राजस्थानी लोक संगीत


लोक संगीत
लोक संगीत जन समुदाय के स्वाभाविक उद्गारों का प्रतिबिम्ब है। कवीन्द्र रविन्द्र नाथ टैगोर ने लोक गीतों को संस्कृति का सुखद सन्देश ल जाने वाली कला कहा है। महात्मा गाँधी के शब्दों में लोक गीत ही जनता की भाषा है, लोक गीत हमारी संस्कृति के पहरेदार हैं।
  राजस्थान के विशिष्ट एवं विविध भौगोलिक परिवेश ने इस प्रदेश के लोक जीवन को सतरंगी स्वरूप प्रदान किया है। मध्यकाल में राजपूत राजाओं के संरक्षण में लोक कलाओं का निरन्तर विकास होता रहा है। लोक संगीत में यहाँ के लोक जीवन के सामाजिक व नैतिक आदर्शों, इतिहास के लोक नायकों, धार्मिक जीवन के नानाविध अंगों, विश्वासों, मूल्यों आदि का प्रकटीकरण देखा जा सकता है। जीवन का शायद ही प्रसंग होगा, जिससे सम्बन्धित लोक गीत यहाँ उपलब्ध न हो।
 लोक संगीत का मूलाधार लोक गीत है, जिन्हें विभिन्न अवसरों एवं अनुष्ठानों पर सामूहिक रूप से गाया जाता है। लोक वाद्यों की संगति इनके माधुर्य की वृद्धि करती है। कभी गीत के भावों को नृत्य द्वारा भी साकार किया जाता है। कई बार शासक अथवा प्रश्रयदाता की प्रशस्ति में भी गीत रचे गये। कई जातियों ने व्यावसायिक दृष्टि से गीत रचने एवं गाने में विशिष्ट दक्षता प्राप्त कर ली है। 
 राजस्थान में लोक संगीत में राग-सौरठ, देश आदि का अधिक प्रयोग हुआ है। तालों में दादरा, रूपक, कहरवा ही अधिक प्रयोग में लायी जाती है। यद्यपि लोक गीतों में रागों का पूर्ण दिग्दर्शन नहीं हो पाता, फिर भी इनकी प्रस्तुति में अद्भुत लयात्मकता होती है।
 लोक गीत कई विषयों से सम्बन्धित है, जैसे - संस्कार, त्योहार-पर्व, ऋतु, देवी-देवता इत्यादि। संस्कारों में ज्यादातर गर्भधारण, जन्म, विवाह, विशिष्ट मेहमानों का विशेष अवसरों पर पधारना आदि को शामिल किया जा सकता है। पाणिग्रहण संस्कार पर सर्वाधिक गीत गाये जाते हैं।
  विवाह से पूर्व दुल्हा-दुल्हन की प्र ेमाकांक्षा की व्यंजना बना-बनी के गीतों में मिलती है। वर निकासी के समय घुड़-चढ़ी की जो रस्म होती है, उसे राजस्थान में लोक गीतों के माध्यम से सुन्दर अभिव्यंजना दी गई है। वधू के घर की स्त्रियों द्वारा वर की बारात का डेरा देखने जाने का प्रसंग राजस्थान के जला गीतों में देखने को मिलता है। परिवार में बालक जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीत जच्चा कहे जाते हैं। इनमें साधारणतः गर्मिणी की प्रशंसा, वंशवृद्धि का उल्लास और शिशु के लिए मंगलकामना की जाती है।
  त्योहार व पर्व-गीतों में गणगौर, तीज, होली, राखी, मकर संक्रान्ति, दीपावली आदि के अवसर पर गाये जाने वाल अनेक गीत हैं। गणगौर व तीज राजस्थान के विशेष पर्व हैं और अत्यधिक उल्लास-उमंग से मनाये जाते हैं। गणगौर का पर्व होलिका दहन के पश्चात् चैत्रमास में 16 दिन तक कुँवारी कन्याओं व सधवा स्त्रियों द्वारा अनुष्ठानपूर्वक आयोजित किया जाता है। लड़कियाँ प्रातः काल की वेला में जलाशय से जल भरकर लाती है और जल एवं फूलों से गणगौर की पूजा करके अपने भावी जीवन में सुख-सौन्दर्य की कामना करती हैं। गौर पार्वती का ही रूप है जिसे पूजकर सुहागन स्त्रियाँ अखण्ड सौभाग्य की कामना करती है। गणगौर का प्रसिद्ध गीत इस प्रकार है।

