राजस्थानी लोक नृत्य


लोक कला की समस्त विधाओं में लोकनृत्यों, लोकनाट्यों, लोक वाद्यों, लोक संगीत इत्यादि का महत्वपूर्ण स्थान है। इन विधाओं में लोक जीवन, मनोरंजन और संस्कृति का अनुपम रूप निहारने को मिलता है। इन कलाओं के प्रणेता न ऋषि-मुनि थे और न ही इनके लिए कोई ग्रंथ रचे गये। मानव के क्रियाकलापों, सामुदायिक वातावरण और परम्परागत अभ्यास ने इन कलाओं को जन्म दिया तथा जीवित रखा। मौखिक स्मरण और लौकिक रूढ़ियों से ढली यह कलाएँ आज भी जीवित हैं। युग-युगान्तर से पनपी यह कलाएँ राजस्थान की संस्कृति की प्राण बनी हुई हैं। इन कला-विधाओं का संबंध ग्राम्य पृष्ठभूमि और आदिवासियों से होने के कारण इन्हें लोककलाएँ कहा जाता है। इनमें राजस्थान के व्यावहारिक जीवन का जीवन्त रूप दिखाई देता हैं। यदि राजस्थान को लोक कलाओं का अजायबघर कहा जाये तो अतिशयोक्ति न होगी। राजस्थान के ठेठ ग्रामीण जीवन को समझना है तो आपको उनकी भाषा के साथ उनके मनोरंजन के तरीकों की जानकारी प्राप्त करनी होगी। लोक कलाओं ने उनको कभी भी एकाकी नहीं होने दिया। समष्टिगत जीवन के आल्हादित क्षणों को राजस्थान के निवासियों ने लोक कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। यही कारण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी जिजिविषा बनी रही।



लोक नृत्य
लोक नृत्यों से राजस्थान की पहचान पूरे देश में है। लोक नृत्यों में शास्त्रीय नृत्य की तरह ताल, लय आदि का कड़ाई से पालन नहीं होता। समय-समय पर प्रसंग विशेष के अनुरूप जनमानस द्वारा रचे गये लोक नृत्यों में मानव जीवन का सहज चित्रण होता है। लोकोत्सव, पर्व, तीज-त्योहार, लोकानुष्ठान आदि के मोकों पर रंग-बिरंगी वेशभूषा और स्थान विशेष की परम्पराओं के अनुसार लोकनृत्य परम्परा शताब्दियों से चली आ रही है। मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गीदड़, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में प्रचलित घूमर, चंग एवं डांडिया राजस्थान के लोकप्रिय नृत्य हैं। राजस्थान की जनजातियों के लोक नृत्यों में भीलों के गवरी, गरासियों के वालर, गूजरों का चरी नृत्य, रामदेवजी के भोपों का तेरहताली नृत्य, पेशेवर लोकनर्तकों का भवाई नृत्य आदि रंग-बिरंगी छटा बिखरते हैं। राजस्थान में प्रचलित प्रमुख लोक नृत्यों का परिचय निम्नांकित है -


अग्नि नृत्य
अग्नि नृत्य जसनाथी सम्प्रदाय का प्रसिद्ध नृत्य है। इसका उद्गम स्थल बीकानेर जिले के कतरियासर गाँव में हुआ। यह मुख्यतः चूरू, नागौर और बीकानेर की जाट जाति का नृत्य है। यह नृत्य धधकते अंगारों पर पुरुषों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, नृत्यकार अंगारों से मतीरा फोड़ना का कार्य करते हैं। आग के साथ राग और फाग खेलना जसनाथी सम्प्रदाय के अलावा कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।

इण्डोनी नृत्य
इण्डोनी कालबेलिया जाति का प्रसिद्ध नृत्य है। इसमें पूँगी व खंजरी वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। यह गोलाकार आकृति में होता है। इण्डोनी में औरतों की पोशाक व मणियों की सजावट कलात्मक होती है।

