राजस्थान के वन्य जीव अभयारण्य


वन्य जीव अभयारण्य

नाहरगढ़ अभयारण्य
      यह राजस्थान जिले के ऐतिहासिक दुर्ग आमेर, नाहरगढ़ व जयगढ के चारों तरफ फैला हुआ है, जिसको 1982 में अभयारण्य बनाया गया था। यह 50 किमी. के वन क्षेत्र में फैला हुआ है। इस अभयारण्य के बनने के बाद वर्ष भर पानी की उपलब्धता व घने जंगलों के कारण बाघ अब पुनः इस क्षेत्र में रहने लगे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य वन प्राणी जिसमें प्रमुखतः लंगूर, सेही व पाटागोह आदि यहाँ दिखाई देते हैं।

जमवारामगढ़ अभयारण्य
      जयपुर जिले के प्रसिद्ध शिकारगाह रामगढ़ को भी 1982 में अभयारण्य घोषित किया गया था। यह 360 किमी. के वन क्षेत्र में फैला हुआ है। कभी-कभी सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य के बाघ यहाँ तक आ जाते हैं। साधारण रूप में यहाँ बघेरा, जरक, जंगली सूअर, जंगली बिल्ली, भेड़िया, नीलगाय व सांभर आदि वन्य जीव मिलते हैं।

तालछापर कृष्ण मृग अभयारण्य
      राज्य के उत्तरी जिले चूरु में स्थित है। चूरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे से 12 किमी. दूर बिकानेर-जयपुर राजमार्ग पर स्थित है। यह 820 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला है। यहाँ सिर्फ काले हिरण ही मिलते हैं, जिनको 500 पशुओं तक के झुण्ड में देखा जा सकता है।

जयसमन्द अभयारण्य
      राज्य के दक्षिणी क्षेत्र का सबसे मनोरम अभयारण्य है, जो कि उदयपुर से 50 किमी दूरी पर जयसमन्द झील के किनारे पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है। यहाँ रीछ, जंगली सूअर, तेंदुआ, नीलगाय आदि पशु के अतिरिक्त तीतर सहित अनेक पक्षियों का संरक्षण स्थल है।

सीतामाता वन्य जीव अभयारण्य
      चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित वन्य जीव अभयारण है, जिसकी स्वीकृति राज्य सरकार ने कुछ समय पहले ही दी है। यह राजस्थान के दक्षिणी भाग में महत्व रखता है। यहाँ पर अनेक प्रकार के वन्य पशुओं तथा पक्षियों को संरक्षण देने का प्रावधान है।

बस्सी अभयारण्य
      यह अभयारण चित्तौड़गढ़ से 25 कि.मी. दूर है तथा 153 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। अरावली एवं विन्ध्याचल पर्वतमालाओं के मिलन स्थल पर स्थित वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए सन् 1988 में इसे अभयारण घोषित किया गया। यहाँ का विषेष आकर्षण है चौसिंघा, सैण्डग्राउज, बघेरा व जंगली बिल्ली नामक जीवों और मगरमच्छ देखना।

फूलवाड़ी की नाल अभयारण्य
  अरावली पर्वत मालाओं के मध्य उदयपुर जिले के पिछड़े एवं शान्त क्षेत्र फुलवाड़ी की नाल में स्थित यह अभयारण है, इसका क्षेत्र 511 वर्ग कि.मी. है। यह एक बहुत सघन वन में स्थित है। इसमें बाघ, बघेरा, सांभर और चीतल जीवों के साथ-साथ अनेक प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते हैं।

भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य
      यह 229 वर्ग कि.मी. में फैला है, इस अभयारण को 1983 में घोषित किया गया। चित्तौड़गढ़ जिले के पर्वतीय क्षेत्र भैंसरोड़गढ़ के निकट इसमें निवास करने वाले वन्य जीवों के सुरक्षा के उद्देष्य से इसे बनाया गया। उस समय से यहाँ वन्य जीवों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सैकड़ों प्रकार के पक्षियों के अतिरिक्त बघेरा, लक्कड़बग्घा, नीलगाय, जंगली सूअर, चीतल, चिंकारा, गीदड़ व लोमड़ी आदि वन्य जीव मिलते हैं।

सज्जनगढ़ अभयारण्य
      अरावली पर्वत श्रृंखला के सघन वन क्षेत्र में उदयपुर के प्राचीन आखेट स्थल को 1987 में यह नाम दिया गया था। साधारण रूप से इसमें शेर, कृष्णमृग, नीलगाय, सांभर, चीतल, लंगूर, जंगली सूअर व चिंकारा वन्य जीव देखे जा सकते हैं। यह 519 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है।

जवाहर सागर वन्य विहार
            यह वन विहार राज्य के पूर्वी जिले कोटा में कोटा शहर से 30 कि.मी. दूरी पर स्थित है। यहाँ मगरमच्छ, हिरण, खरगोष तथा अनेक प्रकार के पक्षी मिलते है। यह हर मौसम में दर्षनीय स्थल है।

शेरगढ़ अभयारण्य
            बांरा जिले का शेरगढ़ वन सर्वाधिक बाघों के लिए विख्यात है। सन् 1983 में इसको शेरगढ़ अभयारण का नाम देकर संरक्षित किया गया। यह मात्र 99 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें वन तथा वन्य जीवों को सुरक्षा प्रदान की जाती है। आजकल बाघ तो जंगल से लुप्त हो गये हैं, परंतु आज भी बघेरा, रीछ, लकड़बग्घा, चीतल, सांभर तथा अजगर जीव यहाँ देखे जा सकते हैं।

