रेगिस्तान के निवासी


रेगिस्तान के निवासी

प्राचीन काल से ही रेगिस्तान, निर्जन, कठिन व निष्ठुर स्थान के रूप में जाने जाते हैं। हममें से केवल कुछ अति उत्साही लोगों को छोड़ कर रेगिस्तानी क्षेत्र यात्रा तथा व्यापार हेतु अवरोधक स्थल रहे हैं। वहां लोगों ने जीवित रहने के लिए बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध संरक्षण के साथ रेगिस्ताना में जीवन को बनाए रखने के लिए कुछ नीतियों (अनुकूलताएं) को अपनाया है। विगत कुछ दशकों के दौरान रेगिस्तान में हाइड्रोकार्बन तथा खनिजों की प्राप्ति के कारण सामाजिक परिवर्तन के अनेक उदाहरण देखने को मिले हैं।- डिज़र्ट: एनक्रोचिंग वाइल्डरनेस
            रेगिस्तान में मानव समाज की विविधताएं सचमुच अदभुत् व आश्चर्यजनक हैं। इस तथ्य के बावजूद कि रेगिस्तान धरती पर अति गर्म स्थान हैं, वहां सदियों से मानव बसावट रही है। रेगिस्तान की सामाजिक विविधताएं अद्भुत हैं। हालांकि यह बात स्वीकार की जाती है कि मानवीय बसावट केवल रेगिस्तानों के किनारों पर ही अधिक है और रेगिस्तान के मध्य भाग में केवल यायावार (खानाबदोश) लोग ही रहते हैं। क्योंकि रेगिस्तान की विषम परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालने की क्षमता मानव में कम ही होती है इसलिए रेगिस्तान में वह अपनी जीवन शैली में परिवतर्न कर जीवन-यापन करता है। यही कारण है कि रेगिस्तानों में विश्व की कुल जनसंख्या का बहुत ही कम भाग निवास करता है।
            जहां कभी आरंभिक सभ्यताएं जन्मी थीं, आज उनमें से कुछ स्थान रेगिस्तान में बदल गए हैं। ऐसे प्रमाण मिले हैं कि पूर्वी अफ्रीका के रेगिस्तानी क्षेत्रों में हमारे पूर्वज रहा करते थे। नील, टिगरिस, यूफ्रेट और सिंधु नदी घाटियों के रेगिस्तानों में रहने वाले लोगों ने ही सर्वप्रथम कृषि के आर्थिक पक्ष को समझा था। रेगिस्तान में बसावट, सिंचाई, कृषि और आवासीय प्रक्रियाओं से धीरे-धीरे आर्थिक विकास होने लगा। इस प्रक्रिया में पहली बाधा पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की कमी के रूप में प्रकट हुईं यह भी संभव हो सकता है कि जनजातियों और समुदायों के लोग किसी अन्य आक्रमणकारी द्वारा निष्कासित किए जाने पर भाग कर रेगिस्तान जैसे दुर्गम व निर्जन स्थान में रहने चले गए होंगे।
रेगिस्तानी आवास की समस्या
            रेगिस्तान में रहना हमेशा से दुष्कर रहा है। हवा और पानी जीवन के लिए आवश्यक हैं लेकिन जीवन यापन के लिए तीन आधारभूत आवश्यकताओं भोजन, कपड़ा और मकान को रेगिस्तानी क्षेत्रों में जुटा पाना कठिन होता है। रेगिस्तान में हवा तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है लेकिन यहां, पानी, भोजन एवं कपड़ों के निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री की आपूर्ति कम ही होती है।
            जहां पर्याप्त जल नहीं होगा वहां अन्न का उत्पादन भी अपर्याप्त होगा। यह स्थिति लंबे सूखे के दौरान और गंभीर हो जाती है। निर्माण सामग्री के अभाव में रेगिस्तान में घर बनाना भी चुनौती भरा कार्य है, हालांकि यहां यह समस्या कभी हल नहीं हो सकती है। रेगिस्तान में रहने वाले लोग अधिक गर्मी (गर्म रेगिस्तानों में) और अधिक सर्दी (ठंडे रेगिस्तानों में) से बचना चाहते हैं। गर्म रेगिस्तानों में रातें तो बहुत ठंडी होती हैं लेकिन यहां रेतीले तूफान, बालू के टीलों का विस्थापन और उड़ती रेत की आंधी आदि आपदाएं संकटकारी होती हैं।

