बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का इतिहास


बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का इतिहास

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जड़ें मध्यकाल में वेनिस, अँग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों द्वारा स्थापित कंपनियों में मिलती हैं। प्राचीन सभ्यता में भी व्यापारियों द्वारा दूसरे देश में जाकर व्यापार करने के उदाहरण मिलते हैं। देश की सीमाओं को लांघ कर दूसरे देशों में व्यापार करने के प्रमाण मेसोपोटामिया सभ्यताके समय के मौजूद हैं। लेकिन यह व्यापार मुख्यतः स्वतन्त्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता था। व्यापारी समूह बनाकर एक देश से दूसरे देश में अपने माल की बिक्री के लिये जाते थे, और आवश्यकता की वस्तुयें वहां से खरीद कर लाते थे। भारत का रोम के साथ व्यापार, भारत का बर्मा, मलाया (अब मलेशिया), चीन आदि के साथ व्यापार इसी श्रेणी में आता था। रोमन साम्राज्य के समय पार-राष्ट्रीय व्यापार खूब होता था, लेकिन व्यापारियों द्वारा साम्राज्य के पतन के बाद भारत का व्यापार चीन के साथ शुरू हुआ। मुख्यतः दक्षिण भारत का हिस्सा चीन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में अधिक संलग्न था। व्यापार के इस स्वरूप में शोषण की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी और न ही मेजबान व मेहमान देशों के बीच इस व्यापार को लेकर कोई झगड़ा हुआ करता था।
आधुनिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चरित्र वाली दुनिया की सबसे पहली कम्पनी द मस्कोवी कम्पनीमानी जाती है जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुयी थी। इस कम्पनी ने अपनी स्थापना के 3 वर्षो बाद ही दुनिया के महत्वपूर्ण शहरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिये थे। सन् 1553 से 1581 तक मस्कोवी कम्पनीने अकूत मुनाफा कमाया और सन् 1581 में कम्पनी के अलमबरदारों ने एक और विशालकाय कम्पनी द टर्की कम्पनीको स्थापित कर लिया। इस टर्की कम्पनीकी विशेषता थी कि इसने स्थापना के समय ही दुनिया के महत्वपूर्ण नगरों में अपने पाँव पसारे। ऐसा नहीं था कि 1553 से सन् 1581 के बीच दुनिया में किसी अन्य कम्पनी का जन्म ही नहीं हुआ। अन्य कई छोटी कम्पनियाँ सामने आयी लेकिन अधिक दिन तक चल न सकी। अतः यह कहा जा सकता है कि सन् 1553 से सन् 1581 तक मस्कोवी कम्पनीका व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रहा।
सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में व्यापार करने के लिये आयी। हालाँकि इस कम्पनी की स्थापना एलिजाबेथ प्रथम के समय में ही हो चुकी थी, लेकिन इस कम्पनी ने बहुराष्ट्रीय चरित्र सन् 1600 में ही ग्रहण किया। भारत आने से पूर्व इस कम्पनी ने दुनियाँ के अन्य हिस्सों में भी पैर जमाने की कोशिश की थी लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक छोटी-मोटी डच कम्पनियाँ अपना व्यापार कर रहीं थी। भारत में भी कुछ डच कम्पनियों को प्रवेश हो चुका था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1612 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने डच कम्पनियों के साथ अम्बोनिया (इन्डोनेशिया) में एक युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक षड्यन्त्र के तहत डच कम्पनियों के अधिकारियों की सामूहिक हत्या करवा दी। सन् 1667 के आते-आते ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने डच कम्पनियों का नामो-निशान मिटा दिया। सूरत के बन्दरगाह पर कब्जा करने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1612 में स्वाली में भी एक युद्ध लड़ा जिसके बाद सूरत के बन्दरगाह पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शिकंजा पूरे देश पर कसता चला गया।
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति से पूर्व, सन् 1670 में स्थापित द हडसन बे कम्पनीसन् 1672 में स्थापित द रायल अफ्रीकन कम्पनी1711 में स्थापित द साउथ सी कम्पनीआदि विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ दुनिया के तमाम हिस्सों में व्यापार कर रही थी।
