बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताकत और विदेशी पूँजी का धोखा


बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताकत
भारत में इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कितनी ताकत है ? इनकी ताकत का एक अंदाज इसी बात से लागया जा सकता है कि दुनिया की सबसे बड़ी विशालकाय 100 बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ चुनी गयीं हैं। जिनके बारे में फारचूनपत्रिका के 31 जुलाई 1989 के अंक में एक टिप्पणी छपी थी:-
पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर चुनी गयी 100 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। जितनी तरह परिसम्पत्ति इन 100 कम्पनियों के पास हैं, उसमें जरा सी भी हेर-फेर कर देने पर पूरे विश्व की अथव्यवस्था चरमरा सकती है।इन सभी कम्पनियों की शाखायें दुनिया के 125 से भी अधिक देशों में है। 31 जुलाई 1995 तक इन 100 कम्पनियों में से 50 कम्पनियाँ भारत में काम कर रही हैं। इन 50 कम्पनियों में से प्रत्येक का वार्षिक कारोबार भारत सरकार के वार्षिक बजट से अधिक है।
वर्ष 1994 में इन कम्पनियों की विश्व भर में बिक्री तथा भारत में ये कम्पनियाँ किस रूप में कार्य कर रहीं हैं; इसका विवरण नीचे दी गयी तालिका में दिखाया गया है:-
विदेशी/बहुराष्ट्रीय कम्पनी
 वर्ष 1994 की बिक्री
 भारत में कार्यरत रूप
जनरल मोटर्स
 4936.032 अब्ज रुपये
 शाखा
फोर्ड मोटर्स
 4110.048 अब्ज रुपये
 शाखा
एक्सॉन   
 3246.688 अब्ज रुपये
 शाखा
वॉल मार्ट  
 2669.184 अब्ज रुपये
 शाखा
ए.टी. एण्ड. टी
 2403.008 अब्ज रुपये
 शाखा
जनरल इलेक्ट्रिक क
 2063.984 अब्ज रुपये
 शाखा
आई. बी. एम
 2049.664 अब्ज रुपये
 शाखा
मोबिल     
 1907.872 अब्ज रुपये
 शाखा
सीयर्स 
 1745.888 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्यम में
क्राइसलर
  1671.168 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्यम में
स्टेट फॉर्म
  1234.200 अब्ज रुपये
 --------
पू्रडेन्शियल कंपनी  
 1163.072 अब्ज रुपये
 सहयोगी कम्पनी
ई. आई. द्यूपौं    
 1118.976 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्यम/
मार्ट     
1098.016 अब्ज रुपये
 --------
सीटीकॉर्प 
 1012.800 अब्ज रुपये
 शाखा
शेवरॉन   
  994.048 अब्ज रुपये
 सहयोगी कंपनी
प्रॉक्टर एंड गँबल 
  969 अब्ज रुपये
 शाखा
पेप्सीको
  911 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
ऑमको
  862 अब्ज रुपये
 सहयोगी कंपनी
हेलवट पॅकार्ड  
  799 अब्ज रुपये
शाखा/सह. कंपनी
आय. टी. टी
  760 अब्ज रुपये
शाखा/सह. कंपनी
कोनाग्रा
  752 अब्ज रुपये
 सहयोगी कंपनी
क्रोजर 
  734 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
अमेरिकन इंटरनॅशनर ग्रुप  
 716 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
मोटोरीला
 711 अब्ज रुपये
 शाख/संयु. उद्योग
मेट्रोपॉलीटन लाईफ इन्शूरन्स कंपनी
 712 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
फिलीप मॉरिस   
 1720 अब्ज रुपये शाखा

टेक्साको
 1080 अब्ज रुपये
 सहयोगी कंपनी
बोइंग कॉरपोरेशन  
  701 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
डायटन-हडसन   
  681 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
युनायटेड टेक्नॉलॉजी  
  626 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
जे. सी. पेनी  
  674 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
डाऊ केमीकल्स 
  640 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
जी. टी. ई. स्टेमफोर्ड्र  
  638 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
युनायटेड पार्सल सर्विस
  626 अब्ज रुपये
 शाखा
फेडरेशन नॅशनल मॉरगेज
 

