गुलाम होती खेती



गुलाम होती खेती
आजकल देश में एक नारा बहुत जोर शोर से इन कम्पनियों द्वारा दिया जा रहा है कि खेती को उद्योग बनाओ। यानि अब खेत को कारखाना बनाने की साजिश देश में चल रही है। अब ये कम्पनियाँ खेती के बल पर और अधिक मालामाल होने के सपने देख रही है। हमें याद होना चाहिए कि आज से लगभग 30 वर्ष पहले इन्ही कम्पनियों द्वारा देश मेंहरित क्रान्तिका नारा दिया गया था। खेती की उन्नति और विकास के नाम पर चले इस नारे ने भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और उसके साथ जुड़ी हुयी, समाज व्यवस्था को चौपट करके रख दिया। उसी तरह अब खेती की उन्नति के नाम पर खेती को उद्योग का दर्जा देने की बात भारत के सामान्य और बहुसंख्यक किसानों के लिये देश की बची खुची कृषि व्यवस्था के लिये घातक सिद्ध होगी।
                इन कम्पनियों द्वरा निरंतर यह प्रचारित किया जा रहा है कि खेती में विदेशी पूँजी निवेश की अत्यधिक जरूरत है। जिसके बिना अब खेती का विकास नहीं हो सकता है। यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है। वास्तव में खेती स्वयं ऐ ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें से पूँजी का निर्माण होता है, हरित क्रान्ति की नारे बाजी से खेती को ऐसी दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति में ला दिया गया है कि खेती को पूँजी की जरूरत हो। आज खेती को उद्योग बनाने की बात कहकर इस बात की कोशिश की जा रही है कि खेती का रोजमर्रा का सामान्य काम भी बिना पूँजी के न चल सके। खेती के लिये मुख्य तौर से दो ही चीजें आवश्यक होती है- एक किसान की मेहनत और पशु की मेहनत; दूसरे धरतीख् बीज, खाद, पानी आदि प्राकृतिक साधन। ये दोनों ही चीजें ऐसी है जो कहीं बाहर से लाने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार खेती एक सम्पूर्ण स्वावलंबी धंधा है।
                किसान एक बीज बोता है लेकिन इस बीज में से जो भी दाने प्राप्त होते है, उनमें से हर एक दाना फिर बीज का काम करता है। इस प्रकार खेती एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें लगाये हुये मूल का कई सौ गुना प्रतिफल मिलता है और जिसमें से बचत हो सकती है और बचत से ही पूँजी बनती है। कारखाना किसी भी चीज का हो, न तो उसमें चीज सचमुच पैदा होती है, न ही उसका गुणाकार होता है। कारखाने में केवल कच्चे माल का रूपांतर होता है, नया उत्पाद नहीं। कारखानों में जिस कच्चे माल से चीजें तैयार होती है, वह कच्चा माल भी अधिकतर खेती से ही प्राप्त होता है। यह एक विडंबना ही है कि वास्तव में उत्पादन और पूँजी का निर्माण करने वाला किसान खाद, बीज और कीटनाशकों के लिये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम बन गया है। अपनी मेहनत जे खुद उसके पास है तथा प्राकृतिक तत्व जो सब जगह उपलब्ध है इन दोनो के संयोग से खुद उत्पादन करने वाले किसान को आज भिखारी बनाकर रख दयिा है इन विदेशी कम्पनियों ने। वास्तव में खेती कोई धंधा नहीं है वह जीवन जीने की प्रक्रिया है। जो खेती को धंधा बनाना चाहते है, उनका उद्देश्य है कि जीवन जीने की इस स्वावलंबी शैली को परावलंबी बना दिया जाय ताकि किसान का और खेती का शोषण किया जा सके। स्वावलंबी समाज में लोग अपनी मेहनत पर जीने वाले होते है, दूसरे के शोषण पर नहीं। खेती को उद्योग का दर्जा देने का मतलब है किसान को गुलाम बनाना। जब खेती को उद्योग की तरह चलाया जायेगा तो अधिक अन्न उपजाने के लिये बीज, खाद, कीटनाशक दवायें और पानी खरीदने के लिये किसान को और अधिक बाध्य कर दिया जायेगा। इसके लिये उसे कर्जा दिया जायेगा। फिर उस कर्ज की अदायगी में उसकी फसल उससे ले ली जायेगी। इस प्रकार वह पूरी तरह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व बाजार का बंधुआ मजदूर बन जायेगा।
