राजस्थान का स्थापत्य - मूर्तिशिल्प


मूर्तिशिल्प
राजस्थान में मूर्तिशिल्प का इतिहास आज से लगभग 4500 वर्ष पुराना है। कालीबंगा से प्राप्त हड़प्पाकालीन सांस्कृतिक पुरासामग्री में मिट्टी तथा धातु की लघु मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। कालान्तर में दूसरी शताब्दी ई॰पू॰ से कई शुंगकालीन मूर्तियाँ नगर (टोंक) एवं रैढ़ (टोंक) से मिली हैं, जो लाल मिट्टी की पकाई हुई हैं। नोह (भरतपुर) से प्राप्त इस युग की यक्ष-यक्षी की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं।  ब्रजमण्डल के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में होने के कारण प्रारम्भिक मूर्तिकला के उद्भव व विकास में पूर्वी राजस्थान (भरतपुर क्षेत्र) ने विशिष्ट भूमिका निभायी। नोह में जाखबाबा की विशालकाय प्रतिमा शुंगकालीन कला का प्रतिनिधित्व करती है तथा यह चतुर्मु ख प्रतिमा राजस्थान की भारतीय मूर्ति विज्ञान को अनुपम देन है। इस युग की यक्ष-यक्षी की मूर्तियाँ भरतपुर संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

      प्राचीन काल के शैव मूर्तिशिल्प में भी राजस्थान की अनुपम देन है। इस दृष्टि से भरतपुर क्षेत्र की विशेष भूमिका रही है। इस क्षेत्र के चौमा, भंडपुरा, गामड़ी आदि स्थानों से शु ंग-कुषाणकालीन शिवलिंग मिले हैं। रंगमहल (हनुमानगढ़) से प्राप्त एकमुखी शिवलिंग की बहुचर्चित मृण्मूर्ति में शिवलिंग के मुख भाग में जटामुकुटधारी शिव को मानवाकृति प्रदान की गई हैं। यह मूर्ति वर्तमान में बीकानेर संग्रहालय में प्रदर्शित है।

  बैराठ (जयपुर) प्राचीन काल में राजस्थान में बौद्ध धर्म का सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। यहाँ से प्राप्त मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों से बौद्ध मंदिर, मठ आदि के होने के प्रमाण मिले हैं। भरतपुर क्षेत्र से अनेक
रोचक कुषाणकालीन (प्रथम शताब्दी ई0 के आस-पास) बौद्ध मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। यहीं से कुछ बोधिसत्व मूर्तियाँ भी मिली हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के जीवन की वह अवस्था है, जब वे बुद्धत्व प्राप्त करने के मार्ग में अग्रसर हो रहे थे। बुद्ध की प्रतिमा सदैव ही करूणा, प्रेम और सौहार्द की प्रतीक मानी गई हैं। भरतपुर संग्रहालय में भगवान बुद्ध का कपर्द रूप में मंडित केश (महात्मा बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् केश तक मुंडित करा लिए और केवल बालों की एक लट सिर पर रहने दी, इस आशय की मूर्ति को कपर्द की संज्ञा मिली) वाला बुद्ध शीर्ष भरतपुर संग्रहालय में उपलब्ध हैं, जो कुषाणकालीन कला का उल्लेखनीय उदाहरण हैं।

  इस प्रकार राजस्थान में गुप्तकाल से पूर्व मूर्तिकला का विकास हो चुका था। परन्तु गुप्तकाल में लगभग सम्पूर्ण भारत में मूर्तिकला का जो विकसित रूप देखने को मिलता है, वैसा इससे पहले देखने को
नहीं मिला। गुप्तकाल की मूर्तियों में मौलिकता है।