असोसिएशन ट्रॅव्हलर्स   
  590 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
सिग्न  
  588 अब्ज रुपये   
 संयुक्त उद्योग
अमेरिकन स्टोअर्स
  587 अब्ज रुपये
 शाखा
मेरिल लिन्ब   
  583 अब्ज रुपये
 शाखा
जेरॉक्स  
  570 अब्ज रुपये
 शाखा
अटना लाईफ इन्शुरन्स कंपनी
  560 अब्ज रुपये
 -----
ईस्टमॅन कोडक   
  539 अब्ज रुपये
 शाखा
बेलसाउथ  
  539 अब्ज रुपये
 संयुक्त उद्योग
यू.एस. एक्स.
  537 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
बँक ऑफ अमेरिका  
  528 अब्ज रुपये
 शाखा
प्राइस-कॉस्टको 
  527 अब्ज रुपये   
 संयुक्त उद्योग
कोका-कोला   
  517 अब्ज रुपये
शाखा/संयु उद्योग
ए. एम.आर.
  516 अब्ज रुपये   
 संयुक्त उद्योग
सुपर व्हॅल्यू
  509 अब्ज रुपये
 शाखा

विदेशी पूँजी का धोखा

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जब भी दुनिया के किसी देश में व्यापार करने के लिये जाती हैं तो वे उस देश के लिये भारी सिर दर्द बन जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के किसी भी देश में काम करने से ऐसा नहीं है कि मात्र आर्थिक दुष्प्रभाव ही पड़ते हों अपितु उस देश में इन कम्पनियों के व्यापक और गहरे प्रभाव नजर आते हैं। क्योंकि इन कम्पनियों का चरित्र ही ऐसा है कि ये देश की नीतियाँ बदलवाने के लिये सीधे राजनैतिक हस्तक्षेप करती है। सामाजिक जीवन भी इन कम्पनियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है।
जब ये कम्पनियाँ काम करने के लिये अन्य देशों में जाती हैं तो उनके पीछे कुछ मिथ्या धारणायें काम करती हैं जैसे ये अपने साथ पूँजी लायेंगी, आधुनिक तकनीक देंगी, लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया करायेंगी, देश का निर्यात बढ़ायेंगी, देश के भुगतान सन्तुलन की स्थिति को चुस्त-दुरूस्त रखेंगी, देश की आर्थिक संसाधनों में और अधिक वृद्धि करेंगी आदि-आदि। लेकिन असलियत ठीक इन सभी दावों से उल्टी होती है।
विदेशी कम्पनियों के पक्ष में सबसे बड़ी दलील दी जाती है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में पूँजी की बड़ी कमी होती है और पूँजी के अभाव में विकास नहीं हो सकता। इसलिये विदेशों से पूँजी आमन्त्रित करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है और पिछडे़पन के दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता है।
लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। ये विदेशी कम्पनियाँ बाहर से बहुत कम पूँजी लाती है, अधिकांश पूँजी यहां के बैंकों से कर्ज लेकर, यहाँ की जनता से कर्ज लेकर और उनको शेयर बेचकर एकत्रित करती हैं। देश में जितनी भी विदेशी कम्पनियाँ कार्य कर रही हैं, वे औसतन 5 प्रतिशत तक पूँजी ही बाहर से लाती है। बाकी 90 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक पूँजी ये भारतीय स्रोतों से ही एकत्रित करती हैं।
कितनी पूँजी, कितना धोखा
भारत में व्यापार कर रही 45 प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने जब व्यापार शुरू किया तो कितनी पूँजी लगायी थी, इसके बारे में कुछ तथ्य नीचे दिये जा रहे हैं:-
बहुराष्ट्रीय कम्पनी 
आने का वर्ष
लायी गयी पूँजी
शालीमार पेन्टस लि.
 1901
 63 लाख रुपये
बी.एस.टी. इंन्डस्ट्रीज लि.
 1930
 1.85 कोटी रुपये
बाटा इण्डिया लि.
 19+31
 70 लाख रुपये
हिन्दुस्थान लीवर लि.
 1933
 24 लाख रुपये
युनियन कार्बाईड इण्डिया लि
 1934
 8.36 कोटी रुपये
क्रॉम्प्टन ग्रीव्स लि.
 1937
 3 कोटी रुपये
न्यू इन्डीया इंडस्ट्रीज लि.
 1942
 27 लाख रुपये
बूट्स कंपनी इंडिया लि.
 1943
 1.10 कोटी रुपये
जॉफ्रीमॅन कंपनी लि.
 1943
 5 लाख रुपये
क्लोराइड इंडिया लि.
 1946
 2.11 कोटी रुपये
ब्यूको वुल्फ इंडिया लि.
 1947
 39 लाख रुपये
बेकेलाईट हायलम लि.
 1947
 1 कोटी रुपये
हिन्दुस्थान सीबा गायगी लि.
 1947
 4.57 कोटी रुपये
सायनामिड इंडिया लि.
 1947
 1.39 कोटी रुपये
कोटस् इंडिया लि.
 1947
 38 लाख रुपये
जर्मन रेमेंडीज लि.
 1949
 64 लाख रुपये
मोटर इंडस्ट्रीज कंपनी लि.
 1951
 3.35 कोटी रुपये
ओटीस वलीवेटर कंपनी लि
 1953
 72 लाख रुपये
कार्बोरेंडम युनीव्हर्सल लि.
 1954
 1.06 कोटी रुपये
फेनर इंडिया लि.
 1955
 64 लाख रुपये
हेक्स्ट इंडिया लि.
 1956
 2.72 कोटी रुपये
केबल कार्पोरेशन इडिया
 1956
 3.40 कोटी रुपये
इंग्लिश इलेक्ट्रीक कंपनी
 1956
 2.25 कोटी रुपये
सीमेन्स इंडिया लि.
 1956
 2.40 कोटी रुपये
पॉलीकेम लीमिटेड
 1956
   56 लाख रुपये
डॉ. बँक अँन्ड कंपनी लि.
 1956
   16 लाख रुपये
जॉन्सन अँन्ड जॉन्सन लि.
 1957
   24 लाख रुपये
कलर केम लि.
 1957
  1.25 कोटी रुपये
बायर इंडिया लि.
 1957
 3.59 कोटी रुपये
फूड स्पेशॅलिस्ट लि. 
   1958
 4.51 कोटी रुपये
डेव्हीर्चड ब्राउन ग्रिव्हज लि.
 1959
 36 लाख रुपये
अॅटलास कापको इंडिया लि
 1959
 1.33 कोटी रुपये
के. एस. बी. पंप्स लि.  
  1959
 86 लाख रुपये
मॅथर अँड प्लँट लि.
 1959
 1.83 कोटी रुपये
फिलिप्स कार्बन ब्लॅक लि.
 1959
 1.57 कोटी रुपये
सँडविक एशिया लि.
 1960
 1.17 कोटी रुपये
ऑडको इंडिया लि.
 1961
 12  लाख रुपये
किर्लोस्कर कमिन्स लि.
 1961
 50  लाख रुपये
आय. डी. एल. केमीकल्स लि
 1961
 1.07 कोटी रुपये
गेस्ट कीन विलियम्स लि.
 1962
 7.69 कोटी रुपये
सुन्दरम क्लोटन लि.
 1962
 1.96 कोटी रुपये
रिचर्डसन हिंदुस्थान लि.
 1964
 1.17 कोटी रुपये
नीडल रोलर बेअरिंग कंपनी
 1965
 10 लाख रुपये
विडिया इंडिया लि. 
  1965
 45 लाख रुपये
सेन्चूरी एन्का लि.
 1965
 2.97 कोटी रुपये