सन् 1750 के बाद का दौर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का दौर था। जिसके दौरान उत्पादन की तकनीक में आमूल परिवर्तन आया। सन् 1600 से 1750 के बीच अंग्रेजी कम्पनी ने, जिसमें ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी शामिल थी, अंग्रेजों को अकूत पूँजी का मालिक बना दिया। भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का शोषण करके अंग्रेजी बाजार में पैसे का प्रवाह अत्याधिक बढ़ गया। बाजार की ताकतें (बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ) बाजार में ताकतवर होती गयी। मुद्रा का दबाव लगातार बढ़ने का परिणाम औद्योगिक क्रान्ति के रूप में सामने आया।
औद्योगिक क्रान्ति ने व्यापारिक कम्पनियों को जमीन से जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया। अधिक उत्पादन व कम लागत के सिद्धान्त के चलते कम्पनियों के मुनाफे बहुत तेजी से बढ़ते गये। सन् 1765 से 1785 के बीच मात्र 20 वर्षों में एक तरफ तो कई नये आविष्कार हुये तथा दूसरी और कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जन्म हुआ।
सन् 1770 के अकाल में भारत में जहां लाखों लोगों की मौत हो रही थी, वहीं अंग्रेजी जमीन पर वैभव का नंगा नाच हो रहा था। जिस अनुपात में लोग ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा रचाये गये अकाल में मर रहे थे उसी अनुपात में अंग्रेजी साम्राज्य में कम्पनियों तथा आविष्कारों से चमत्कार हो रहे थे। अंग्रेजी बैंकों में इतना अधिक धन जमा हो गया था कि उतना धन दुनिया के किसी भी हिस्से में यदि होता तो वहाँ भी औद्योगिक क्रान्ति हो गयी होती।
मात्र 50,000 पाउण्ड से भारत में व्यापार शुरू करने वाली ईस्ट इण्डिया कम्पनी सन् 1770 तक आते-आते भारत से 20,00000 पाउण्ड के बराबर का मुनाफा प्रतिवर्ष कमाती थी। सन् 1860 तक कुछ और विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, जो मूलतः ब्रिटेन की थी, दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी थी। इसमें ऐनड्रयू यूल एण्ड कम्पनी, डंकन एण्ड ब्रदर्स कम्पनी, मेक्लाइट एण्ड कम्पनी, बर्न एण्ड कम्पनी, डंकन एण्ड ब्रदर्स कम्पनी, आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी, गिलान्डर्स अर्बुथनाट एण्ड कम्पनी, शा वालेस कम्पनी ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ थीं, जिनकी 50 से अधिक कम्पनियाँ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कार्य कर रही थीं। इन ब्रिटिश कम्पनियों के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन-जिन देशों में ये कम्पनियाँ व्यापार करने के लिये गयी, उन देशों में अंग्रेजी साम्राज्य का झंडा लहराया गया। ब्रिटिश साम्राज्य की सीमायें बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वहां की कम्पनियों ने निभायी थी।
18 वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तरी अमेरिका में ब्रिटेन की 13 कम्पनियाँ व्यापार कर रहीं थी। बाद में ये क्षेत्र, जिनमें ब्रिटिश कम्पनियाँ व्यापार के नाम पर शोषण कर रही थीं, ब्रिटिश उपनिवेश बने। इस उपनिवेशों के नाम भी उन्हीं कम्पनियों के नाम पर रखे गये जो इन क्षेत्रों की मालिक बन बैठी थी। उदाहरण के लिये मैसाचुसेट, बोस्टन, लेक्सिग्रंटन, वर्जीनिया, मैरीलैण्ड, जर्सी, पेनसिल्वेनिया आदि जगहों के नाम कम्पनियों के नाम पर रखे गये। जार्ज वाशिंगटन जैसे नेताओं के नेतृत्व में ब्रिटिश उपनिवेशों को मुक्त कराने का राष्ट्रीय आंदोलन अमेरिका में शुरू हुआ। आंदोलन का सबसे ताकतवर पक्ष था, अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार। लोगों  ने अंग्रेजी कम्पनियों द्वारा बनायी गयी वस्तुओं को खरीदना बंद किया। कम्पनियों को अन्य प्रकार के सहयोग देना छोड़ा। असहयोगऔर बहिष्कारके नारों से अमेरिकी धरती गूंजी और इस गूंज का परिणाम सन् 1783 में मिला, अंग्रेजी दासता से मुक्ति में। उन 13 अंग्रेजी कम्पनियों को अमेरिका की धरती से अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा।
ब्रिटिश कम्पनियों द्वारा जो बीज अमेरिका की धरती छोडे़ गये, वे अब पौधे बनने लगे थे। अमेरिका में भी छोटी-छोटी कम्पनियाँ अस्तित्व में आने लगीं थीं। सन् 1865 में अमेरिका का सिविल वार समाप्त हुआ जिसको अमेरिकी औद्योगिक क्रान्ति का नाम दिया जा सकता है। सिविल वार की समाप्ति के बाद अमेरिका उसी नक्शे कदम पर चलने लगा जिस पर कभी ब्रिटेन चला था।
