संस्कृति पर हमला


संस्कृति पर हमला

क्या करूँ ? ”इनकी साँस में बदबू है।कहकर एक नयी नवेली
पत्नी उदास हो जाती है। फिर उसकी एक सहेली उसे डाक्टर के पास ले
जाती है। डाक्टर सलाह देता है कि यदि साँस की बदबू से छुटकारा पाना
है तो कॉलगेट का सुरक्षा चक्रअपनाइये।


इसी तरह से क्लोज अप फार क्लोजेज अस। अर्थात् क्लोज-अप
के इस्तेमाल से ही पति-पत्नी नजदीक आ सकते हैं। सवाल यह उठता है
कि क्या पति-पत्नि का रिश्ता एक चार-पाँच रूपल्ली वाली कोलगेट या
क्लोज अप के पेस्ट की ट्यूब पर टिका हुआ है?” अगर आप माल्टोवा
मामनहीं हैं तो पता नहीं आप अपने बच्चे को प्यार करती भी हैं या नहीं।

आई एम ए काम्प्लान बॉय।
आई एम ए काम्प्लान गर्ल।यानि लड़के या लड़की को पैदा
करने के लिये माँ-बाप की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वे या तो काम्प्लान
के लड़के हैं या फिर कम्प्लान की लड़की।

इसी तरह बालों को काला बनाने तथा गिरने से बचाने के लिये
कई तरह के हेयर डाई, तेल तथा दवाओं के विज्ञापन आते हैं। जबकि सच
यह है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई
उपचार नहीं निकला है। लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन टी.वी. पर आते रहते
हैं जो लोगों के मन में सिवाय भ्रम के और कुछ नहीं पैदा करते। यही बात
दंत मंजन पर भी लागू होती है। अभी तक दुनिया में ऐसा कोई भी मंजन
नहीं है जो दातों की बीमारियों को दूर कर सके या फिर दांतों को रोग
लगने से बचाये। फिर भी टी.वी. पर या प-पत्रिकाओं में जिस तरह के
चमकते हुये दांतों को दिखाया जाता है, वह किसी खास कम्पनी के मंजन
के चमत्कार के रूप में होता है। एक के बाद एक सभी दांतों के खराब हो
जाने पर भी लोग उपचार की दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता को देख नहीं पाते।
किसी विशेष कम्पनी की साड़ी में सजी हुयी सुन्दर औरत, सूट में
सजा हुआ सुन्दर नौजवान, कोका या पेप्सी की बोतल लिये समुद्र तट के
रमणीक माहौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरूष, विशेष कम्पनी के स्वीमिंग सूट
में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती हुयी बालायें - ये सब चटकीले-भड़कीले
विज्ञापन ऐसा मानसिक माहौल तैयार करते है कि लोग विज्ञापन मॉडलों
की सुन्दरता का राज विभिन्न परिधानों और कोका-पेप्सी में देखने लगते
हैं। बड़ी तोंद वाले लालाजी और दो क्विंटल वजन वाली सेठानी भी इन
कम्पनियों का सूट या बाथिंग सूट पहनकर अपने को हीरो-हीरोइन समझने
लगते हैं। इस तरह सुन्दरता का अर्थ खास कम्पनी के परिधानों और
सजावट में निहित होने लगता है। जबकि सुन्दरता किसी व्यक्ति के
स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सफलता उनके द्वारा की जाने वाली
धुआंधार विज्ञापन बाजी में निहित है। प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये ये कम्पनियाँ
विज्ञापनों पर खर्च करती है। वर्ष 1993-94 में कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों
द्वारा विज्ञापन बाजी पर किये गये खर्च के आँकडे़ नीचे दिये जा रहे है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनी का नाम
 विज्ञापन पर खर्च
1 हिन्दुस्तान लीवर
90.00 करोड़ रूपये
2 आई.टी.सी
47.85 करोड़ रूपये
3 ब्रुक बाण्ड इण्डिया
47.57 करोड़ रूपय
4 कालगेट-पामोलिव
43.05 करोड़ रूपये
5 नेस्ले
32.35 करोड़ रूपये
6 गाडफ्रे फिलिप्स
32.45 करोड़ रूपये
7 गोदरेज-जनरल इलैक्ट्रिक
31.60 करोड़ रूपये
8 प्रॉक्टर एण्ड गैम्बिल
29.54 करोड़ रूपये
9 फिलिप्स
22.31 करोड़ रूपये
10 हरबर्ट सन्स
21.88 करोड़ रूपये
11 वी. एस. टी. इन्डस्ट्रीज
17.51 करोड़ रूपये
12 ग्लैक्सो
15.05 करोड़ रूपये
13 कैडबरी इण्डिया
14.53 करोड़ रूपये
14 ब्रिटानिया इण्डस्ट्रीज
14.23 करोड़ रूपये
15 रेकिट एण्ड कोलमैन
12.52 करोड़ रूपये
16 बी. पी. एल
14.47 करोड़ रूपये

इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों ने एक खास किस्म की
स्टेटस प्राब्लमको जन्म दिया है। अब रोटी, कपड़ा और मकान वाली विचारधारा तो समाप्त हो चुकी है। उसकी जगह ले ली है नये-नये चिप्स,
कुकीज, रैंगलर जीन्स, वॉल पेपर, आधुनिक टाइल्स आदि ने। भले ही
श्रीमती जी दिन भर पड़ी सोती रहें, पर वैक्यूम क्लीनर न होने की वजह
से उन्हें वक्त ही नहीं मिलता खाना बनाने का। या फूट प्रोसेसर जब नहीं
होगा तो खाना बनाने में देर तो लगेगी ही, इसमें उनकी क्या गलती है।
इनसबका परिणाम होता है अतार्किक एवं अनावश्यक व्यय, जो कि धीरे-ध्
ाीेर आपको तार्किक एवं आवश्यक लगने लगता है। स्टेटस सिंबलपहले
से ऊँचा होना रहता है लेकिन वेतन उस अनुपात में बढ़ता नहीं, नतीजा
होता है व्यक्ति के अंदर एक द्वन्द्व प्रारम्भ होता है, जिसमें अधिकांशतः
पलड़ा पिज्ञापनों का भारी रहता है। इस तरह एक ईमानदार व्यक्ति के
भ्रश्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का रिश्ता
भ्रष्टाचार से भी है।

विज्ञापनों मे कभी भी वस्तु को गुणवत्ता के आधार पर बेचने  की
कोशिश नहीं की जाती है। ये विज्ञापन तो मध्यम वर्ग के ग्लैमर को भुनाने
की कोशिश करते हैं। ये विज्ञापन व्यक्ति में एक हीन भावना पैदा करते हैं।
अधिकांशतः होता यह है कि विज्ञापित वस्तु होती मध्यमवर्ग के इस्तेमाल की
है पर विज्ञापन में दिखाया जाता है, विशुद्ध रईसाना पांच सितारों वाली
जीवन शैली। मध्यम वर्ग की एक कमजोरी होती है कि उसमें उच्च वर्गीय
जीवन के प्रति एक विशेष किस्म की जिज्ञासा तथा वैसा जीवन जीने की
दमित इच्छा होती है। विज्ञापन भयंकर सिद्ध होते हैं। एक आम आदमी चाहे
जितनी भी विलासिता की वस्तुयें एकत्रित कर ले पर वह कभी भी उस
किस्म की जीवन शैली को वहन नहीं कर सकता जैसी कि उसे विज्ञापन
में दिखायी जाती है। इसका परिणाम होता है एक भीषण हीन भावना का
जन्म, जो बढ़ती जाती है तथा एक सीमा के आगे जाने पर वैयक्तिक
विघटन का करण बन जाती है।

विज्ञापन के इस स्वप्न संसार से जो विसंगतियाँ अल्प आय औश्र
मध्यम आय वर्ग के पिरवारों में पनप रही हैं उनका सीधा परिणाम है कुंठा
का जन्म। पाश्चात्य शैली के उपभोक्तावाद का यह हमला हमारे सारे
नैतिक मूल्यों को नष्ट करता जा रहा है। विज्ञापन का यह जादुई संसार
हमें रूमानी दुनिया में ले जाता है। बार-बार का दोहराव हमारे मन में उस
वस्तु विशेष को पाने की लालसा पैदा कर देता है। फिर हमारा कोमल मन
नैतिकता से परे धन संग्रह की ओर मुड़ जाता है। और प्रारम्भ हो जाती है
एक अनवरत तृष्णा की दौड़ जिसका कही अंत नहीं है। इसी का फायदा
अब ये कम्पनियाँ उठा रही हैं उपभोक्ताओं को ऋण मुहैया कराके। ये
प्रलोभन देकर उपभोक्ताओं को अपनी ओर खींच रही है। इनका निशाना है
सम्पन्न मध्यमवर्ग जिसकी संख्या लगभग 20 करोड़ है, यह अमरिका की
कुल आबादी के बराबर बैइता है। अन्तर्राष्ट्रीय जीवन शैली को जीने की
लालसा पालने वाला यह वर्ग संवेदनहीन हो जाता है, जो किसी बदलाव
के काम करने की बात सपने में भी नहीं सोच सकता। आधुनिक प्रचार माध्
यमों और समाज के विशिष्ट सुविधाभोगी लोगों को अपनी गिरफ्त में  लेकर
ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमारे ऊपर विकृत उपभोक्तावादी फेंकू संस्कृति
लाद रही हैं। उनकी विज्ञापन बाजी से हमारा मानसिक दिवालियापन बढ़
रहा है। सारा का सारा उत्पादन मात्र 20 करोड़ लोगों के लिये हो रहा है।

