (1872-1941), स्वामी गोपालदास (1882-1939) एवं राव गोपालसिंह (1872-1956)। अर्जुनलाल सेठी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी और अपना कार्य चौंमू के ठाकुर देवीसिंह के निजी सचिव के रूप में प्रारम्भ किया लेकिन शीघ्र ही अपना यह पद त्याग दिया। कुछ समय तक मथुरा के एक जैन स्कूल में अध्यापक रहे और फिर
1906 में जयपुर आ गये। इसके पश्चात् वे युवकों को भावी क्रान्ति के लिए तैयार करने में लग गये।केसरी सिंह बारहठ मेवाड़ में शाहपुरा में पैदा हुए। वे चारण तथा राजपूतों में कुछ सुधार लाना चाहते थे उन्होंने राजपूतों में शिक्षा प्रसार पर बल दिया और सामाजिक कुरीतियों से बचने की सलाह दी।
  स्वामी गोपालदास का जन्म चूरू के समीप हुआ था। उनका जीवन इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है कि निरंकुश शासन में सार्वजनिक हित में कार्य करने वाले को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बीकानेर के प्रबुद्ध शासक गंगासिंह ने स्वामी गोपालदास को परेशान करने में कोई कमी नहीं की, जबकि उनका दोष यह था कि वे बीकानेर की वास्तविक स्थिति से लोगों को अवगत करा रहे थे। सच तो यह है कि उन्होंने कई रचनात्मक कार्य किये, जैसे चूरू में लड़कियों के लिए स्कूल खोला, तालाबों की मरम्मत कराई ओर कुएं खुदवाए।

  खरवा का ठाकुर राव गोपालसिंह ने सामंत परिवार में जन्म लेकर भी देश के भविष्य के लिए अपनी वंश परम्परागत जागीर को देश की आजादी के लिए दांव पर लगा दिया। उनके बारे में ठाकुर केसरीसिंह ने लिखा था, जिस प्रकार पंजाब को लाला लाजपतराय पर और महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक पर गर्व है, उसी प्रकार राजस्थान को राव गोपालसिंह खरवा पर गर्व है।

 इन उक्त नेताओं की कार्य प्रणाली पर विचार करे तो कहा जा सकता है कि इन नेताओं की योजनाएँ तथा गतिविधियाँ सामाजिक कार्य करने, शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा देशप्रेम की भावना फैलाने की थी। यह उल्लेखनीय है कि उस समय अप्रगतिशील रूढ़िवादी घटनाओं पर टीका-टिप्पणी आपराधिक श्रेणी में गिनी जाती थी। समाचार पत्रों का बाहर से मंगवाना, एक टाइप मशीन अथवा चक्रमुद्रण यन्त्र का किसी व्यक्ति के पास होना एक अपराध माना जाता था। प्रचलित व्यवस्था के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना संदिग्ध माना जाता था। पुरानी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर जाँचने तथा राजनीतिक एवं प्रशासनिक नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखने को क्रांतिकारी समझा जाता था। रास बिहारी घोष, महर्षि अरविन्द, शचीन्द्र सान्याल से मिल लेना ही क्रांतिकारी माने जाने के लिए पर्याप्त समझा जाता था। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि जो कार्य सेठी, बारहट, खरवा राव, स्वामी गोपालदास आदि ने किया, उसमें से उन्हें सफलता मिली या असफलता तथा वे संस्थागत रूप धारण कर सके अथवा धराशायी हो गये, अपितु महत्वपूर्ण यह है कि वे लोगों को कितना प्रभावित कर पाये। इस मायने में वे सफल रहे। इन नेताओं ने अपने बलिदान से पुराने सामन्ती ढांचे के अन्यायपूर्ण आचरण का पर्दाफाश
किया।

  कोटा राज्य में जन-जागृति के जनक पं. नयनूराम शर्मा थे। उन्होंने थानेदार के पद से इस्तीफा देकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था। वे विजयसिंह पथिक द्वारा स्थापित राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य बन गये। उन्होंने कोटा राज्य में बेगार विरोधी आन्दोलन चलाया, जिसके फलस्वरूप बेगार प्रथा की प्रताड़ना में कमी आई। 1939 में पं. नयनूराम शर्मा और पं. अभिन्न हरि ने कोटा राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य को लेकर कोटा राज्य प्रजामण्डल की स्थापना की। प्रजामण्डल का पहला अधिवेशन शर्मा की अध्यक्षता में मांगरोल (बाराँ) में सम्पन्न हुआ।