कच्छी घोड़ी 
कच्छी घोड़ी शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। इसमें चार-चार व्यक्ति आमने-सामने खड़े होते हैं, जो आगे-पीछे बढ़ने का कार्य तीव्र गति से करते हैं। इस नृत्य में पंक्ति का तीव्र गति से बनने का और बिखरने का दृश्य फूल की पंखुड़ियों के खुलने का आभास दिलाता है।

गरबा नृत्य
गरबा बाँसवाड़ा और डूँगरपुर क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। इसका स्वरूप रास, डांडिया गवरी नृत्यों से अभिव्यक्त होता है। इसमें गीतों की लय भक्तिपूर्ण होती है। यह नवरात्रों में विशेष रूप से किया जाता है। इसमें समाज बिना भेदभाव से नृत्य का आनन्द लेता है। इसमें लोक जीवन, भक्ति एवं शक्ति का चित्रण किया जाता है।

गवरी नृत्य
गवरी मेवाड़ क्षेत्र के भीलों के द्वारा किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य है। यह सावन-भादों माह में किया जाता है। इसमें पार्वती की पूजा की जाती है। इस नृत्य में मांदल और थाली के प्रयोग के कारण इसे राई नृत्य के नाम से भी जाना जाता है। यह केवल पुरुषों का नृत्य है। शिवजी की अर्द्धांगिनी गौरी के नाम से इसका नाम गवरी पड़ा।

गीदड़ नृत्य
होली के अवसर पर किया जाने वाला गीदड़ शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। इसमें ताल, सुर और नृत्य का समन्वय देखने को मिलता है। इसे केवल पुरुष ही प्रस्तुत करते हैं। इस नृत्य के मुख्य वाद्य यंत्र नगाड़ा, ढोल, डफ व चंग हैं। नगाड़े की चोट पर पुरुष अपने दोनों हाथों के डण्डे को परस्पर टकराते हुए नृत्य करते हैं। यह नृत्य समाज की एकता का सूत्रधार है।

गैर नृत्य
गैर मेवाड़ क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है, इसकी लोकप्रियता बाड़मेर में भी है। यह होली के अवसर पर पुरुषों को उल्लास व स्फूर्ति प्रदान करता है। पुरुष लकड़ी की छड़ियाँ लेकर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। घेरे में नृत्य करने के कारण इसे गैर नाम से जाना जाता है। कृषक फसल काटने से नई फसल की बुवाई तक गैर करते रहते है। यह मुख्यतः भील जाति की संस्कृति को प्रदर्शित करता है।

घुड़ला नृत्य
घुडला, जो अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है, जोधपुर का प्रसिद्ध नृत्य है। इसमें जयपुर के मणि गांगुली और उदयपुर के देवीलाल सामर का मुख्य योगदान है। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के भूतपूर्व मंत्री कमल कोठारी ने घुड़ला को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया, जिससे राजस्थानी कला आमजन में लोकप्रिय बनी। इसमें छिद्रित मटके में दीपक जलता रहता है, उसे स्त्री अपने सिर पर उठाकर और सुन्दर श्रृ ंगार से घूमर और पणिहारी अन्दाज में चक्कर बनाकर नृत्य करती है और साथ में गीत भी गाती है।

घूमर नृत्य
नृत्यों का सिरमौर घूमर राज्य नृत्य के रूप में प्रसिद्ध है। यह मांगलिक अवसरों, पर्वों आदि पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। स्त्री-पुरुष घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। लहंगे के घेरे को घूम्म कहते हैं। इसमें ढोल, नगाड़ा और शहनाई आदि वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य में बार-बार घूमने के साथ हाथों का लचकदार संचालन प्रभावकारी होता है।

चंग नृत्य
चंग शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। इसमें प्रत्येक पुरुष चंग के साथ नृत्य करते हैं। यह मुख्यतः होली के दिनों में किया जाता है। चंग को प्रत्येक पुरुष अपने एक हाथ से थाम कर और दूसरे हाथ से कटरवे का ठेका बजाते हुए वृत्ताकार घेरे में नृत्य करते हैं। घेरे के मध्य में एकत्रित होकर धमाल और होली के गीत गाते हैं।

