राजस्थान के अभ्यारण्य


राजस्थान के अभ्यारण्य
*      सरिस्का अभ्यारण्य (अलवर) :  इसको बाघों का घर कहा जाता है. पीली किताब अलवर रियासत के अंतिम शासक महाराजा सवाई तेजसिंह (1937-48) के शासनकाल में बनाई गई फोरेस्ट सेटलमेंट रिपोर्ट को पीली किताब कहा जाता है. लोकदेवता भर्तृहरि की तपोस्थल सरिस्का अभ्यारण्य के पास स्थित है. आज़ादी के बाद 1958 में भारत सरकार ने इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया और 1979 में इसे प्रोजेक्ट टाईगर के अधीन लाया गया। यह अभयारण्य हरे कबूतरों के लिए प्रसिद्ध है. राजस्थान के अलवर ज़िले में अरावली की पहाड़ियों पर 800 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला सरिस्का मुख्य रूप से वन्य जीव अभयारण्य और टाइगर रिजर्व के लिए प्रसिद्ध है। 8वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान यहाँ के अमीरों ने अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। सरिस्का वन्यजीव अभयारण में पूरे साल सैलानियों की भीड़ लगी रहती है।


*      केवलादेव (घाना) राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर) पक्षियों की एशिया में सबसे बड़ी प्रणयस्थली , पक्षी प्रेमियों का तीर्थ, हिम पक्षियों का शीत बसेरा, पक्षियों का स्वर्ग आदि नमो से विख्यात यह उद्यान भारत के प्रमुख पर्यटक परिपथ सुनहरा त्रिकोण (दिल्ली-आगरा-जयपुर) पर अवस्थित है. यहां भारत के अन्य भागों से तो पक्षी आते ही हैं साथ ही यूरोप, साइबेरिया, चीन, तिब्बत आदि जगहों से भी प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। पक्षियों के अलावा सांभर, चीतल, नीलगाय, भालू आदि पशु भी यहां पाए जाते हैं। 1981 में इसे विश्व प्राकृतिक धरोवर के रूप में यूनेस्को ने सूचीबद्ध किया . यहाँ दुर्लभ सफेद साइबेरियन सारस, रोजी पेलिका सहित २०० विदेशी पक्षी जातियाँ देखी जा सकती है.


*      रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान (सवाई माधोपुर) १९८० में राष्ट्रीय उद्यान घोषित यह उद्यान अरावली तथा मध्य भारत की विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के 392 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फेला है. राष्ट्रीय स्मारक घोषित रणथम्भौर का किला इस अभयारण्य में स्थित है. धौक वृक्ष तथा ढाक वनस्पतियां बहुलता से पाई जाती है. रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान का नाम राष्ट्रीय राजीव गाँधी उद्यान कर दिया है.


*      राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर०बाड़मेर) क्षेत्रफल की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है. जो 3162 वर्ग किलो० में फेला है. (१९०० वर्ग किलो० जैसलमेर ओर १२६२ वर्ग किलो० बाड़मेर में). इसे 1980 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया यहाँ मरुदभिद प्रकृति की वनस्पति पाई जाती है. सेवण घास यहाँ रेतीली क्षेत्र व रेत के टिब्बो पर सबसे अधिक पाई जाती है. गोडावण इस क्षेत्र में प्रजनन करते है. आकलवुड फॉसिल पार्क इसी में स्थित पार्क है जहाँ लाखो वर्ष पूर्व के सागरीय जीवन के जीवाश्म तथा काष्ट जीवाश्म पाए गए है. इसमें भालू, भेडिया, सियार, लोमड़ी, कृष्ण मृग, नीलगाय गिद, बाज आदि पाये जाते है.


*      कुम्भलगढ़ अभयारण्य (उदयपुर-राजसमंद-पाली) : भेडियों ओर जंगली मुर्गो के लिए प्रसिद्ध है.चार सींगो वाला मृग चौसिंगा जिसे स्थानीय बोलचाल में घण्टेल कहते है. इसे 1971 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया . यह विश्व का एकमात्र ऐसा हिरण है जिसके नर के चार सींग  होते है. यह केवल भारत में हि पाया जाता है. इसका क्षेत्रफल 608 किमी है. बनास नदी का उदगम स्थल यही अभयारण्य है.रणकपुर (पाली) के जैन मन्दिर इसी में आते है. कुम्भलगढ दुर्ग जो महाराजा कुम्भा के समय बनाया गया, वो भी इसी में है.


