आधुनिक विकास या प्रकृति विनाश


आधुनिक विकास या प्रकृति विनाश
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कारगुजारियों और उसके फलस्वरूप
विकसित विकास-प्रक्रिया का सबसे भयावह नतीजा प्रकृति के विनाश के
रूप में हुआ है। पर्यावरण की बरबादी का मुख्य कारण है।, बहुराष्ट्रीय
कम्पनियों की उत्पादन शैली, जिसके चलते पश्चिम के देश अमीर हुये हैं।
लेकिन अब यह संकट उन देशों पर सबसे अधिक मंडरा रहा है जहां से
आधुनिक विकास प्रक्रिया की शुरूआत हुयी थी। पश्चिम के देशों में जितनी
उपभोग की वस्तुयें बन रही हैं, उतनी ही अधिक उपभोक्ताओं की हवस बढ़
रही है। नतीजा उस कचरे के रूप में सामने है जो हमारी पृथ्वी को
दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से प्रदूषित करता जा रहा है जो अपने आने
वाले दिनों में कई तटीय शहरों को विश्व के नक्शे से समाप्त कर देगा।
वर्तमान में कार्बन डाईआक्साइड पयावरण के प्रदूषण का सबसे
बड़ा कारण है। उद्योगों के इस अंधे युग के आरंभ होने से पहले कार्बन
डार्ठआक्साइड वातावरण में एक निश्चित अनुपात में रहती ािी। एकसर्वेक्षण
के अनुसार औद्योगिक क्रान्ति से पहले वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड
प्रति 10 लाख अंशों में 280 अंश थी। आज इसमें 25 प्रतिशत बढोत्तरी हो
चुकी है और सन् 2075 तक गैस की मात्रा दुगुनी हो जायेगी। अगर इस
बात को दुनिया भर के देशों के जंगलों के विनाश से जोड़ दिया जाए, तो
यह अंदाज सामने आता है कि कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा वायुमंडल
में आज से मात्र 40 वर्ष बाद दुगुनी हो जायेगी। इसके संकेत अभी से
मिलने शुरू हो गये हैं। पृथ्वी का तापमान बढ़ गया है। पिछले 110 साल
की तुलना में इस दशक के पहले 8 सालों में ही 4 साल सबसे गर्म साल
थे। 1988 के पहले 7 महिनों ने तो एक शताब्दी का रिकार्ड तोड़ दिया, ये
7 महिने इतने अधिक गर्म थे। 23 जून 1988 दोपहर में जब अमरीकी शहरों
में 38 डिग्री सेल्यिस से ज्यादा गर्मी थी, हजारों किलोमीटर उपजाऊ भूमि
पर पहली बार भयंकर सूखा पड़ा था और जो अंधड़ चल रहे थे वैसे इस
शताब्दी में कभी देखने को नहीें मिले।
सन् 1950 से लेकर 1986 के बीच किस देश ने वातावरण में
कितनी कार्बन डाईआक्साइड गैस छोड़ी इसका आँकड़ा नीचे दिया जा रहा है।
देश का नाम कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा
उत्तरी अमेरिका 40.2 अरब टन
पूर्वी यूरोप के देश 31.9 अरब टन
पश्चिमी यूरोप के देश 25.1 अरब टन
एशिया महाद्वीप के सभी देश 9.3 अरब टन
प्रशांत क्षेत्र के सभी देश 7.2 अरब टन
अफ्रीका के देश 14.43 अरब टन

वैज्ञानिक आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव से पृथ्वी
की जलवायु को बदलना शुरू कर दिया है। ग्रीन हाउसऐसे विशाल
कमरे होते हैं जहाँ खास किस्म के पौधे उगाये जाते हैं, विकास के
तथाकथित ढाँचे के अन्तर्गत चलने वाले उद्योगों से कार्बन डाईआक्साइड,
कार्बन मोनो आक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड, ओाजेन, क्लोरो फ्लोरो
कार्बन तथा कई अन्य गैसें वायु मंडल के निचले हिस्से में जमा हो जाती
हैं। जिसके कारण पृथ्वी की गरमी को ये गैसे ऊपर जाने से रोकती हैं
जिससे वातावरण का तापमान बढ़ जाता है। ताकि पौधों पर बदलते हुये
मौसम का असर न पड़े। इन कमरों में अनुकूल मौसम बनाया जाता है।
शीशे की छतें इन कमरों में लगी रहती हैं जिनसे धूप तो मिलती ही है
लेकिन अन्दर गर्मी एक निश्चिम नाप से ज्यादा नहीं होती है। इन ग्रीन
हाऊस का सबसे बड़ा असर यह होता है कि जो कार्बन डाईआक्साइड गैस
बनती है वह कमरे से बाहर नहीं जाती जिससे तापमान बढ़ जाता है क्योंकि
कार्बन डाईआक्साइड में गर्मी सोखने की विलक्षण क्षमता है, इसी वजह से
ग्रीन हाऊस ठंडे मौसम में भी गर्म रहता है। अतः पृथ्वी पर भी यही प्रक्रिया
दोहरायी जाती है कि कार्बन डाईआक्साइड या ऐसी ही अन्य गैसें गर्मी को
पृथ्वी से बाहर जाने से रोकती हैं तो इसे वैज्ञानिकों ने ग्रीन हाउस प्रभाव
का भोला सा नाम दिया है।
ग्रीन हाउस प्रभावके कारण पृथ्वी की जलवायु का ताप स्थायी
रूप से कुछ डिग्री बढ़ जाने से प्रलय का कहर ढा सकता है। इसके कारण
मौसम बदल सकता है, उपजाऊ क्षेत्रों में सूखा पड़ सकता है, रेगिस्तान में
मूसलाधार बारिश हो सकती है, पर्वतों पर पिघलते हुये हिमनद समुद्र की
सतह को दो मीटर तक ऊँची कर सकते हैं। जिसके कारण समुद्र तटीय शहर
बम्बई, कलकत्ता, लक्षद्वीप आदि जलप्लावित होकर विलुप्त हो जायेंगे।
कार्बन डाईआक्साइड के अलावा एक खतरनाक गैस होती है
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन इस गैस का उपयोग ये कम्पनियाँ मुख्यतः रिहायशी
चीजों के उत्पादन जैसे रेफ्रीजरेटर, फोटोकापियर, वातानुकूलित यन्त्र,
एयरोसोल स्प्रे आदि में करती है।
आज प्रदूषण सम्बन्धी तकनीक के खिलाफ शिकायत की जा रही
है, वह इन्हीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने गरीब देशों को बेची है। अब ये
कम्पनियाँ दार्शनिक दलीलें देकर विकल्प-तकनीक को इन देशों को देने
से इन्कार कर रही हैं। ताकि ये देश पर्यावरण के संकट को झेलते रहें।
लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम कि पर्यावरण के संकट भौगोलिक सीमाओं का
आदर नहीं करते हैं। भस्मासुर की तरह वे भी इन संकटों की चपेट में आ
जायेंगे।
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