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा पूँजी निवेश मात्र एक धोखा है। हिन्दुस्तान लीवर, कालगेट, सीबागाइगी जैसी सैकड़ों विदेशी कम्पनियों ने मात्र कुछ लाख रूपये से भारत में व्यापार शुरू किया। लाभ कमा-कमा कर बोनस शेयर के रूप में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपनी शेयर पूँजी कराड़ों रूपये में कर ली। अब ये कम्पनियाँ रॉयल्टी, शुद्ध लाभ और टेक्नीकल फीस के रूप में अरबों रूपये भारत से बाहर ले जा रही हैं। इस बात की गंभीरता का अहसास इसी से हो जाता है कि 1976.77 में जहाँ भारत में कार्यरत विदेशी कम्पनियाँ 121.54 करोड़ रूपये देश से बाहर ले गयीं, वहीं 1986-87 में यह राशि बढ़कर 494.6 करोड़ रूपये हो गयी। पिछले 11 वर्षों में ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ वैधानिक रूप से 3244.15 करोड़ रूपये भारत से बाहर ले जा चुकी हैं, जबकि अवैधानिक तरीके से ये कम्पनियाँ इससे कई गुनी अधिक राशि देश से बाहर ले जा चुकी हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भारत में शेयर पूँजी लगभग 675 करोड़ रूपये मात्र है। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ देश के खून-पसीने की कमाई विदेशी मुद्रा का निर्यात अपने मूल देशों को कर रही हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने पूँजी के नाम पर कैसा मकड़जाल इस देश पर फैलाया है, इसका अनुमान दो-तीन उदाहरणों से लगाया जा सकता है।
हिन्दुस्तान लीवर ने भारत में सन् 1933 में जब व्यापार शुरू किया तब इसकी मूल कम्पनी यूनीलीवर ने मात्र 24 लाख रूपये लगाये। 1933 में प्रारम्भ हुयी इस कम्पनी ने ऐसा जाल बिछाया कि 1990 में इसकी मूल कम्पनी यूनीलीवर की शेयर पूँजी 47.59 करोड़ रूपये हो गयी। इसमें से 44.51 करोड़ रूपये की शेयर पूँजी बोनस के रूप में जुड़ी। 1975 से 1990 तक के बीच हिन्दुस्तान लीवर ने 80.18 करोड़ रूपये लाभांश के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। यह रकम रायल्टी और तकनीकी शुल्क के अतिरिक्त है।
इसी तरह कालगेट-पामोलिव कम्पनी ने सन् 1937 में मात्र 1.5 लाख रूपये से अपना कारोबार शुरू किया। 1989 के आते-आते अमरीकी कम्पनी कालगेट-पामोलिव की शेयर पूँजी बढ़कर 12.57 करोड़ रूपये हो गयी। इसमें 12.56 करोड़ रूपये की पूँजी बोनस शेयर के रूप में जुड़ी। कालगेट-पामोलिव कम्पनी 1977 से 1989 के बीच में 18.42 करोड रूपये लाभांश के रूप में भारत से अमरीका ले गयी।
स्विस कम्पनी सीबा गाइगी ने 1947 में 48.75 लाख रूपये से कारोबार शुरू किया। 1991 में इस कम्पनी की शेयर पूँजी बढ़कर 13.54 करोड़ रूपये हो गयी। इलैक्ट्रानिक उद्योग में लगी फिलिप्स कम्पनी ने 1956 में सिर्फ 10 लाख रूपये में अपना कारोबार शुरू किया, सन् 1974 में इस कम्पनी ने 10 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में भारत से होलैण्ड भेज दिया। रिजर्व बैंक की 1992 की रिपोर्ट के अनुसार 1987-88 में 326 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की शेयर पूँजी 1445.23 करोड़ रूपये थी, इनमें 60 प्रतिशत हिस्सा भारतीय लोगों का हुआ था, 610 करोड़ रूपये बैंकों के थे और 50 करोड़ सरकार के थे।
सामान्यतः बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जितनी पूँजी लेकर आती है, उससे कई गुना अधिक पूँजी तो वे एक ही वर्ष में देश के बाहर भेज देतीहैं। उदाहरण के लिये गुडईयर कम्पनी ने भारत में 1 करोड़ रूपये पूँजी का निवेश किया। यह पूँजी निवेश इस कम्पनी ने भारत में अपना कारोबार शुरू करने पर किया था। लेकिन 1989 में गहुडईयर ने 7.33 करोड़ रूपया भारत से बाहर मुनाफे के रूप में भेज दिया। अर्थात् एक ही वर्ष में पूँजी निवेश का सात गुना देश से बाहर भेज दिया। इसी तरह बायर इंडिया का भारत में आरम्भिक पूँजी निवेश 8.29 करोड़ रूपये था, लेकिन 1989-90 में ही इस कम्पनी ने 13.3 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। ग्लैक्सो इंडिया की भारत में चुकता पूँजी 2.88 करोड़ रूपये की है, लेकिन इस कम्पनी ने 1989-90 में 3.93 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में देश से बाहर भेज दिये। अमरीकी कम्पनी फाइजर ने, भारत में जब अपना कारोबार शुरू किया तो मात्र 5 लाख रूपये लगाये और कारोबार शुरू होने के पहले ही वर्ष में फाइजर ने 4.83 करोड़ रूपये भारत से अमरीका भेज दिया। इसी तरह अमरीकी कम्पनी एबट लेबोरेटरीज ने मात्र 1 लाख रूपये की पूँजी से कारोबार शुरू करके, अगले ही वर्ष में 23 लाख रूपये भारत से अमरीका भेज दिया। ग्रेशम एण्ड कविन कम्पनी अपनी चुकता पूँजी का 7.65 गुना मुनाफा हर साल विदेश ले जाती है। सिगरेट बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनी आई.टी.सी. अपनी कुल चुकता पूँजी पर लगभग 11364 प्रतिशत मुनाफा कमा रही है। लगभग सभी अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपनी चुकता पूँजी का 860 प्रतिशत मुनाफा भारत से कमा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुनाफे, लाभांश, रॉयल्टी और तकनीकी फीस के रूप में कितना धन देश से बाहर ले जा रही है, इसकी जानकारी के लिये नीचे तालिका दी गयी है:-
कितना लूट कर ले जा रही हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
वर्ष    मुनाफे के रूप में लाभांश के रूप में रायल्टी के रूप में तकनीकी फीस के रूप में
(करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)