रेगिस्तान में घर
            रेगिस्तान में घर बनाने के लिए आवश्यक सामग्री का अभाव होता है। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक शरण स्थलों जैसे गुफाओं में रहते थे। फिर धीरे-धीरे लोगों ने चट्टानी पत्थर और धूप से तपी मिट्टी की ईंटों से घर बनाना आरंभ किया। रेगिस्तान के सभी आवास स्थलों को उच्च ताप और ठंड के विरुद्ध कुसंवाहक होना चाहिए। रेगिस्तान के ग्रामीण इलाकों में भी घरों को धूप से तपी मिट्टी की ईंटों से बनाया जाता है। क्योंकि यहां बारिश नहीं होती है इसलिए ईंटों का जलसह (वॉटरप्रूफ) होना आवश्यक नहीं होता है।
रेगिस्तान में आधुनिक तकनीकों की घुसपैठ के कारण यहां प्राकृतिक आवास में परिवर्तन आया है।

रेगिस्तान में कपड़े
            रेगिस्तान के निवासियों द्वारा कपड़ों का चुनाव जलवायु, स्थानीय संस्कृति और धर्म के अनुसार किया जाता है। रेगिस्तान के अधिकतर पांरपरिक लोग गर्मी से बचने के लिए ढीले-ढाले कपड़े पहनते हैं। रेगिस्तान में हल्के रंग के कपड़े पहने व्यक्ति की तुलना में कपड़े न पहने व्यक्ति को दो गुनी गर्मी लगती है। ढीले-ढाले कपड़े पसीने को भी सोखते हैं ओर हवा के लगने पर ठंडक उत्पन्न करते हैं। ढीले-ढाले कपड़ों में व्यक्ति को कम पसीना आता है, जिससे शरीर से जल की हानि भी कम होती है।
जैसलमेर (भारत) के निवासी
जैसलमेर (भारत) के निवासी 
            अरब और उत्तरी अफ्रीका के रेगिस्तानों में रहने वाले यायावर समुदाय के पुरुष अपने चेहरे को धूप और बालू से बचाने के लिए कपड़े से ढक लेते हैं। पश्चिमी अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान के किनारों पर रहने वाली फुलनी जाति के लोग अपने सिर को पौधों के रेशों और पत्तों से ढकते हैं। महिलाएं भी सिर को विभिन्न आकर्षक कपड़े से ढकती हैं। द्रोणा जाति की महिलाएं सजीले कपड़े का साफा पहनती हैं।