  इस युग की देव मूर्तियाँ गान्धार कला से मुक्त हैं और उन पर आध्यात्मिक एवं अलौकिक भावों की अभिव्यक्ति है। उनकी मुखाकृति सौम्य है, भाव-भंगिमा में जीवन्तता है, केश रचना में विविधता है तथा मूर्तियों के पीछे कलात्मक प्रभामण्डल दर्शाया गया है। देव परिवार का आशातीत रूप से विस्तार गुप्त युग में देखने को मिलता है। यद्यपि राजस्थान सीधे रूप से गुप्त साम्राज्य का अंग नहीं था, परन्तु कला के क्षेत्र में हो रहे मौलिक परिवर्तनों तथा प्रयोगों का यहाँ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। राजस्थान में इस युग के बचे हुए मन्दिरों में हाड़ौती क्षेत्र का मुकन्दरा तथा चारचौमा का शिव मन्दिर उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त नगरी (चित्तौड़), गंगधार (झालावाड़), मंडोर (जोधपुर) में भव्य देवालय थे, जिनकी मूर्तियाँ अतीत के वैभव को रेखांकित करती हैं। इटालियन विद्वान टेसीटोरी ने बीकानेर के इर्द-गिर्द गुप्तकलीन मृण्मूर्तियों की अमूल्य धरोहर की खोज की, वे प्रारम्भिक गुप्तकालीन मूर्तिकला की साक्ष्य हैं। वर्तमान में ये बीकानेर संग्रहालय की धरोहर हैं। ये मृण्मूर्तियाँ पौराणिक देवी-देवताओं के साथ ही, जनजीवन की अनेक झांकियाँ प्रस्तुत करती हैं।

  गुप्तकाल की शैव धर्म से सम्बन्धित राजस्थान की शैव मूर्तियाँ भी कम रोचक नहीं हैं। रंगमहल से प्राप्त एकमुखी शिवलिंग तथा उमा माहेश्वर की मृण्मूर्तियाँ विशेषतः उल्लेखनीय हैं। लिंग के मुख भाग में त्रिनेत्र एवं जटामुकुटधारी शिव की आकृति प्रदर्शित कर कुशल शिल्पकार ने लिंग तथा पुरुष विग्रह का एक साथ ही सुन्दर समावेश किया है।

 प्रस्तर निर्मित अनेक महत्वपूर्ण गुप्तकालीन मूर्तियाँ राजस्थान से प्राप्त हुई हैं। ये सभी विष्णु की हैं तथा विशालकाय हैं। रूपावास (भरतपुर) की चक्रधर द्विभुजी विष्णु तथा सर्पफणा बलराम की विशालकाय प्रतिमाएँ गुप्तकाल की प्रस्तर निर्मित कला की श्रेष्ठताओं से युक्त है। इसके अतिरिक्त भीनमाल (जालौर), हेमावास (पाली) से प्राप्त विष्णु प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।

 राजस्थान में गुप्तकाल से पूर्व की जैन प्रतिमाएँ नहीं मिली हैं। इस दृष्टि से भरतपुर संग्रहालय में प्रदर्शित तथा जमीना से प्राप्त तीर्थंकर आदिनाथ एवं नेमिनाथ की मूर्तियाँ विशेष महत्व की हैं। इन पर
गुप्तकालीन कला परम्परा की स्पष्ट छाप है।
  गुप्तोत्तर एवं पूर्व मध्यकाल में राजस्थान की मूर्तिकला ने परिपक्वता प्राप्त कर ली थी। देवी-देवताओं आदि की मूर्तियों का आधार, गुप्तकालीन माधुर्य तथा कोमलता तो बनी रहीं, परन्तु उनमें शक्ति, शौर्य और भावुकता का सम्पुट जोड़ा गया। इस युग में देवी-देवताओं में विश्वास बढ़ने से उनका कई रूपों में अंकन किया गया। युद्ध की प्रचुरता से युद्धोचित दिखाने की प्रधानता इस युग की विशेषता थी। एक ओर, पौराणिक गाथाओं, द्वारा शौर्य को उभारा गया तथा दूसरी ओर श्रृंगारमय जीवन की अभिव्यक्ति की गई। राजस्थान की इस युग की मूर्तियों में अलंकरण की प्रधानता, आकृतियों की बहुलता, देवरूपों की विविधता आदि देखने को मिलती हैं।