वर्ष  
मुनाफे के रूप में (करोड़ रू.)
लाभांश के रूप में (करोड़ रू.)
रायल्टी के रूप में (करोड़ रू.)
तकनीकी फीस के रूप में (करोड़ रू.)
1965&66
   13.50
 19.40  
 2.95
 6.98
1966&67
   14.47
 28.77  
  5.13
 10.43
1967&68
   15.95
 32.70  
  4.32
 14.68
1968&69
   12.96
 30.25  
  4.78
 17.97
1969&70
   12.72
 31.14  
  5.80
 13.05
1970&71
   13.12
 43.48  
  5.23
 20.63
1971&72
   09.94
 38.87  
  5.86
 13.90
1972&73
   15.54
 39.08  
  7.33
 11.33
1973&74
   21.91
 37.51  
  6.21
 14.08
1974&75
   07.19
 18.46  
  8.46
 12.56
1975&76
   20.36
 24.84  
  10.49
 25.66
1976&77
   19.39
 48.47  
  15.88
 37.88
1977&78
   10.13
 68.01  
  19.50
 28.14
1978&79
   10.24
 54.35  
  12.65
 55.52
1979&80
   14.37
 50.92   
   9.53
 43.97
1980&81
   12.10
 55.92  
   8.88
 104.93
1981&82
  12.16
 58.92   
   15.99
270.70
1982&83
  19.12
 70.31     
  39.72
258.58
1983&84
  20.00
 62.11   
  27.60
314.89
1984&85
  16.68
 74.58   
  28.49
300.90
1985&86
  11.80
 75.20   
  23.50
367.90
1986&87
  10.60
 85.50
  40.10
358.40