                बड़े-बड़े फार्म बनेंगे तो जमीन छोटे किसानों से खरीदी जायेगी। इस तरह जमीन का मालिक धीरे-धीेरे इन कम्पनियों की कृपा से जमीन पर काम करने वाला मजदूर बन जायेगा; फिर वह किसान नही रहेगा। बीज का धंधा पश्चिम के देशों ने विकास की अपनी अवधारण को दुनिया के कमजोर देशों पर लादा है। विकास एक नये प्रकार की गुलामी का मन्त्र बन गया है। हरित क्रान्ति इस प्रकार के विकास का एक बेशर्म उदाहरण है। इस तथाकथित क्रान्ति की शुरूआत रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा ऐसे बीज तैयार करने के साथ हुई जिनसे उपज बढ़ जाती है। अतः ऐसे संकर बीजों का उत्पादन इन विदेशी कम्पनियों ने करना शुरू किया। इस बीज की दो प्रमुख विशेषतायें होती हैं जो विदेशी कम्पनियों के लिये अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुयीं। पहली विशेषता यह है कि इस संकर बीज से अधिक उपज प्राप्त करने के लिये भारी मात्रा में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं की  आवश्यकता होती है। इन बीजों से पैदा होने वाली फसलों पर कीड़ा भी बहुत जल्दी और अधिक लगता है। जब अधिक रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं की आवश्यकता हुयी तो इन कंपनियों ने खाद व दवाओं को बनाकर बेचना शुरू किया और हरित क्रान्ति के दौरान अकूत मुनाफा बटोरा। इस संकर बीज की दूसरी विशेषता यह है कि सिर्फ एक बार ही फलता है। इस बीज से जो दाने पकते हैं, वे पुनः बीज का काम नहीं देते है, इसलिये किसान को हर साल नया बीज खरीदना पड़ता है। अतः जैसे-जैसे संकर बीज का चलन बढ़ता गया वैसे-वैसे बीज का बाजार विदेशी कम्पनियों के लिये पैदा होता गया। भारत में एक वर्ष में (सन् 1987 में) इन कम्पनियों ने जो बीज बिक्री किए है उसका आंकड़ा नीचे दिया जा रहा है:-



विदेशी कम्पनी का नाम
 बीज की बिक्री
पायोनियर         
169.26 करोड़ रुपये
शेल       
66.50 करोड़ रुपय
सैन्डोज         
54.91 करोड़ रुपय
फाइजर        
28.19 करोड़ रुपय
अपजोन        
38.00 करोड़ रुपय
आई. सी. आई.       
30.40 करोड़ रुपय
लीमाग्रेन
32.49 करोड़ रुपय
सीबा-गायगी      
28.88 करोड़ रुपय
लाफार्ज 
28.50 करोड़ रुपय
वोल्वो
26.60 करोड़ रुपय

इसके अतिरिक्त 16 सित्म्बर 1988 को सरकार द्वारा घोषित नयी बीज-नीतिके तहत कुछ और विशालकाय विदेशी कम्पनियों ने बीज का व्यापार शुरू कर दिया है। वे कम्पनियाँ निम्न है:-
1. कारगिल सीड कार्पोरेशन
2. पी. एच. आई. बायोजीन लिमिटेड
3. नेशनल आर्गेनिक लि. 
4. बेजो शीतल सीड कम्पनी
5. आई. टी. सी.
6. हिन्दुस्तान लीवर 
कीटनाशकों का कहर
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रायपुरा-जंगला गांव में 15 अप्रैल 1990 की रात को एक समारोह में विषाक्त भोजन खाने से 200 से अधिक लोग मारे गये। इस दर्दनाक हादसे के कारणों का सही-सही पता चला;
जब पूरी जांच की गयी। जांच के बाद पाया गया कि लोगों की मोत अत्यन्तक घातक कीटनाशक पैरथियान और ई.एन.पी. के कारण हुयी। जिस गेहूं की बनी पूडियाँ इस भोज में खायी गयी उस गेहूं में ये दोनों कीटनाशक मिले हुये थे। उल्लेखनीय है कि इन दोनों कीटनाशकों पर सभी पश्चिमी देशों में रोक लगी हुयी है। ये दोनों कीटनाशक संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भी प्रतिबन्धित है। मगर हमारे देश में ये दोनों ही कीटनाशक इन विदेशी कम्पनियों द्वारा बनाये जा रहे है और धड़ल्ले से बि रहे है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जाल में फंसकर यह माना गया कि खेती की उपज बढ़ाने के लिये यदि ढेरों तरह के जहरीले कीटनाशी रसायनों का भरपूर इस्तेमाल जारी नहीं रहा तो कीटाणु सारी फसल को चट कर जायेंगे और सारी मानवता भुखमरी की चपेट में आ जायेगी। इन कम्पनियों द्वारा प्रचारित विकास; किसी अन्य विकल्प को प्रकृति प्रेमियों व पर्यावरणवादियों का सुहाना सपना समझकर उसकी खिल्ली उड़ाता है। मिट्टी की हिफाजत
का परम्परागत देशी तौरतरीका, खरपतवार, घरेलू व कृषीय कूड़ा-कचरा और जानवरों के मल-मूत्र से बनी खाद, परस्पर मदद पहुँचाने वाली फसलों का बारी-बारी से बोया जाना यानी फसल-चक्र, यह सब विदेशी
कम्पनियों, द्वारा विकसित तकनीक ने लील लिया है। मिट्टी, हवा, पानी और फसल के बीच जो प्राणवान, समन्वित और निरापद नाता था, वह बेमानी हो गया है। उसक स्थान ले लिये बेकस मिट्टी और जहरीले
रासायनिक द्रव्यों ने।
