रेगिस्तान में जल


रेगिस्तान में जल

रेगिस्तान में जल ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कभी-कभार होने वाली वर्षा के अलावा रेगिस्तान में लगभग सदैव जल की मांग आपूर्ति से अधिक ही रहती है। रेगिस्तान में सभी जीवों और वनस्पतियों को जल की कमी का सामना करते हुए जीवन यापन करना पड़ता है। किन्तु रेगिस्तान में जो जैविक जीवन है वह जल की कम उपलब्धता को भली-भांति समझते हुए भूमि और हवा से जल को सोखकर अपने आप को वहां की विषम परिस्थितयों के अनुकूल ढाल लेता है।

शुष्क तथा अर्धशुष्क जलवायु के क्षेत्रों में धरती की सतह का जल तथा धरती के अंदर स्थित जल का चक्र अधिकतर पूरा नहीं हो पाता क्योंकि वर्षा से प्राप्त जल सतही मिट्टी की मोटी एवं शुष्क परत के अंदर समाने से पहले ही वाष्पीकरण द्वारा वाष्प में बदल जाता है। रेगिस्तान के ऐसे क्षेत्रों में धरती के अन्दर जल के श्रोतों का पुनर्भरण नहीं हो पाता है। किसी भी क्षेत्र विशेष के जल संसाधन प्रबंधन द्वारा जल चक्र की यह प्रक्रिया अवश्य ही चर्चा तथा उचित कार्यवाही का विषय होना चाहिए। - ग्राउंड वाटर रिज़रटवायर फॉर थ्रस्ट्री प्लेनेट, अर्थ साइंस फार सोसायटी फांउडेशन, लेडन, नीदरलैंड, 2005

वर्षा
रेगिस्तान में बहुत ही कम वर्षा होती है। रेगिस्तान में वर्षा न केवल बिरले ही होती है बल्कि अनिश्चित भी है। यहां अक्सर अनेक वर्ष बारिश के इंतजार में ही बीत जाते हैं। यहां पर वाष्पीकरण की दर वर्षा से प्राप्त होने वाले जल की अपेक्षा अधिक होती है। रेगिस्तान में चलने वाली गर्म और शुष्क हवा यहां के पानी को जल्द ही वाष्पित कर देती हैं। कभी-कभी तो वर्षा के जल का धरती पर गिरने से पहले ही वाष्पन हो जाता है।
गर्म तथा ठंडे रेगिस्तानों में वर्षा से प्राप्त जल की मात्रा में अंतर होता है। गर्म रेगिस्तान में वर्षा बहुत कम होती है और यदि होती भी है तो सूखे के लंबे अंतराल के बाद। गर्म रेगिस्तानों की तुलना में ठंडे प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है। रेगिस्तान में औसतन वर्षा 250 मि.मी. से कम ही होती है तथा अनेक क्षेत्रों में तो वर्षा की मात्रा इससे भी कहीं कम होती है। कुछ क्षेत्रों में तो वर्षा बहुत ही कम होती है। अटाकामा रेगिस्तान विश्व का शुष्कतम स्थान है। अटाकामा में मापनीय वर्षा एक मिलीमीटर या अधिक होती है जो अनिश्चित अवधि में या 5 से 20 वर्षों में एक बार होती है। यहां वार्षिक वर्षा केवल 1.5 से.मी. तक ही अंकित की गई है। सहारा रेगिस्तान के आंतिरक क्षेत्रों में भी वर्षा 1.5 से.मी. से कम ही होती है। लेकिन जब वर्षा होती है तो रेगिस्तान जीवन्त हो जाता है, उस समय वहां फूल खिलते हैं एवं बारिश के समय में प्रकृति, संसाधनों की प्राप्ती से उल्लासित हो उठती है। अल्प अवधि की बारिश से ही रेगिस्तान, संसाधनों से समृद्ध हो जाता है। रेगिस्तानी पारिस्थितिकी के निर्माण में बारिश की अहम् भूमिका होती है।