  गुप्तोत्तर काल में कूसमा (सिरोही) तथा झालरापाटन (झालावाड़) में चन्द्रभागा के तट पर शिव मन्दिर निर्मित हुए, जो आज भी विद्यमान है। चन्द्रभागा का शीतलेश्वर महादेव का मन्दिर राजस्थान का
प्राचीनतम तिथियुक्त (689 ई.) मंदिर है। इस युग की मेवाड़ (उदयपुर) तथा वागड़ (डूंगरपुर-बाँसवाड़ा) में अनेक शिव मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। ये मूर्तियाँ प्रायः पत्थर की हैं। देव मूर्तियाँ अनलंकृत प्रभामण्डल और चौकी सहित हैं। डूँगरपुर संग्रहालय में इनका समृद्ध संग्रह हैं। इस क्षेत्र के तनेसर से प्राप्त मूर्तियाँ राष्ट्रीय संग्रहालय (नई दिल्ली) तथा अमेरिका के संग्रहालयों तक में पहुँच चुकी हैं।

  पूर्व मध्यकाल (8वीं से 13वीं शताब्दी) में मूर्तिकला अपने विकास की क्रमिक यात्रा करते हुए चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई। इस युग में पूरे राजपूताना में मन्दिरों का जाल बिछा। राजपूताना में आज भी इस युग की कीर्ति का बखान करने वाले अनेक मन्दिर इसके प्रमाण हैं। इस युग की विरासत में मिली कला पराम्पराओं ने आवश्यकतानुसार परिवर्द्धन एवं विकास ही नहीं किया, वरन् देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों की शास्त्र सम्मत परिकल्पना कर उन्हें मूर्तियों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की। मंदिर के बाह्य तथा आंतरिक सम्भाग देव मूर्तियों से ही नहीं, वरन् पौराणिक आख्यानों, सुर-सुन्दरियों, प्रणयलीन मूर्तियों तथा जन-जीवन की झांकी से परिपूर्ण हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस काल की मूर्तियाँ पूर्ववर्ती प्रतिमाओं की अनुकृति मात्र नहीं हैं, वरन् अपने युग की धार्मिक चेतना एवं भाव-भूमि की वास्तविक प्रतिबिम्ब है। इस युग की धातु मूर्तियों ने मूर्तिकला को नये आयाम प्रदान कर कला का इतिहास रच दिया।

 मारवाड़ में ओसियां, बाड़मेर में किराडू, नागौर में गोठ-मांगलोद, सीकर में हर्षनाथ, कोटा में कंसुआ, बांसवाड़ा में अर्थूणा, डूंगरपुर में देव सोमनाथ, झालवाड़ में झालरापाटन, आबू पर्वत में देलवाड़ा, पाली में केकीन्द, भीलवाड़ा में बिजौलिया एवं मेनाल आदि ऐसे स्थल हैं, जहाँ के प्रसिद्ध मंदिरों में ऐतिहासिक, भव्य एवं कलात्मक मूर्तियाँ हैं। ये मन्दिर मूर्तिकला की खान हैं।

  धार्मिक समभाव तथा सोहार्द राजस्थान की मध्ययुगीन कला का प्रमुख स्वर है। विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य समन्वय यहाँ की विशिष्टता है। मन्दिर और मूर्तिकला इसके साक्ष्य हैं। ओसियां में वैष्णव, शैव, देवी तथा जैन मन्दिर साथ-साथ हैं। वैष्णव तथा शैव सम्प्रदायों की उदारता तथा सहिष्णुता के परिणामस्वरूप विष्णु तथा शिव के संयुक्त रूप हरिहर लोकप्रिय बने। शिव अपनी शक्ति से संपृक्त हो अर्द्धनारीश्वर बन गये। सूर्य तथा विष्णु का सयुक्त रूप सूर्यनारायण के रूप में अवतरित हुआ। धार्मिक सम्भाव के फलस्वरूप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समान धरातल पर कल्पित किया तथा उनमें कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है। लोद्रवा (जैसलमेर), बाड़ौली (चित्तौड़), झालरापाटन (झालावाड़) तथा कटारा (भरतपुर) में त्रिदेवों का अंकन हुआ है। ये मध्यकालीन मूर्तिकला की अनुपम निधियाँ हैं।