स्रोत: रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया रिपोर्ट 1989
सन् 1978 में भारत में कुल विदेशी पूँजी का निवेश 1800 करोड़ रूपये था जो भारत में कुल पूँजी निवेश (नीजि तथा सरकारी क्षेत्रों में) का मात्र 8 प्रतिशत था। जबकि दूसरी ओर इसी वर्ष दो के 1929 करोड़ रूपये बाहर चला गया इन कम्पनियों के लाभ, रायल्टी, तकनीकी फीस, इत्यादी के रूप में।
नीचे दी गयी तालिका सन् 1981 में देश में विदेशी पूँजी निवेश तथा साथ ही साथ उसी वर्ष में देश से बाहर जाने वाली पूँजी का आंकड़ा दिया गया है:-
वर्ष              विदेशी पूँजी निवेश          भारत से बाहर गया धन
1981                        108 करोड़ रूपये           114 करोड़ रूपये
1982                        628 करोड़ रूपये           641 करोड़ रूपये
1983                        618 करोड़ रूपये           590 करोड़ रूपये
1984                        1130 करोड़ रूपये          1169 करोड़ रूपये
1985                        1260 करोड़ रूपये          1181 करोड़ रूपये
1986                        1066 करोड़ रूपये          1265 करोड़ रूपये
1987                        1077 करोड़ रूपये          1193 करोड़ रूपये
1988                        2397 करोड़ रूपये          2542 करोड़ रूपये
1989                        3166 करोड़ रूपये          5235 करोड़ रूपये
1991 से 1995 तक 25,479 करोड़ रूपये 34240 करोड़ रूपये

ऊपर दिये गये आंकड़ो से एकदम स्पष्ट है कि वर्ष 1983 1985 को छोड़कर शेष वर्षों में देश को घाटा ही रहा है। जितना पूँजी निवेश हुआ, उससे कहीं अधिक धन देश से बाहर चला गया। अतः स्पष्ट है कि विदेशी पूँजी निवेश का सौदा देश के लिये घाटे का सौदा रहा।
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