नदियां और झरने
रेगिस्तानों में क्षणिक या कम अवधि की जल धाराएं, झरने आदि भी जल के श्रोत होते हैं। जो झरने या धाराएं अल्पावधि के लिए प्रवाहित होती हैं वह क्षणभंगुरता को उल्लेखित करती हैं। ऐसे ही अस्थायी झरने अथवा नदियों की थाला (बेडस्) लगभग सूखी ही रहती है, किन्तु वर्षा के कारण इनमें भारी मात्रा में जल आ जाता है जो लाभप्रद होने के बजाय कभी-कभी विनाशकारी सिद्ध होता है। जल का भीषण प्रवाह इन क्षेत्रों में आकस्मिक् बाढ़ का कारण बनता है। संसार में नदियों का बड़ा तंत्र ऐसे शुष्क प्रदेशों में होकर बहता है, उदाहरण के रूप में आस्ट्रेलिया का मरे डार्लिंग, उत्तरी अमेरीका का रियो ग्रांड नदी, एशिया में सिंधु तथा अफ्रीका में नील नदी। इन नदियों को बहिर्जन्य नदियां कहते हैं क्योंकि इनकी उत्पत्ति शुष्क प्रदेश या रेगिस्तान के बाहर होती है। रेगिस्तान से गुजरने की प्रक्रिया में इन नदियों से वाष्पीकरण द्वारा जल की विशाल मात्रा वाष्प में बदल जाती है। बहिर्जन्य नदियां रेगिस्तान में पौधों और जीवों को जल की आपूर्ति करती हैं लेकिन जल के अथाह भंडार के कारण बर्हिजन्य नदियों की जल राशि अधिक प्रभावित नहीं होती है।

जो नदियां रेगिस्तानों से निकलती है उन्हें एंडोजीनस यानि अंतर्जात कहते हैं। इनकी उत्पत्ति धरती से निकले जल श्रोतों के कारण होती है। यहां की धरती में जल मुख्य रूप से झरझरी चट्टानों में अथवा चट्टानों की खोह में संचित होता है। रेगिस्तान की अंतर्जात नदियां कभी भी सागर तक नहीं पहुंच पातीं अपितु रेगिस्तान के थालों या द्रोणियों (Inland Basins) में पहुंच कर थम जाती है।

रेगिस्तान में जीवन यहां बहने वाली नदियों पर निर्भर हैं जो लगातार अकाल और बाढ़ की अवस्थाओं के बीच परिवर्तित होती रहती है। रेगिस्तानी नदियां विश्व की अन्य क्षेत्रों की नदियों से कम ही समानता प्रदर्शित करती हैं। रेगिस्तान की विषम जलवायु और भूभाग की तुलना में, जहां चारों तरफ रेगिस्तान तो हैं लेकिन अन्वेषक नहीं, वहां नदी पारिस्थितिकी का अध्ययन कम ही किया गया है।

झीलें

रेगिस्तान में झीलें भी होती हैं। झीलें वहां बनती हैं जहां पर्याप्त बारिश या द्रोणियों से बर्फ पिघलने से आंतरिक नाली की रचना होती है। रेगिस्तानी झीलें सामान्यतया उथली, अस्थाई और लवणयुक्त होती हैं। रेगिस्तानी झीलों के सूखने पर सतह के ऊपर नमक की कठोर पर्त निर्मित होती है।

एक आंतरिक द्रोणी को अंतस्थ या संवृत द्रोणी भी कहते हैं जो ऐसा जलसंग्रहण क्षेत्र है जहां से पानी बहता नहीं है। इस बंद क्षेत्र में हुई बारिश का पानी केवल वाष्पन द्वारा ही ख़त्म होता है। हालांकि यह अन्तः द्रोणी किसी भी जलवायु क्षेत्र में बन सकती है, लेकिन फिर भी यह अधिकतर गर्म रेगिस्तानों में स्थित होती है। गर्म रेगिस्तानों के इन संवृत क्षेत्रों में पानी का आना बहुत कम और वाष्पन दर अधिक होती है। इन सभी कारणों से झीलों में नमक और अन्य खनिज तत्वों की सांद्रता बढ़ती रहती है। जिससे अक्सर आंतरिक क्षेत्रों में बहुत अधिक मात्रा में नमक (जिन्हें नमक समतल, नमकीन झील, अम्ल या प्लाया भी कहते है) मिलता है।
इन क्षेत्रों में मिलने वाली झीलें स्थाई या अस्थाई हो सकती है। यहां की स्थाई झीलें नाटकीय ढंग से अपना आकार और आकृति बदलती रहती हैं। ये झीलें अक्सर गर्मियों या सूखे के मौसम में छोटी (या अनेक छोटी झीलों में विभक्त) हो जाती हैं।
ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में स्थित कुछ न जमने वाली झीलों में से एक अंटार्कटिका स्थित विडा झील है, इस झील की इस विशिष्ट प्रवृत्ति का कारण इसके जल की लवणता का सागरीय जल से सात गुना होना है।