  अजमेर में जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में राजपूताना मध्य भारत सभा का आयोजन (1920) किया गया, जिसमें अर्जु न लाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक आदि ने भाग लिया। इसी वर्ष देश में खिलाफत आन्दोलन चला। अजमेर में खिलाफत समिति की बैठक हुई, जिसमें डॉ. अन्सारी, शेख अब्बास अली, चांदकरण शारदा आदि ने भाग लिया। अक्टूबर, 1920 में राजस्थान सेवा संघ को वर्धा से लाकर अजमेर में स्थापित किया गया, उसका उद्देश्य राजस्थान की रियासतों में चलने
वाले आन्दोलनों को गति देना था। उसी समय रामनारायण चौधरी वर्धा से लौटकर अपना कार्य क्षेत्र अजमेर बना चुके थे। अजमेर में 15 मार्च, 1921 को द्वितीय राजनीतिक कांफ्रेस का आयोजन हुआ, जिसमें मोतीलाल नेहरू उपस्थित थे। मौलाना शौकत अली ने सभा की अध्यक्षता की थी। सभा में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान किया गया। पंडित गौरीशंकर भार्गव ने अजमेर में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की अगुवाई कर प्रथम गांधीवादी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। जब प्रिंस ऑफ वेल्स का अजमेर आगमन (28 नवम्बर, 1921) हुआ, तो उसका स्वागत के स्थान पर बहिष्कार किया गया, हड़ताल की गई तथा दुकाने बन्द की गई। प्रि स की यात्रा की व्यापक प्रतिक्रिया हुई।

  जैसलमेर रेगिस्तान के धोरों के मध्य एक पिछड़ी हुई छोटी रियासत थी। यहाँ के सागरमल गोपा ने जैसलमेर की जनता को महारावल जवाहर सिंह के निरंकुश और दमनकारी शासन के विरुद्ध जागृत किया। सागरमल गोपा ने 1940 में जैसलमेर में गुण्डाराज नामक पुस्तक छपाकर वितरित करवा दी। अतः महारावल ने शीघ्र ही उसे राज्य से निर्वासित कर दिया। गोपा नागपुर चला गया और वहाँ से जैसलमेर के दमनकारी शासन के विरुद्ध प्रचार करता रहा। मार्च, 1941 में उसके पिता का देहान्त हो गया, तब ब्रिटिश रेजीडेण्ट की स्वीकृति के पश्चात् ही वह जैसलमेर पहुँच सका। रेजीडेण्ट ने आश्वासन दिया था कि उसके विरुद्ध राज्य सरकार का कोई आरोप नहीं है, अतः वह जैसलमेर आ सकता है तथा उसे किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का भय नहीं होना चाहिए। इस प्रकार गोपा जैसलमेर पहुँचा। जैसलमेर जाकर वह लगभग दो माह पश्चात् लौट रहा था, जब उसे अचानक बन्दी (22 मई, 1941) बना लिया गया। बन्दी अवस्था में उसे गम्भीर एवं अमानवीय यातनाएँ दी गई। अन्ततः उसे राजद्रोह के अपराध में 6 वर्ष की कठोर कारावास की सजा दी गई। जेल में थानेदार गुमानसिंह यातनाएँ देता रहा, जिससे उसका जीवन नारकीय हो गया था। गोपा द्वारा जयनारायण व्यास आदि को यातनाओं के सम्बन्धों में पत्र लिखे गये। जयनारायण व्यास ने रेजीडेण्ट को पत्र लिखकर वास्तविक स्थिति का पता लगाने का आग्रह किया। रेजीडेण्ट ने 6 अप्रैल, 1946 को जैसलमेर जाने का कार्यक्रम बनाया, उधर 3 अप्रैल, 1946 को ही जेल में गोपा पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया गया। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी किन्तु शासन ने गोपा के रिश्तेदारों तक को नहीं मिलने दिया। लगभग 20 घण्टे तड़पने के बाद 4 अप्रैल को वे चल बसे। पूरा नगर सागरमल गोपा जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठा। पण्डित नेहरू तथा जयनारायण व्यास सहित अनेक शीर्ष नेताओं ने इस काण्ड की भर्त्सना की। राजस्थान जब कभी भी स्वतन्त्रता सेनानियों को याद करेगा, गोपा
का नाम प्रथम पंक्ति में अमर रहेगा। 