  खेलण दो गणगौर भँवर म्हानें खेलण दो गणगौर,
  म्हारी सखियाँ जोवे बाट हो भँवर म्हाने खेलण दो गणगौर ।

  गणगौर व तीज के समय घूमर नृत्य राजस्थान की पहचान बन गया है। रंग-बिरंगे लहरियों से सुसज्जित स्त्रियों का घूमर नृत्य देखते ही बनता है, गीत इस प्रकार है -  

म्हारी घूमर छे नखराली ए मा गोरी
  घूमर रमवा म्हे जास्याँ ।

  शेखावाटी एवं बीकानेर क्षेत्र के होलिकात्सव के गीत अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। गीदड़ एवं गैर नृत्यों के साथ होलिकात्सव के गीत गाया जाना सर्वविदित है।

 लोक देवताओं में तेजाजी, देवजी, पाबूजी, गोगाजी आदि ऐसे ऐतिहासिक वीर पुरुष माने जाते हैं, जिन्होंने परमार्थ के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। अतः उनके गुणगान करते हुए अनेक भजन-गीत तन्मयता से गाये जाते हैं। मीरां के भजनों की लोकप्रियता से सभी परिचित हैं। भरतपुर क्षेत्र में ब्रज संस्कृति के प्रभाव से कृष्ण लीलाओं के गान और करौली क्षेत्र में केलादेवी भक्ति के लांगुरिया गीत लोकप्रिय हैं। लोक गीतों के सम्बन्ध में यह खोजपरक तथ्य है कि इन गेय पदों के द्वारा अनपढ़ ग्राम्य जन भी ज्ञान के गूढ़ रहस्यों एवं गीत में समाहित संगीत लहरियों को सहज ही हृदयगंम कर लेता हैं।

  स्वर, ताल और लय में बद्ध होकर लोकसंगीत की धुनें मिलन-विरह, हास्य-व्यंग, रोष-भय, घृणा-प्रेम, राग-वैराग्य, वीरता-भीरुता आदि सूक्ष्म मनोभावों की मनोहारी अभिव्यक्ति करती है।

  लोक संगीत में पेशेवर जातियों के अन्तर्गत लंगा जाति की विशिष्ट पहचान दूर-दराज तक है। बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर आदि जिलों से सम्बद्ध लंगा जाति के लोकनायक अपने पारम्परिक वाद्यों के साथ प्रस्तुति देते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सारंगी से मिलता-जुलता वाद्य कामायचा लगाओं का प्रमुख वाद्य है। लंगा मांड शैली में अपने गीतों की प्रस्तुति देते हैं। लंगाओं का निंबूड़ा तो अब इनकी पहचान से जुड़ गया है। स्वरों का सहज उतार-चढ़ाव और ताल की गूढ़ शिक्षा इन कलाकारों की धरोहर है।
 राजस्थान में मांड गायन लोक संगीत की पहचान है। मांड शैली की सुविख्यात लोकनायिका पद्मश्री अल्लाह जिल्लाई बाई की आवाज से गूँजा पधारों म्हारे देस पर्यटकों को खुला निमंत्रण है।

  लोक संगीत की अन्य पेशेवर जातियों में ढोली, मिरासी, भोपा, जोगी, भवई मागणियार, रावल, कंजर आदि प्रमुख हैं। संगीत द्वारा जीविकोपार्जन का उद्देश्य होने के कारण ही इन जातियों ने अपने गीतों को आकर्षक रूप प्रदान किया। शास्त्रीय संगीत की भाँति इन पेशेवर गायकों के गायन में स्थायी व अन्तरों का स्वरूप नहीं दिखायी देता बल्कि ख्याल और झूमरी की तरह इन्हें छोटी-छोटी तानों, मुरकियों एवं विशेष झटकों से भी सजाया जाता है। स्वर माधुर्य के कारण राजस्थान के लोक संगीत एवं लोक वाद्यों का प्रयोग फिल्मी जगत एवं छोटे पर्दे  के कार्यक्रमों में देखने को मिलता है।
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