अमेरिका की सबसे पहली बहुराष्ट्रीय कम्पनी सिंगरथी, जो 1867 में स्थापित हुई। इस कम्पनी ने देश के बाहर अपनी पहली उत्पादन इकाई 1867 में ही ग्लासगो (स्काटलैण्ड) में स्थापित की। सन् 1867 में बायरने अपनी पहली उत्पादन इकाई कोलोन (फ्रांस) में स्थापित की थी जिसमें रासायनिक पदार्थ एनीलीन तैयार किया जाता था। इस कम्पनी के जनक प्रख्यात वैज्ञानिक फ्रेडरिक बायर थे जो जर्मनी के थे। सन् 1866 में विश्वविख्यात भौतिक शास्त्री अल्फ्रेड नोबुल ने डायनामाइट के उत्पादन के लिये नोबुल इण्डस्ट्रीजनामक कम्पनी की स्थापना हेम्बर्ग में की। ये तीनों कम्पनियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ थीं, जो आज अपनी 450 से अधिक कम्पनियों के साथ आर्थिक जगत की बुलंदियों पर हैं। ज्ञात रहे कि दुनिया का प्रतिष्ठित नोबुल पुरस्कार, डायनामाइट व अन्य विस्फोटक पदार्थों का उत्पादन करने वाली कम्पनी नोबुल इण्डस्ट्रीज द्वारा ही दिया जाता है।
19 वीं शताब्दी की शुरूआत तक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आकार व समृद्धि में अत्यधिक वृद्धि होने लगी थी। अतः यूरोपीय देशों की सरकारों ने संरक्षणवाद की नीति को अपनाया था। जिसके तहत उन देशों की सरकारों ने अपने देश की कम्पनियों को संरक्षण दिया और दूसरे देश की कम्पनियों को अपने बाजार में घुसने पर कई पाबंदियां लगाई। सन् 1890 तक अमेरिका में 5000 कम्पनियाँ स्थापित हो चुकी थीं। यूरोपीय देशों में उनको घुसपैठ करना अब मुश्किल हो गया था। क्योंकि अधिकतर यूरोपीय देशों में कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे। अब इन अमरीकी कम्पनियों ने आपसी प्रतियोगिता से बचने के लिये आपस में ट्रस्ट बनाना शुरू कर दिया। 5000 कम्पनियों में आपस में गठजोड़ हुआ और प्रथम विश्व युद्ध तक आते-आत अमेरिका में 300 विशालकाय  कम्पनियाँ देश की अर्थव्यवस्था पर कब्जा करके यूरोपीय दशों में भी घुस चुकी थीं। इन 5000 कम्पनियों के आपसी गठजोड़ ने आगे आने वाली कम्पनियों को आपस की प्रतियोगिता से बचने का, एक दूसरे के हितों का आपस में न टकराने का आसान रास्ता दिखाया। जब 5000 कम्पनियों ने आपस में मिलकर 300 विशालकाय कम्पनियाँ स्थापित की तो यूरोपीय देशों में कोहराम मच गया। देशों के आर्थिक प्रतिबन्ध ताक पर धरे रह गये। साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाकर इन कम्पनियों ने यूरोपीय देशों में घुसपैठ की तथा उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अपने अनुरूप बदलकर रख दिया। खुले बाजार की अर्थव्यवस्था का नारा देकर उन देशों के पुश्तैनी रोजगार धंधों को चौपट किया। प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक बाजी एक दम से पलट गयी थी। कल तक जो ब्रिटेन के हाथ थी अब बाजी अमेरिकी कम्पनियों के हाथ थी। सन् 1901 में ब्रिटेन में काम करने वाली कम्पनियों में सबसे बड़ी कम्पनी पूरे यूरोप की सबसे बड़ी कम्पनी हुआ करती थी। सन् 1914 तक पूरे यूरोप में जितनी कारें बनती थीं उनमें से एक-तिहाई कार अकेले अमरीका की फोर्ड कम्पनी बनाती थी। जबकि इस कम्पनी की स्थापना हेनरीफोर्ड ने सन् 1903 में की थी। प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होने तक अमरीकी कम्पनियों ने यूरोप को रौंद कर रख दिया। इन सन्दर्भ में एफ.ए, मैकेन्जी द्वारा 1902 में लिखित पुस्तक द अमेरिकन इन्वेडर्सअत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं। उनके स्वयं के शब्दों में- अमेरिका ने यूरोप को रौंद दिया हे, अपनी फौजों से नहीं बल्कि कम्पनियों द्वारा तैयार उत्पादों से। इन कम्पनियों के कप्तान आज यूरोप के भाग्य विधाता बन बैठे हैं। जिन्होंने मैड्रिक से लेकर सेंट्स पीटरबर्ग तक लोगों के दैनिक जीवन को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इन आततायी कम्पनियों के सामने अब कुछ भी सुरक्षित नहीं रह गया है। हमारे ड्राईवर अमरीकी गाड़ियों की गोद में बैठने को बेताब हैं। हमारे बच्चे अब अमरीकी भोजन पर पल रहे हैं और हमारे बुजुर्ग भी अब अमरीकी ताबूतों में दफनायें जा रहे हैं।अमरीकी कम्पनियों द्वारा बने सामानों की बाढ़ में यूरोप डूब गया। सुई से लेकर बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियाँ तथा बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतल से लेकर, मरने के बाद दफनाने के लिये ताबूत तक अमरीकी कम्पनियों द्वारा बनाये जा रहे थे। सन् 1914 तक कोयला, रेलवे, इस्पात, इन्जीनियरिंग, कार, पेट्रोलियम, एल्यूमिनियम, रसायन, कपड़ा आदि क्षेत्रों में अमरीकी कम्पनियों का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था। सन् 1914 तक अमेरिका व यूरोप की कुल तरल परिसम्पत्ति का 90 प्रतिशत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में लगा हुआ था।
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