बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल


बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल
-राजीव दीक्षित
आमुख
मानव समाज के लम्बे इतिहास में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का उदय एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य की जीवन शैली और अनुभव से परखे टिकाऊ मूल्यों को झकझोर दिया है। नवजात शिशु के भरपूर पोषण के लिए प्रकृति प्रदत्त माँ के स्तनपान की चिरकाल से चली आयी स्वास्थ्य परम्परा के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बेबी फूडको स्थापित करवा देना इसका एक उदाहरण मात्र है। राज्य, राष्ट्रीयता, धर्म, ईमान इन सब से ऊपर उठकर मुनाफा और आर्थिक साम्राज्य की हवस ने इन कम्पनियों को सुपरस्टेटबना डाला है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक इनकी घुसपैठ है। विश्व के पर्यावरण को, विभिन्न क्षेत्रों में उद्भूत संस्कृतियों को इन कम्पनियों ने रोड रोलर की तरह रौंद डाला है।
यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने पश्चिम के देशों को अपने उपनिवेश बनाने में बड़ी मदद दी। इस उपनिवेशीकरण ने पश्चिम के देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का भरपूर अवसर दिया। उपनिवेशी ताकतों की छत्र छाया में इन्होंने लातीनी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के देशों से सस्ता कच्चा काल बटोरा और अपने महंगे बने बनाएमाल से उनके बाजारों को पाट दिया। नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यवस्था टूट गयी और सम्पन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में धकेले दिये गये। द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कम्पनियाँ तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बनाए रहीं। उपनिवेशकाल में जो काम पुलिस-फौज के हथियार करते थे, उत्तर उपनिवेशकाल में वह काम विश्व बैंक और मुद्राकोष की सहायता से ऋण के हथियार द्वारा किया गया। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तीसरी दुनिया में निर्बाध रूप से अपने पाँव पसारने का कानूनी हक गैट के यूरूग्वे चक्र की समाप्ति पर बने विश्व व्यापार संगठन ने दे दिया जिसके तहत ये कम्पनियाँ इन देशों से राष्ट्रीय व्यवहारपाने की हकदार बन गयी है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्तता को नष्ट कर दिया है तथा व्यापक पैमाने पर गैर-बराबरी, और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलाई है। अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलस्वरूप फैलते सामाजिक तनाव के शिकार हो रहे हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बढता मकडजाल न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनियां में मानवीय संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। इसलिए इनके खिलाफ चलने वाले इस अभियान में हम सभी एकजुट होकर आवाज उठायेंगे तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर सकेंगे।
राजीव दीक्षित
सेवाग्राम, वर्धा
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल
मानव सभ्यता के विकास के इतिहास में किसी भी नयी खोज ने इतने मनोवेग, गहरे-संदेह, तीखी आलोचना व सनसनी को जन्म नहीं दिया, जितना कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने। जासूसी उपन्यासों का सा रोमांच पैदा करने वाली इनकी रहस्यपूर्ण गतिविधियों की जब कलई खुलती है तो अन्तर्राष्ट्रीय प्रेस जगत भी भौंचक्का रह जाता है जो कि स्वयं इस तरह की कारगुजारियों का भंडाफोड़ करने का आदी है। रोशनी की एक नीली सी लकीर अन्तर्राष्ट्रीय जगत के उन पुरोधाओं को भी चकाचौंध से आँखें भींचने पर मजबूर कर देती है, जो इस मुगालत में रहते है कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति उनके इशारों पर संचालित होती है।