भोजन की उपलब्धता
सामान्यतया परंपरागत रूप से रेगिस्तान में मानव और जानवरों दोनों के लिए भोजन की उपलब्धता अनिश्चित बनी रही है। कुछ रेगिस्तानों में कृषि की सीमित मात्रा से भी वहां जीवन पनप रहा है। रेगिस्तान में सभी पौधे नहीं उगाए जा सकते हैं। रेगिस्तान में कोई विशेष अनाज उगाना आसान नहीं है। स्थानीय किसान इन क्षेत्रों में ऐसी फसल उगाते हैं जो सूखे के प्रति प्रतिकूल होने के साथ वर्ष भर खाई जा सकती है। ऐसे पौधों को खाने के अलावा बालू टिब्बों को स्थिर रखने के लिए भी उगाया जाता है। फल और सब्जियों को उगाने के लिए स्थानीय या समीपवर्ती क्षेत्रों का उपयोग किया जा सकता है। यहां भोजन की पूर्ति के लिए फसल उगाना किसी जानवर के शिकार करने से आसान है।
            रेगिस्तान के स्थानीय निवासी वहां की विषम परिस्थितियों में भी भोज्य पदार्थों की खोज करना जानते हैं। उदाहरण के लिए शताब्दियों से सोनारन रेगिस्तान स्थानीय लोगों की भोजन संबंधी आवश्यकतओं की पूर्ति में सहायक है। यद्यपि यहां उपयोगी पौधे भी पर्याप्त होते हैं। रेगिस्तान की कुल वनस्पतियों में से बीस प्रतिशत खाने योग्य हैं। सोनारन रेगिस्तान और इसके समीप के क्षेत्रों में रहने वाली पचास से अधिक पारंपरिक सभ्यताओं में लगभग 540 पौधों का उपयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किया जाता है।
ओपुनटिया में खिलते फूल
ओपुनटिया में खिलते फूल 
            रेगिस्तानों में रहने वाले लोग पारंपरिक रूप से बिना उपजाए विभिन्न पौधों के बीज, जड़, गिरी और फलों को भोज्य पदार्थ की तरह उपयोग करते हैं। कार्बोहाइड्रेट और रेशा युक्त ये वानस्पतिक भोज्य पदार्थ अधिक समय में पचते और अवशोषित होते हैं। भोजन बनाने की पारंपरिक विधियों (कच्चा या पकाया हुआ) में पोषक तत्वों की अधिकतम मात्रा सुरक्षित रहती है।
            रेगिस्तान की कुछ भोज्य वनस्पतियों में तरबूज परिवार की जंगली लौकी भी शामिल है। ऐसे पौधे सहारा और विश्व के अन्य गर्म रेगिस्तानों में प्रचुरता से उगते हैं। स्थानीय लोग यह जानते हैं कि पूरी तरह पकी लौकी के बीज बहुत तीते गुदे से पूण रूप से अलग कर खाने योग्य होते हैं। भूने एवं उबले हुए इस गूदे में तेल की मात्रा काफी होती है। इसके पौधे भी खाने योग्य होते हैं। रेगिस्तान में गुदेदार तनों को चबाकर भी पानी की आपूर्ति की जाती है। रेगिस्तान में रहने वाले लोग कांटेदार नागफनी (नागफनी का एक प्रकार) के फल को टुना कहते हैं, यह खाने योग्य होता है। इस फल को खाने से पहले इसकी ऊपरी सतह पर स्थित कांटों को अलग करने के लिए सावधानी से छीला जाता है। इस फल का उपयोग पेय और मुरब्बा (जेली) बनाने में किया जाता है। इसके बीजों को शोखा (सूप) या आटे में उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार रक्तिम नारंगी काष्ठीय झाड़ी ओक्टीलो को भी कच्चा खाया जाता है। स्थानीय लोग वनस्पतियों के बीजों और फूलों से चाय बनाते हैं। रेगिस्तान में पाया जाने वाला सजीव पौधा नमी और ग्लुकोज की अच्छी-खासी मात्रा रखता है, इस पौधे की जड़ को भूना भी जा सकता है। इसके तने और फूलों को भी फल की भांति खाया जाता है।
            अक्सर डाक सामग्री पर नखलिस्तान के किनारों पर खजूर के पेड़ों का चित्र दिखाई देता है। ऐसा माना जाता है कि खजूर के पेड़ का मूल स्थान दक्षिण-पश्चिम एशिया या उत्तरी अफ्रीका के रेगिस्तानी नखलिस्तान हैं। सहारा रेगिस्तान में पोषक तत्वों से समृद्ध होने के कारण खजूर को सूखने पर अनाज के साथ मिलाकर लंबे समय तक रखा जा सकता है। खजूर की पत्तियों को पकाकर सब्जी की तरह उपयोग किया जाता है। आर्थिक तंगी के समय लोग इसके बीजों को पीसकर आटे में मिलाकर रोटी बनाते हैं। खजूर के फूल भी खाद्य पदार्थों में शामिल हैं। इसके फूलों की कलियों का उपयोग सलाद और सूखी मछलियों से स्वादिष्ट भोजन बनाने में किया जाता है।
            सामान्यतया रेगिस्तान में रहने वाले लोगों का आहार जैविक वसा और प्रोटीन से समृद्ध होता है। रेगिस्तानों के किनारों पर रहने वाले लोगों की अपेक्षा रेगिस्तान के अधिक अंदर की ओर रहने वाले लोगों का भोजन कम पौष्टिक होता है। रेगिस्तान में वर्षा की वार्षिक मात्रा में काफी अंतर होने के कारण, रेगिस्तान के किनारों पर आहार की बहुत अधिक विविधता देखने को मिलती है।
आधुनिक तकनीकों के कारण रेगिस्तानी जीवन की परंपरागत आहार आदतों में बहुत परिवर्तन आया है।

