बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आपसी विलय


बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आपसी विलय
पश्चिम की बाजार संस्कृति का एक प्रमुख सिद्धान्त है- प्रतियोगिता। अर्थात् कम्पनियों में यदि आपसी प्रतियोगिता होगी तो माल की गुणवत्ता उच्चस्तरीय होगी, दाम कम होगा और अन्ततः उससे उपभोक्ता को ही फायदा होगा। बाजार में एकाधिकार को रोकने के लिये जरूरी है कि कम्पनियों में आपसी प्रतिद्वन्दिता हो जिससे कि कोई कम्पनी बाजार में अपना एकाधिकार स्थापित न करे। इसके लिये आवश्यक है कि एक से अधिक कम्पनियाँ बाजार में हों जो एक सी वस्तुओं का उत्पादन करती हों, जिससे उपभोक्ता को वस्तुओं के चयन, मूल्य व गुणवत्ता आदि का समुचित अधिकार मिल सके। वह अपनी पसन्द से चीजों के खरीद सके। कम्पनियों की स्वस्थ प्रतियोगिता से बाजार के भी आर्थिक हितों में वृद्धि हो।
आधुनिक बाजार सिद्धान्त की ये बातें एकदम बेबुनियाद हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मुनाफाखोरी की संस्कृति ने इन सभी बुनियादी सिद्धान्तों को नकारा है। आपसी प्रतियोगिता से बचने के लिये ये कम्पनियाँ आपस में समझौते करती हैं। मुनाफाखोरी को अधिकतम बनाये रखने के लिये कम्पनियाँ बाजारों पर एकाधिकार रखती हैं। इस एकाधिकार व मुनाफे को उच्चतम बिन्दु तक पहुँचाने के लिये ये कम्पनियाँ किसी भी हद तक जा सकती है। एक दूसरे से गलाकाट प्रतियोगिता में लिप्त रहने वाली ये कम्पनियाँ आपस में विलय भी कर सकती हैं, सहगामी हो सकती हैं। यदि कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लगता है कि आपसी प्रतिद्वन्द्विता में उनके मुनाफे में कमी आ रही है और बाजार से उनका एकाधिकार समाप्त हो रहा है, तो वे कम्पनियाँ निजी स्वार्थों के लिये आपस में मिलकर किसी एक विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी को जन्म देती हैं।
अधिकांश चर्चित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जन्म इसी विलय की प्रक्रिया से चलते हुआ है। उदाहरण के लिये:-
1.         ब्रिटिश लीलैण्ड मोटर कार्पोरेशन 2.         इन्टरनेशनल कम्प्यूटर लिमिटेड   3.         द फ्रेन्च इलैक्ट्रीकल कम्पनी


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