  भरतपुर में जन-जागृति पैदा करने वालों में जगन्नाथदास अधिकारी और गंगाप्रसाद शास्त्री प्रमुख थे। इन्होंने 1912 में हिन्दी साहित्य समिति की स्थापना की, जिसने शीघ्र ही लोकप्रियता प्राप्त कर एक विशाल पुस्तकालय का रूप धारण कर लिया। भरतपुर के तत्कालीन महाराजा किशनसिंह अन्य शासकों की तुलना में जागरूक थे। उन्होंने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया। गाँवों और नगरों में स्वायत्तशासी संस्थाओं को विकसित किया और राज्य में एक अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन क अधिवेशन किया। वह राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना के पक्ष में था। परन्तु अंग्रेज सरकार ने उसके प्रगतिशील विचारों के दूरगामी परिणामों को सोचकर उसे गद्दी छोड़ने के लिए विवश किया। नये शासक ने सभाओं एवं प्रकाशनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इतना ही नहीं राष्ट्रीय नेताओं के चित्र रखना अपराध मान लिया गया। फिर भी, भरतपुर में जन-जागरण का कार्य चोरी-छिपे चलता रहा। गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येन्द्र, जुगलकिशोर चतुर्वेदी आदि के नेतृत्व में भरतपुर राज्य प्रजामण्डल अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा।

  जोधपुर के प्रजामण्डल के इतिहास में बालमुकुन्द बिस्सा का नाम स्मरणीय रहेगा। मारवाड़ के एक छोटे से ग्राम पीलवा, तहसील डीडवाना में जन्मे बालमुकुन्द बिस्सा ने 1934 में जोधपुर में गांधी जी से प्रेरित होकर खादी भण्डार खोला और तब से राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेने लगा। उसका जवाहर खादी भण्डार शीघ्र ही राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। 1942 में जोधपुर में उत्तरदायी शासन के लिए जो आन्दोलन चला, उसमें उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जहाँ भूख हड़ताल एवं यातनाओं के कारण वह शहीद हो गया परन्तु उससे प्रेरित होकर कई युवा प्रजामण्डल-आन्दोलन में कूद पड़े।मेवाड़ में प्रजामण्डल की स्थापना बिजौलिया आन्दोलन के कर्मठ नेता माणिक्यलाल वर्मा द्वारा मार्च, 1938 में की गई। इस हेतु वे साइकिल पर सवार होकर निकल पड़े। वे जब शाहपुरा होकर गुजरे तो वहाँ उन्हें रमेश चन्द्र ओझा और लादूराम व्यास जैसे उत्साही व्यक्ति मिल गये। वर्मा की प्रेरणा से इन नवयुवकों ने 1938 में शाहपुरा राज्य में प्रजामण्डल की स्थापना की। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि शाहपुरा राज्य ने प्रजामण्डल की गतिविधियों में अनावश्यक दखल नहीं दिया।

  डूँगरपुर में 1935 में भोगीलाल पण्ड़या ने हरिजन सेवा समिति की स्थापना की। उसी वर्ष शोभालाल गुप्त ने राजस्थान सेवक मण्डल की ओर से हरिजनों और भीलों के हितार्थ सागवाड़ा में एक आश्रम स्थापित किया। इसी बीच बिजौलिया आन्दोलन के प्रमुख सूत्रधार माणिक्यलाल वर्मा जन-जातियों में काम करने के उद्देश्य से डूँगरपुर आये। उन्होंने बागड़ सेवा मन्दिर की स्थापना द्वारा भीलों में साक्षरता का प्रचार किया तथा सामाजिक कुरीतियों के निवारणार्थ उल्लेखनीय कार्य किया। इससे भीलों में नवजीवन का संचार हुआ। परन्तु राज्य सरकार ने शीघ्र ही बागड़ सेवा मन्दिर की रचनात्मक प्रवृत्तियों को नियन्त्रित कर दिया। 1944 में डूँगरपुर प्रजामण्डल की स्थापना हरिदेव जोशी, भोगीलाल पण्ड्या, गौरीशंकर आचार्य आदि ने मिलकर की। डूँगरपुर के भोगीलाल पण्ड्या पर जेल में किये जाने वाले अमानुषिक व्यवहार का गोकुल भाई भट्ट, माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री, रमेशचन्द्र व्यास आदि ने मिलकर जमकर विरोध किया। फलस्वरूप डूँगरपुर महारावल को पण्ड्या सहित अनेक कार्यकत्ताओं को छोड़ना पड़ा। 



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