टाड़गढ़ रावली अभयारण्य
            यह अभयारण राज्य के तीन जिलों क्रमषः उदयपुर, पाली तथा अजमेर जिलो ं के सीमान्त क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसका क्षेत्रफल 512 वर्ग कि.मी. है। सन् 1983 में मध्य राजस्थान के ऐतिहासिक स्थल टाडगढ़ को अभयारण्य घोषित किया गया था। इसमें बघेरा, जरख, रीछ, गीदड़, बन्दर तथा नीलगाय आदि वन्य जीव निवास करते हैं।

चम्बल अभयारण्य
            यह अभ्यारण 280 वर्ग कि.मी. के जल क्षेत्र में फैला हुआ है। दक्षिण पूर्वी राजस्थान मेंचम्बल नदी पर राणा प्रताप सागर से चम्बल नदी के बहाव तक इसका फैलाव है। इस पानी में मगरमच्छ तथा घड़ियाल प्रकृति की गोद में अपना जीवन-यापन एवं वंष समृद्धि करते हैं। इसका उद्देष्य घड़ियालों की प्रजाति को संरक्षित करना तथा उनकी संख्या में वृद्धि करना है।

रामगढ़ विषधारी अभयारण्य
            बूँदी से यह अभयारण 15 कि.मी. दूर है। यह अभयारण 307 वर्ग कि.मी. के बीच फैला हुआ है। बहुत पुराने समय से इस स्थान को बाघ-बघेरों का घर माना जाता है। बाघ-बघेरों के अलावा इसमें जरख, रीछ, गीदड़, नीलगाय, चीतल, चिंकारा, जंगली बिल्ली, भेड़िया, लोमड़ी, नेवला तथा जंगली सूअर आदि जीव देखे जा सकते हैं।

बन्ध बरेठा अभयारण्य
            यह अभयारण्य केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर से 50 कि.मी. दूर है। पुराने समय में अरावली पर्वतमालाओं में बहती नदियों को रोककर बरेठा स्थान पर एक बाँध बनाया गया था। इसका क्षेत्रफल 193 वर्ग कि.मी. है तथा अनेक प्रजातियों के वन्य जीव व पक्षी सुरक्षित है।

सवाई मानसिंह अभयारण्य
            रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान से लगा हुआ यह वन क्षेत्र, जिसको 1984 में अभयारण्य के रूप में नाम दिया गया था, 103 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। रणथम्भौर में जब उसकी क्षमता से अधिक बाघ हो जायेंगे, तब उनको इन अभयारण में रखा जायेगा। अब भी यहाँ बाघ, बघेरा, नीलगाय, चीतल तथा सांभर जीवों को देखा जा सकता है।

कैलादेवी अभयारण्य
            करौली के पास यह अभयारण्य 376 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला है, जिसका नामकरण 1983 में किया गया था। यह पर्वतीय सघन वन क्षेत्र में स्थित है। रणथम्भौर के जंगलों के पास होने के कारण वहाँ के बाघों की बढ़ती संख्या को यहाँ भविष्य में रखना सम्भव हो पायेगा। वर्तमान में यहाँ पर बघेरा, रीछ, जरख, सांभर, चीतल तथा नीलगाय आदि वन्य जीव मिलते हैं।

रामसागर वन विहार अभयारण्य
            यह स्थल राजस्थान के पूर्वी जिले धौलपुर में आगरा-बम्बई, राष्ट्रीय राजमार्ग पर धौलपुर से 10 कि.मी. दूर है। झील के किनारे बसा होने के कारण पानी के पास रहने वाले पक्षी भी मिलते है। यहाँ पर अनेक वन्य जीव जैसे जंगली सूअर, सांभर, नीलगाय, चीतल तथा तीतर, मोर देखे जा सकते हैं। यह हर मौसम में दर्षनीय स्थल है।

आबू पर्वत अभयारण्य
            राज्य के पष्चिमी जिले सिरोही के माउण्ट आबू की पर्वत मालाओं के बीच स्थित यह बहुत ही सुन्दर दर्षनीय स्थल है, जो कि 112 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। यह आबू रोड़ से 20 कि.मी. दूर है। यहाँ पर रीछ, सूअर, सांभर, नीलगाय, खरगोष, जंगली मुर्गा, तीतर तथा अनेक पक्षी मिलते हैं।

कुम्भलगढ़ राणकपूर अभयारण्य
            यह अभयारण्य राज्य के दक्षिणी जिले उदयपुर में आता है, जो अरावली पर्वतमालाओं में तथा उससे लगे मैदानी भागों में स्थित है। यह उदयपुर से 80 कि.मी. दूर कुम्भलगढ़ कस्बे के पास है। यहाँ पर तेंदुआ, भालू, सांभर, नीलगाय, चीतल व जंगली मुर्गा देखने को मिलते हैं। इसके पास में रणकपुर जैन मन्दिर तथा कुम्भलगढ़ का किला है, जो अति दर्षनीय स्थल है।

सुन्धामाता भालू अभयारण्य
            राजस्थान में जालोर व सिरोही के बीच जसवन्तपुरा क्षेत्र के सुन्धामाता इलाके में भालुओं का पहला अभयारण्य (कंजर्वे षन रिजर्व) बनाने की घोषणा 20 जुलाई, 2010 को दी गई। 4468 वर्ग कि.मी. क्षेत्र इसके लिए निर्धारित किया गया है। यहाँ लगभग 300 भालू है। 
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