चकरी नृत्य
चकरी हाड़ौती क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। यह कंजर, कालबेलिया और बेड़ियाँ जाति की कु ंवारी लड़कियों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य की प्रख्यात नृत्यांगना गुलाबो है। गुलाबो ने पेरिस में आयोजित भारतीय उत्सव में अपनी कला का प्रदर्शन किया था। इसमें नृत्य करने वाली लड़कियाँ चंग की ताल पर तेज गति से चक्राकार रूप में नृत्य करती हुई चकरी की तरह घूमती है।

चरी नृत्य
चरी किशनगढ़ (अजमेर) का प्रसिद्ध नृत्य है। चरी नृत्य में बांकिया, ढोल एवं थाली का प्रयोग किया जाता है। इसे गुर्जर जाति पवित्र मानती है। स्त्रियाँ अपने सिर पर सात चरियाँ रखकर नृत्य करती हैं। इनमें से सबसे ऊपर की चरी में काकड़ा के बीज में तेल डालकर जलाये जाते हैं।

डांडिया नृत्य
डांडिया मारवाड़ का प्रसिद्ध नृत्य है। यह होली के बाद किया जाता है। फाल्गुन की शीतल चाँदनी में नर्तक नगाड़ा लकर मैदान में बैठ जाता है और इस मैदान के चौक के बीच में शहनाई वाले तथा गवैये (गायक) बैठते हैं। पुरुष लोक ख्यात को लय से गाते हैं। नर्तक बराबर लय से डांडिया टकराते हुए वृत्त में आगे बढ़ते जाते हैं। तेरहताली नृत्य तेरहताली नृत्य में मंजीरा, तानपुर व चौतारा वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रदर्शन उत्सवों व मेलों में देखने को मिलता है। नर्तकियाँ ध्वनि की लय को सुनने के पश्चात् बैठकर नृत्य करती हैं। इसमें तेरह मंजीरों की आवश्यकता होती है, जिसमें से नौ मंजीरे दायें पाँव पर, दो हाथों की कोहनी के ऊपर और एक-एक दोनों हाथों में होते हैं। हाथ वाल मंजीरे के टकराने से ध्वनि उत्पन्न होती है। यह नृत्य मुख्य रूप से रामदेव जी के मेल में देखने को मिलता है। कामड जाति तेरहताली नृत्य के साथ रामदेवजी का यशोगान करती है।

बम नृत्य
बम नृत्य भरतपुर और अलवर क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। यह नई फसल आने और फाल्गुन की मस्ती पर गाँवों में पुरुषों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में नगाड़े, थाली, चिमटा, ढोलक आदि वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। बम एक बड़ा नगाड़ा होता है, जिसे दोनों हाथों के मोटे डण्डे से बजाते हैं। बम की ध्वनि से रसिया गायन किया जाता है, जिसे बमरसिया भी कहा जाता है।

भवाई नृत्य
भवाई उदयपुर संभाग का प्रसिद्ध नृत्य है। यह शंकरिया, सूरदास, बीकाजी और ढोला मारू नाच के रूप में प्रसिद्ध है। इसमें अनूठी नृत्य अदायगी, शारीरिक क्रियाओं का अद्भुत चमत्कार और लयकारी की विविधता आकर्षक होती है। इसमें तेज लय के साथ सिर पर सात-आठ मठकी रखकर नृत्य करना, जमीन पर गिरे रूमाल को मुँह से उठाना, गिलासों पर नाचना, थाली के किनारों पर नृत्य करना आदि क्रियाएँ की जाती है।

वालर नृत्य
वालर सिरोही क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है। बिना वाद्य यन्त्रों के इसे गरासिया जाति के व्यक्ति करते हैं। यह नृत्य स्त्री-पुरुषों द्वारा विवाह के अवसर पर किया जाता है। इस वालर नृत्य का प्रारम्भ पुरुष अपने हाथों में तलवार या छाता लेकर करते हैं।

शंकरिया नृत्य
शंकरिया नृत्य कालबेलिया जाति के सपेरों द्वारा किया जाता है। यह प्रेम कहानी पर आधारित होने के कारण स्त्री-पुरुष दोनों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसमें अंग संचालन अति सुन्दर होता है।

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