आज ऐसे किसी भी बड़े अन्तर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय विवादों को ढूँढ़ पाना कठिन है जिनके पीछे कहीं न कहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थ न जुड़ें हों। किसी आर्केस्ट्रा के संचालक की भाँति ये कम्पनियाँ यह निर्धारित करती है। कि देश के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों एवं नेताओं को किस प्रकार के स्वर निकालने चाहिए। ये कम्पनियाँ उनके प्रति विशेष रूप से निर्मम होती हैं जो उनकी बात नहीं मानते। ऐसे लोगों को सीधे-सीधे उनके पदों से हटा दिया जाता है या उनकी हत्या करवा दी जाती है। इसलिए इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सुपर स्टेटभी कहा जाता है। जिन देशों की ये कंपनियों होती हैं उन देशों की सरकारें भी इनसे भयभीत रहती है क्योंकि ये राज्य के ऊपर एक अधिराज्य के रूप में काम करती हैं। अब राज्य की नीति’, ‘राज्य की शक्ति’, ‘राज्य की सम्प्रभुता’, आदि शब्द अर्थहीन हो गये है। इन कंपनियों की नीतियों से ही अब राज्य की नीतियां निर्धारित होती है। किन्तु विकसित देश इनको बर्दास्त करते हैं और इनका पोषण भी करते है क्योंकि ये कम्पनियां उनके लिए विकासशील व अविकसित देशों का दोहन करती हैं और नये साम्राज्यवाद को बनाये रखती है।
इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आपस में अनिष्टकारी गठजोड़ वास्तव में नयी सम्प्रभु शक्ति है। ये कंपनियाँ विशाल राजनैतिक शक्ति वाले अधिकाधिक स्वाधीन केन्द्र बनते जा रहे है जिन्होंने दुनिया के सभी देशों में राज्य के अन्दर राज्य जैसा कुछ बना लिया है जिसने स्वतन्त्र शक्ति हासिल कर ली है। इन कम्पनियों की ताकत का अनुमान इस बात से ही आसानी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली राज्य भी इन कम्पनियों की अवैध गतिविधियों पर रोक नहीं लगा सकता है। अमेरिका के फडरल रिजर्व बोर्डको इस बात की जानकारी नहीं होती है कि कितना यूरो डालरकहां और किसके पास है ? और वह अमेरिका में कैसे प्रवेश कराया गया है ? (विदेशों में जमा तरल मुद्रा का भंडार यूरो डालरकहलाता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास करीब 3100 अरब डालर (78,000 अरब रूपये लगभग) की तरल परिसम्पतियाँ बताई जाती है जो विश्व की सभी सरकारों की तरल परिसम्पतियों का लगभग तीन गुना है। इनमें जरा सा भी परिवर्तन करने पर विश्व भर में भयंकर वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
सन् 1988 में संसार के कुछ प्रमुख देशों की कम्पनियों ने 10,720 अरब डालर (20,2960 अरब रूपये लगभग) का व्यापार किया। देशों के अनुसार, कम्पनियों के व्यापार का आँकड़ा निम्न है:-
अमेरिका          4807 अरब डालर                    (36,526 अरब रू.)
जापान              2843 अरब डालर                    (51,174 अरब रू.)
पश्चिम जर्मनी  1201 अरब डालर                    (21,618 अरब रू.)
फ्रांस                 947 अरब डालर                      (17046 अरब रू.)
इटली                828 अरब डालर                      (14,904 अरब रू.)
ब्रिटेन               813 अरब डालर                      (14,634 अरब रू.)
कनाडा              482 अरब डालर                      (8,676 अरब रू.)
 (स्रोतः फारचून, जून 1990)
अब राजनैतिक रूप से किसी देश को गुलाम बनाना सम्भव नहीं है। अतः देशों को आर्थिक रूप से इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिये गुलाम बनाया जाता है। ये कम्पनियाँ आर्थिक साम्राज्यवादी शोषण का एक प्रमुख हथियार है। किसी भी देश की राजनैतिक व्यवस्था को नियंत्रित किया जाता है, इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा। क्योंकि राजनीति अपने आप में कोई एक निरपेक्ष तत्व नहीं है। दूसरी ओर आर्थिक व्यवस्था भी अपने आप में अन्तिम सत्य नहीं है। यदि किसी देश की राजनैतिक व्यवस्था में किंचित परिवर्तन होता है तो आर्थिक होता है तो आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था एक बडे़ अनुपात में बदलती है और समाजीकरण का पूरा ढाँचा ही परिवर्तित हो जाता है। जिससे जीवन मूल्यों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है और एक मिश्रित संस्कृति का आविर्भाव होता है जिसके पैर अपनी ही जमीन से उखड़कर किसी दूसरी जमीन की तलाश में होते हैं।
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