भू-जल
अनुमानतः धरती के अंदर 10,000,000 (एक करोड़) घन कि.मी. जल का भंडार है जो वैश्विक स्तर पर वर्षा से प्राप्त वार्षिक जल का 200 गुना है। धरती के अंदर संचित जल को भू-जल कहते हैं, यह जल भंडार रेगिस्तान में भी उपस्थित है। धरती के अंदर का अधिकांश भू-जल पिछले एक लाख वर्षों के दौरान भंडारित हुआ है।
इस भू-जल भंडार की उपस्थिति का ज्ञान तब हो सका जब 1930 से मध्य पूर्व एशिया, मध्य एशिया तथा उत्तरी अफ्रीकी आदि क्षेत्रों में धरती के गर्भ में समाए तेल की खोज प्रारंभ हुई थी। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) और विश्व बैंक ने रेगिस्तान में भू-जल के सर्वेक्षण का प्रयास और भू-जल खनन के लिए स्थाई तकनीकों को विकसित करने का प्रयास किया है।
रेगिस्तान में भू-जल, जलभर या जल से संतृप्त शैलों एवं अवसाद में भंडारित है। वह गहराई, जहां पर मिट्टी के रंध्र जल से पूर्णतः संतृप्त होते हैं, उस स्थान पर जल स्तर कहलाता है। जब तक प्राकृतिक रूप से सतही जल भूगर्भ में समाता रहता है तब तक उस स्थान पर जल पुनर्भरित होता रहता है। गहराई में स्थित जलभर में संग्रहित जल को जीवश्म जल कहते हैं। यह जल हजारों वर्षों में भंडारित होता है। जलभर अधिक लंबे समय तक जीवाश्म स्तर को पुनर्भरित नहीं कर पाता है। भू-जल का वितरण असमान होने के साथ इसकी अधिकतर मात्रा अत्यधिक गहराई में स्थित है। जब रेगिस्तान में भू-जल स्वतः सतह पर निकल आए तो वहां नखलिस्तान निर्मित होते हैं।

आर्द स्थानों में जहां अधिक बारिश होने के साथ ही भू-जल भंडार में भी रिसाव द्वारा अधिक पानी पहुंता है वहीं शुष्क और अर्धशुष्क स्थानों पर सतही जल और भू-जल आपस में कम ही संबंधित होते हैं।
रेगिस्तान में वर्षा कम होने और मिट्टी की शुष्क प्रवृत्ति के कारण जल की बहुत थोड़ी मात्रा ही धरती के अंदर पहुंच पाती है जिससे शुष्क क्षेत्रों में भू-जल का पुनर्भरण भी कम ही होता है। भू-जल बहुत ही उपयोगी और प्रचुर संसाधन है, लेकिन शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में यह विकास पूर्व की अवस्था में है। अर्ध शुष्क तथा शुष्क क्षेत्रों के अंतर्गत कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए भू-जल के उपयोग में वृद्धि होने से भू-जल की मात्रा पूर्णतः समाप्त हो सकती है। इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि भू-जल का दोहन न हो लेकिन पर्याप्त योजना और इसके उपयोग में किफायत से इससे और अधिक लाभ लिया जा सकता है।

अभी तक जल संरक्षण, जल उपयोग में दक्षता, जल का पुर्नउपयोग, भू-जल पुनर्भरण और परिस्थितिकी के स्थायित्व की ओर अपर्याप्त ध्यान दिया गया है। नलकूप खनन तकनीकों के अनियंत्रित उपयोग से भू-जल दोहन की दर अत्यधिक बढ़ने से भू-जल का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हो रहा है। विशाल क्षेत्र में सिंचाई करने हेतु आधुनिक तकनीकी विकास ने 500 मीटर गहराई पर स्थित जल को बाहर निकालना संभव कर दिया है। यद्यपि भू-जल से विशाल क्षेत्रों को सिंचित किया जा रहा है लेकिन यह प्रक्रिया रेगिस्तानी पारिस्थितिकी के लिए संकट का कारण बन सकती है। उदाहरण के लिए साऊदी अरब के रियाद क्षेत्र में हजारों एकड़ क्षेत्र में भू-जल का उपयोग कृषि क्षेत्र को सिंचित करने में किया जा रहा है।

रेगिस्तानी क्षेत्रों में वृहद स्तर पर खेती का परिणाम व्यापक रूप से विश्व के अनेक रेगिस्तानों के अवक्रमण (डिग्रेशन) के रूप में हो सकता है। भू-जल किसी भी राजनैतिक सीमाओं के बंधन से मुक्त है। इसलिए एक देश में किया गया भू-जल दोहन दूसरे देश के जल स्तर को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में भू-जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए सरकारों व संस्थाओं को अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य स्थापित करना होगा।