समकालीन रेगिस्तानी जीवन
            संसार के अन्य क्षेत्रों की भांति रेगिस्तान में भी जनसंख्या का घनत्व बढ़ रहा है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ से रेगिस्तान में निरन्तर जनसंख्या बढ़ रही है। आज रेगिस्तान में विश्व की जनसंख्या का लगभग छठवां भाग निवास करता है। यहां जनसंख्या के बढ़ने के कई कारण हैं। प्राचीन काल से ही यहां के लोग परंपरागत रूप से बच्चों को आर्थिक विकास और सुरक्षा में सहायक मानव बल के रूप में देखते आए हैं। आधुनिक तकनीकों ने रेगिस्तानी क्षेत्र के संसाधनों जैसे भू-जल एवं बड़े पैमाने पर खनिज तेल (ऑइल) के दोहन को संभव बना दिया है। इसके अलावा नई जगहों में लोगों की खातिरदारी भी अच्छी होती है ये कारक व्यक्तियों, विशेषकर रेगिस्तान के किनारों पर रहने वाले लोगों को रेगिस्तान की ओर प्रवास के लिए रिझाते हैं।
भारत का एक समकालीन रेगिस्तानी शहर
भारत का एक समकालीन रेगिस्तानी शहर 
            रेगिस्तान क्षेत्रों में जनसंख्या में काफी वृद्धि होने से वहां के पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। रेगिस्तानी लोगों की जीवनशैली में परिवर्तन होने से वहां के पर्यावरण पर नकारात्मक असर हुआ है। रेगिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का लगातार ह्रास हो रहा है। रेगिस्तान के अनेक क्षेत्र बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप ढलने में असर्मथ हैं। अनवीनीकृत संसाधनों के अतिदोहन से रेगिस्तान के प्राकृति संसाधनों में कमी आ रही है। नवीनीकृत स्रोत भी उचित प्रबंधन और अतिदोहन के कारण कम हो रहे हैं।
अनेक रेगिस्तानी देशों ने खनिज तेल के दोहन से अथाह संपदा जुटाई है। संपन्न रेगिस्तानी देशों ने इस वृहद् संपदा के कारण स्थानीय रेगिस्तानी स्थलाकृति को शहरी केंद्रों और राजमार्गों का निर्माण कर परिवर्तित कर दिया है। रेगिस्तान में अब कई कस्बे उभर कर सामने आए हैं।
            वर्तमान में रेगिस्तानी लोगों का पारंपरिक जीवन यापन संकट के दौर से गुजर रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और अतिउपयोग को सीमित करने वाले सामाजिक परिवर्तनों ने वहां के परंपरागत संस्कारों तथा जीवन शैली को बहुत अधिक प्रभावित किया है। जल्दबाजी में कोई भी कदम उठाने से पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि विकास और जलवायु परिस्थितियों के आधार पर विश्व के विभिन्न रेगिस्तानी क्षेत्र विशिष्ट हैं तथा उनकी सुरक्षा के लिए पूर्ण रूप से दक्ष प्रबंधन और नीतियों की आवश्यकता है।

Author:  सुबोध महंती
Source:  विज्ञान प्रसार


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