*      आबू अभयारण्य (माउन्ट आबू, सिरोही) : इसका क्षेत्रफल 112 वर्ग किलोमीटर में है. इसे 1960 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया. राज्य का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित यह अभयारण्य जंगली मुर्गो के लिए विख्यात है. इसी में राजस्थान की सबसे ऊँची चोटी गुरू शिखर स्थित है.


*      दर्रा अभयारण्य (कोटा-झालावाड) इसका क्षेत्रफल 274 वर्ग किलोमीटर में है. यह अभयारण्य विन्ध्याचल पर्वत श्रृंखला सम्बंधित मुकन्दरा अथवा दर्रा पहाड़ियों जो पश्चिम दिशा में रावतभाटा से कालीसिंध नदी को गागरोन किले के पास पार करती है, में फेला है. इसे 1955 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया इसमें धोकडा वनस्पति पाई जाती है.यह मुम्बई-जयपुर तथा मुम्बई दिल्ली रेलमार्ग से जुड़ा है.


*      चम्बल अभयारण्य यह अभयारण्य सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी, धौलपुर एवं करौली जिले में है. इसे 1983 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया.  यह अभयारण्य जलीय पक्षियों की प्रजनन स्थली के रूप में जाना जाता है. चम्बल नदी घडियालो के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक आवास है. यहाँ जल मानुष , डॉल्फिन तथा मगर भी पाये जाते है. डॉल्फिन उत्तर भारतीय नदियों में पाया जाने वाला एक विशिष्ट स्तनपायी है, जो इस अभयारण्य की विशेषता है इसको भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव कहा जाता है.


*      बस्सी अभयारण्य (चित्तौडगढ) : इस अभयारण्य में बघेरा , जरख, सियार, भेडिया, तथा जलीय जीव मगरमच्छ , कछुएं पाये जाते है. इस अभयारण्य से ब्राह्मणी व ओरई नदियाँ का उदगम होता है. इसको 1988 ई० में वन्य जीव अभयारण्य का दर्जा दिया गया.


*      सीतामाता अभयारण्य (चित्तौडगढ -334 वर्ग  km उदयपुर -88 वर्ग km)  यह उड़न गिलहरियो के लिए प्रसिद्ध है. उड़न गिलहरी के दोनों पाँवो के बीच झिल्लीनुमा चमड़ी विद्यमान रहती है जो गिलहरी को पैराशूटनामा आकार प्रदान करती है. यह 422 वर्ग किमी क्षेत्र में स्थित है. इसको अभयारण्य का दर्जा 1979 ई० में दिया गया. इस अभयारण्य में सागवान-बांस के वन पाये जाते है. इस अभयारण्य में से होकर जाखम, करमोई, सीतामाता, टांकिया, भुदो एवं नालेश्वर नदी बहती है. यहाँ स्थित लव-कुश जलस्रोतो से अनंत काल से ठण्डी तथा गर्म धाराएँ बहती रहती है. सियार, नीलगाय, जंगली सूअर, रीछ, सांभर आदि पाये जाते है.


*      भैंसरोडगढ़ अभयारण्य (चित्तौड़गढ़) क्षेत्रफल 229.14 वर्ग किमी है. घड़ियाल भैंसरोडगढ़ अभयारण्य की अनुपम धरोवर है. इसको 1983 ई० में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया. इस भैंसरोडगढ़ अभयारण्य क्षेत्र में ग्रेनाइट, क्वार्ट्जाइट, सेंडस्टोन, आदि चट्टानों की भरमार है. यहाँ धोक के वृक्ष पुरे प्रदेश में फेले है.
*      अन्य अभयारण्य तालछापर (चुरू -१९७१), जयसमंद वन्य जीव अभयारण्य (उदयपुर १९५५), रावली टाईगढ़ वन्य जीव अभयारण्य(अजमेर, पाली एवं उदयपुर १९८३),सज्जनगढ़ वन्य जीव अभयारण्य(उदयपुर 1987), फुलवारी की नाल अभयारण्य(उदयपुर- १९८३), कैलादेवी अभयारण्य(सवाई माधोपुर १९८३), रामगढ अभयारण्य(बूंदी १९८२), जवाहर सागर अभयारण्य (कोटा १९७५), शेरगढ़ अभयारण्य ( बारां १९८३), बंध बारेठा (भरतपुर १९८५), जमुवारामगढ अभयारण्य (जयपुर १९८२)


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