  जैन धर्म से सम्बन्धित तीर्थंकरों की मूर्तियाँ राजस्थान में बहुतायत से मिलना यह प्रमाणित करती है कि उस युग में जैन धर्म फल-फूल रहा था। नाडोल (पाली), ओसियां (जोधपुर), देलवाड़ा (सिरोही),
रणकपुर (पाली), झालरापाटन (झालावाड़), केशवरायपाठन (बूँदी), लाडनूं (नागौर), पल्लू (गंगानगर) आदि स्थलों में जैन देव प्रतिमाएं स्थापित हैं। ओसियां के सच्चिया माता मन्दिर के प्रांगण में स्थित प्रतिहारकालीन सूर्य मंदिर में जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का अंकन धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है। देलवाड़ा के विमलवसही तथा लूणवसही मन्दिरों में कृष्णलीला का अंकन इसी भावना का सूचक है। इसी प्रकार हिन्दू प्रतिमाओं में सरस्वती का जो महत्व हैं, वही वाग्देवी सरस्वती का जैन सम्प्रदाय में है। पल्लू, लाडनूं, नाडोल तथा अर्थूणा की जैन सरस्वती प्रतिमाएँ राजस्थान की मध्यकालीन कला की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।
 राजस्थान में 15 वीं शताब्दी से सांस्कृतिक पुनरुत्थान के युग की शुरुआत मानी जा सकती है। मेवाड़ में महाराणा कुम्भा का उदय सांस्कृतिक इतिहास की बड़ी घटना है। कुम्भा ने कुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़
और अचलगढ़ में कुम्भस्वामी नामक विष्णु मन्दिर बनवाये। कुम्भा द्वारा चित्तौड़गढ़ में निर्मित कीर्तिस्तम्भ (जिसे विजय स्तम्भ के रूप में अधिक जाना जाता है) को भारतीय मूर्तिकला का शब्दकोश कहा जाता है। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा ने ठीक ही लिखा है, ”जीवन के व्यावहासिक पक्ष को व्यक्त करने वाला यह स्तम्भ लोक जीवन का रंगमंच हैं।

  16 वीं-17वीं शताब्दियों में राजपूत एवं मुगलों के मध्य जिस मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध का श्रीगणेश हुआ, उसने मंदिर व उसकी मूर्तिकला को प्रभावित किया। अकबर के शासन काल में आमेर नरेश महाराजा
मानसिंह ने वृंदावन (मथुरा) में गोविन्ददेव जी का मन्दिर बनवाया, जो मुगल साम्राज्य में बना सर्वो त्कृष्ट और भव्य देवालय है। उसकी रानी कंकावती ने अपने दिवंगत पुत्र जगतसिंह की पुण्य स्मृति में आमेर में जगतशिरोमणि का भव्य वैष्णव मन्दिर बनवाया। मानसिंह ने बंगाल से पालयुगीन शिलादेवी की मूर्ति लाकर आमेर में प्रतिष्ठित करवाई। उदयपुर में 17वीं शताब्दी का निर्मित जगदीश मन्दिर एक अन्य महत्वपूर्ण वैष्णव मन्दिर है। जगदीश मन्दिर की मुख्य प्रतिमा भगवान जगदीश की काले पत्थर से निर्मित 5 फीट ऊँची प्रतिमा है, जिसके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पदम् सुप्रतिष्ठित है। इस मंदिर के गर्भग्रह के सामने गरूड़ की विशाल प्रतिमा है। लगभग इसी काल की वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित मूर्तियाँ नाथद्वारा में श्रीनाथ जी, कांकरोली में द्वारिकाधीश, कोटा में मथुरेश जी, जयपुर में गोविन्द देव जी तथा बीकानेर में रत्नबिहारी की हैं।
  इस प्रकार राजस्थान में मूर्तिकला की एक समृद्ध परम्परा रही। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भी राजस्थान में मन्दिर निर्माण होता रहा और उसमें मूर्तियाँ स्थापित होती रहीं। मध्यकालीन मूर्तियों में जीवन्तता, सौन्दर्य, अलंकारिता, लयात्मकता, गतिशीलता एवं समन्वयवादिता के दिग्दर्शन होते हैं। 
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