रेगिस्तानी कोहरा

नामीबा और अटाकामा रेगिस्तान के कुछ हिस्सों में कोहरा नमी का महत्वपूर्ण श्रोत है। ये रेगिस्तान यहां छाए कोहरे से लगभग 130 मि.मी. वर्षा के बराबर नमी प्राप्त करते हैं। कहीं-कहीं कोहरा जीवन के स्थायित्व के लिए आवश्यक नमी उपलब्ध कराता है। सुबह के समय नामीबा में कोहरा अधिकतर दस किलोमीटर तक छाया रहता है। स्थलाकृति में कोई भी सूक्ष्म अनियमितता (कांटेदार फसल) कोहरे को संघनित कर जल की बूंदों में बदल देती है। जब कोहरा-जल संग्रहण विशाल क्षेत्र हो, जो वन्यजीवों को सहारा दं सें, तो इसे प्रचुर समृद्ध क्षेत्र कहा जाता है। इस प्रकार रेगिस्तान में मानव कोहरे से पेयजल के श्रोतों की कमी को पूरा कर सकता है। कोहरे से पेयजल प्राप्ति का पहला प्रयोग सन् 1987 में चिली के शुष्क तटीय रेगिस्तान में किया गया था।

ओस
शुष्क और अर्धशष्क क्षेत्रों में ओस शुद्ध जल का श्रोत हे। ओस सुबह या शाम के समय खुले पदार्थों पर दिखाई देने वाली जल बुंदकियों का एक रूप है। जब खुली सतह ऊष्मा को उत्सर्जित कर ठंडी होती है तब वायुमंडलीय नमी, जो उनके वाष्पन की दर से अधिक दर से संघनित होती हैं, के परिणामस्वरूप जल बुंदकियों का निर्माण होता है। शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में उन क्षेत्रों के जीवाणु, पौधों और छोटे कीटों की जल आवश्यताओं की पूर्ति को देखते हुए ओस की भूमिका महत्वपूर्ण है। बालू टिब्बों पर पपड़ी के निर्माण से यह जैविक गतिविधियों के स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण है यह पपड़ी टिब्बों के स्थायित्व और रेगिस्तानी परिस्थितिकीय के लिए महत्वपूर्ण है। इजराइल के नेगेव रेगिस्तान में प्रति वर्ष 200 दिन ओस गिरती है।

बर्फ
बर्फ या हिम वर्षा का ऐसा रूप है जिसमें जल क्रिस्टलीय रूप में बरसता है। कुछ रेगिस्तानों में तो शीतकालीन हिमपात या बर्फबारी ही पानी का मुख्य श्रोत है। इस प्रकार के रेगिस्तानों में सर्दियों में बहुत ठंड होती है। हिम में पानी की मात्रा उसी मोटाई की पानी की पर्त के बराबर होती है। उदाहरण के लिए यदि किसी क्षेत्र में 30 सेंटीमीटर हिमपात होता है और तब यदि यह हिम पिघलती है तो यह किसी तालाब को 30 सेंटीमीटर पानी से भरने के लिए पर्याप्त होगा। अंटार्कटिका विश्व का सबसे विशाल ठंडा रेगिस्तान है, जो 98 प्रतिशत महाद्वीपीय बर्फ छत्राक (आईस शीट) तथा 2 प्रतिशत बंजर चट्टानों से घिरा है।

नखलिस्तान (ओएसिस)
नखलिस्तान यानी ओएसिस शब्द का उद्भव प्राचीन मिस्र भाषा के वाह (Wah) शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ रेगिस्तान में उर्वर स्थान से है। रेगिस्तानी में नखलिस्तान या मरुद्यान वे उर्वर स्थान हैं जहां जल की पर्याप्त आपूर्ति होती है। एक नखलिस्तान प्राकृतिक स्थाई श्रोतों के समीप होता है, जहां संतृप्त शैलों या जलभर से पानी आता रहता हैं रेगिस्तान में नखलिस्तान वह केंद्र होता है जहां सतह के नीचे झरने की उपस्थिति होने से जलस्तर अच्छा रहता है। नखलिस्तान के आसपास ही मानवीय बसावट होती है और रेगिस्तानी यात्रियों का मार्ग भी इनके समीप से ही गुजरता है। सामान्यतया इन क्षेत्रों के आसपास वनस्पतियों का विकास भी अच्छा होता है। अनेक स्थानों पर खजूर के पेड़ नखलिस्तान के सूचक होते हैं। यह स्पष्ट है कि यदि प्रकृति ने रेगिस्तान को अत्यधिक शुष्क क्षेत्र बनाया है तो वहीं उसमें जीवन के स्थायित्व के लिए पर्याप्त जल श्रोतों की व्यवस्था भी की है और प्रकृति जीवन की सहायता इसी प्रकार करती रहेगी।



Author:  सुबोध महंती
Source:  विज्ञान प्रसार


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