बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश


बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश

भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से कम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी के रूप में।
जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं।
सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी।
आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कम्पनियाँ, भारतीय कम्पनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कम्पनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिये धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कम्पनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।
ये 8 ब्रिटिश कम्पनियाँ निम्न थीं:-
1.            एन्ड्रयूल एण्ड कम्पनी
2.            मेक्लाइड एण्ड कम्पनी
3.            मार्टिन एण्ड कम्पनी
4.            बर्न एण्ड कम्पनी
5.            डंकन ब्रदर्स एण्ड कम्पनी
6.            आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी
7.            गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कम्पनी
8.            शा वालेस एण्ड कम्पनी

भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कम्पनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कम्पनियों ने भारत में पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कम्पनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुयी पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कम्पनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया। हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं हैं, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हों। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कम्पनियाँ घर-घर में घुसी हुयी हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कम्पनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।
नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कम्पनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना दिया है-
कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कम्पनियाँ घुसी हुई हैं।
1.            दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में
2.            दवा उद्योग के क्षेत्र में
3.            खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में
4.            रासायनिक पदार्थों के उत्पादन में
5.            मोटर-गाड़ियों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में
6.            भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
7.            इलेक्ट्रानिकी व इलैक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
8.            सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
9.            फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन (चाय, कॉफी, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)
10.          वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में
11.          सीमेन्ट उद्योग में
12.          तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में
13.          धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में
14.          जूट उद्योग में
15.          सिले हुये (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में
16.          जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में
17.          रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में
18.          बच्चों के खिलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में
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