                 अब तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने मनोरंजन परोसने 
के नाम पर अपने टेलीविजन नेटवर्क को शुरू कर दिया है। सी.एन.एन., स्टार, ए.टी.
एन, एम.टी.वी., एल.टी.वी., यू.टी.वी. आदि अनेकों बहुराष्ट्रीय टेलीविजन
कम्पनियों का जाल पूरे देश में फैल गया है। मनोरंजन के नाम पर बीसियों
चैनल देश में चल रहे हैं। इन चैनलों पर दिखाये जाने वाले सीरियल,
फिल्में तथा अन्य कार्यक्रम हमारे समाज को सांस्कृतिक रूप से खोखला
बना रहे हैं। दो दर्जन से अधिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने इन विदेशी टी.वी.
चैनलों के प्रमुख समय को खरीद लिया है। सीरियल तथा कार्यक्रमों में क्या
संस्कृति दिखायी जायेगी, इसका फैसला बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का पैसा तय
करता है। यह इस देश में पहली बार हो रहा है जब सीरियल तथा अन्य
कार्यक्रम कलाकर्मियों और रचनाकारों की कल्पना या भावना से नहीं बन
रहे हैं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लुटेरों के निर्देशों पर बन रहे हैं। इस नये
सांस्कृतिक उद्योग का सच यही है। आज हमारी संसकृति एक झटके में ही
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में चली गयी है। विदेशी चैनलों के कार्यक्रमों
में एक समूची नई किस्म की उत्तेजक और भौंडी जीवन शैली दिखायी जा
रही है। इसे देखकर दीनहीन, थके-हारे और निन्याबे बार असफल रहने
वाले लोगों के मन में भी कामवासना जागृत हो जाती है। इन चैनलों
परदिखाये जा रहे कार्यक्रमों या फिल्मों द्वारा एक घोषित सैक्स और हिंसा
का युद्ध चलाया जात रहा है। इसका उद्देश्य व्यभिचार, यौनिक लिप्सा
और हिंसा को बढ़ावा देना है। हिंसा और सैक्स की कुंठाओं के पनपने पर
एक आम व्यक्ति ऐसी कल्पना का ताना-बाना बुन लेता है जो टेलीविजन पर 
दिखाये जाने वाले दृश्य जैसी ही होती है। जब बार-बार यह कुंठित
कल्पना दोहरायी जाती है तो फिर व्यक्ति के दिमाग में यह प्रयोग के रूप
में दोहराने के अहसास को जीना चाहता है और यदि वह उसमें असफल
रहता है तो फिर उसमें खालीपन और हीनता पनपने लगती है। इसी
खालीपन को भरने के लिये व्यक्ति को जब भी मौका लगता है तो वह
चूकना नहीं चाहता। कुंठा और हीनता से भरा हुआ व्यक्ति अपना विवेक
छोड़ देता है और फिर सैक्स और हिंसा के वही खेल खेलने लगता है जो
टेलीविजन पर उसने देखा था। अब विकसित समाजों की भोगवादी
संसकृति की विकृतियाँ हमारे यहाँ फैल रही हैं। इनसे मानसिक ओर
आर्थिक गुलामी का पूरा ढाँचा हमारे ऊपर लद रहा है। आज हम अपनी
जमीन से कट रहे हैं। सांस्कृतिक विलगन और आत्मनिर्वासन का संकट
बढ़ रहा है। जिससे हमारी अस्मिता को ही गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
आर्थिक दोहन से अधिक बड़ा खतरा है - मानसिक तौर पर परावलंबी होते
जाना, इसी कारण हमारा आत्मविश्वास और अभिक्रम क्षीण हो रहा है।
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