हरित क्रान्तिके बाद खेती रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर होकर रह गयी है। इसका नतीजा यह है कि जो अनाज जीवनदायी माना जाता है, वही उर्वरकों व कीटनाशकों के कारण गुणवत्ता में निम्न स्तर का होकर अस्वास्थ्यकर और जानलेवा तक होने लगा है। हरित क्रान्तिके दौरान अनाज उत्पादन में चमत्कारिक वृद्धि असल में एक मिथक है, उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सन् 1947 के बाद के पहले दशक में जहाँ अन्न उत्पादन में 3.5   प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुयी। वहीं अगले दशक में अर्थात् 60 के दशक में यह दर मात्र 2.25   प्रतिशत रही। यह दर दो दशकों तक जारी रही। एकमात्र गेहूं ही ऐसा अनाज है जिसका उत्पादन 4.5   वार्षिक दर से बढ़कर 7.62   हो गयी लेकिन दूसरी ओर का सच यह है कि बाकी अन्य सभी अनाजों की वृद्धि दर लगातार घटती गयी। इन आँकड़ों से हरित क्रान्ति के भोजन पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते है। हरित क्रान्ति के दौरान गेहूं का उत्पादन क्षेत्र बढ़ता गया और मोटे अनाजों, दालों, तिलहन आदि का उत्पादन क्षेत्र घटता गया। इस कारण भोजन में प्रोटीन की मात्रा घटती गयी। नये अनाजों का असर पशुओं को भी झेलना पड़ रहा है क्योंकि ज्यादा उपज देने वाली
फसलों का भूसा पोषक तत्वों के मामले में कमजोर होता है। आज अनाज, फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन, दूध और मांस-मछली तक सभी में विषाक्त तत्वों की भरमार है जो एक धीमी मौत की ओर हमें धकेल रही है। इसके बावजूद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न केवल जारी है बल्कि तेजी से बढ़ भी रहा है। आँकडों पर नजर डालें तो विशेषज्ञों का कहना है कि सन् 1960 से 1980 के दोरान भारत में
कीटनाशकों की खपत में 20 गुना इजाफा हुआ है। इस दौरान कीटनाशकों के उत्पादन में 14   की बढ़ोत्तरी हुयी है और इनका आयात भी इस बीच 7 गुना बढ़ा। सन् 1989 से 1990 के बीच में कीटनाशकों की खपत 1 लाख 20 हजार टन हुयी। इसमात्रा का दो तिहाई भाग खेती में इस्तेमाल हुआ।
एक अनुमान के अनुसार पिछले 20 वर्षो में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 10  फसल को बचा लिया गया। लेकिन जिस अनुपात में इन कीटनाशकों का जहर भोजन के जरिये देशवासियों के शरीर में पहुँचा है और उससे जो हानि हुयी व हो रही है, उसे देखते हुये 10   फसल को बरबाद होने से बचाने की उपलब्धि बहुत महंगी है। जन और धन की इस व्यापक हानि के सामने 10   फसल की बरबादी का जोखिम सस्ता ही ठहरेगा। इन कीटनाशकों के कारण देश में कितने लोग काल-कवलित हुये है, इसके सही-सही आँकड़े अभी तक उपलब्ध नहीं है। कीटनाशक मिले भोजन व असावधानीवश कीटनाशकों के सम्पर्क में आने के कारण जहाँ हजारों लोग मौत के मुंह में समाये हैं वहीं इन कीटनाशकों से पैदा होने वाली बीमारियाँ भी आम होती जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में भारत तीसरे नंबर पर है जहाँ कीटनाशक हादसे ज्यादा और हर साल होते है। इन कीटनाशकों से जोड़कर उनकी शिनाख्त करना बहुत लंबी प्रक्रिया है।
कीटनाशकों से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि भारत जैसे विकासशील देश में इस्तेमाल होने वाले 70   कीटनाशक ऐसे हैं जिन पर विकसित देशों में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। डी.डी.टी. हमारे देश्ज्ञ में एक आम कीटनाशक है पर अन्य अनेक देशों में यह प्रतिबंधित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जमीन, वनस्पति और शरीर पर इसका बहुत लंबे समय तक घातक असर बना रहता हैं मगर अपने देश में कृषि क्षेत्रों में इसकी खपत 3500 टन प्रतिवर्ष तथा मलेरिया उन्मूलन आदि कार्यक्रमों में 4000 टन प्रतिवर्ष है। बी.एच.सी. (बेंजीन हेक्साक्लोराइड), मिथाइल पैराथियान, हैप्टाक्लोर, डाई ब्रोमोक्लोरो प्रोपेन, एजेंट आरेंज, फास्वेल, डेल्ड्रिन, क्लोरेडेन, बूटाक्लोर जैसे कीटनाशक जो पश्चिमी देशों सहित दुनिया के कई अन्य
देशों में प्रतिबन्धित हैं, जिनका बेचना उन देशों में गंभीर अपराध घोषित हो चुका है, उन्हीं कीटनाशकों के घातक असर का अहसास करने के लिये इन हरित क्रान्तिके झंडाबरदारों को कितनी भोपाल त्रासदियों का इंतजार है।
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