भुगतान सन्तुलन और निर्यात का भ्रम


 भुगतान सन्तुलन और निर्यात का भ्रम

 विदेशी कम्पनियों को देश में बुलाने के पीछे एक ताकतवर तर्क होता है कि भारतीय उत्पाद अपनी घटिया गुणवत्ता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में टिक नहीं पाता, अतः आधुनिक तकनीक से बेहतर उत्पादन करने से निर्यात में तेजी आयेगी और देश में भुगतान सन्तुलन की स्थिति अच्छी रहेगी अर्थात् निर्यात को बढ़ावा देने के लिये विदेशी कम्पनियों की आवश्यकता होती है। लेकिन इस तर्क का खोखलापन नीचे दी हुयी तालिका प्रदर्शित कर देती है:-
वर्ष
विश्व निर्यात में भारत का  हिस्सा
1938
4.5 %
1950
2.2 %
1955
1.5 %
1960
1.2 %
1965
1.00 %
1970
0.7 %
1975
0.5 %
1980
0.1 %
1990
0.05 %
1991
0.045 %
1992
0.042 %
1993
0.04 %
1994
0.38 %

 देश के निर्यात की घटती हुयी दर से अनुमान लगाया गया है कि सन् 1995 के समाप्त होने तक विश्व निर्यात में भारत का हिस्सा मात्र 0.03 % रह जायेगा।
निर्यात में लगातार घाटे से, देश एक भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहा है जो आतंकवाद से भी अधिक भयावह है क्योंकि इससे देश में राजनीतिक एवं आर्थिक अस्थिरता तथा अराजकता का खतरा पैदा हो गया है। यह संकट विदेशी मुद्रा की तंगी अर्थात् भुगतान संतुलन (निर्यात में कमी तथा आयात में बढ़ोत्तरी) की प्रतिकूलता से उत्पन्न हुआ है। देश के धुरंर अर्थशास्त्री एवं योजना शास्त्री पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसी रणनीति को खेजने में लगे हुये हैं जिससे इसका सामना किया जा सके।
भुगतान संतुलन का संकट भारत के लिये कोई नयी बात नहीं है। पिछले लगभग 45 वर्षों के विकास काल में भारत को कई बार इस स्थिति का सामना करना पड़ा है। यह संकट सर्वप्रथम 1957 में पैदा हुआ था, जब भारत को अपने व्यापक औद्योगिकीकरण के लिये निर्यात से अधिक आयात करना पड़ा था।
सन् 1966 में ऐसी संकटपूर्ण स्थिति पुनः उत्पन्न हुयी तो संकट पर काबू पाने के लिये तथा निर्यात बढ़ाने के बाहरी दबाव के चलते भारत ने अपनी मुद्रा का 57.5 % अवमूल्यन कर दिया। बाद में 1970 के आरम्भ होने वाले दशक में पेट्रोलियम की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण भारत संकट में फंस गया। किसी तरह खाड़ी के देशों से प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गयी धनराशि से भारत इस संकट से बच गया।
परन्तु 1985 के बाद से स्थिति एकदम बदल गयी है। भारी व्यापार घाटों तथा विदेशी कर्जो ने देश की कमर तोड़ दी है। विदेशी मुद्रा का खजाना खाली हो गया है।
विदेशी कम्पनियों को लगातार व्यापारिक घाटों को पूरा करने के लिये बुलाया जा रहा है लेकिन व्यापार घाटे लगातार बढ़ रहे है। 1983-84 में 5,871 करोड़ रूपये का घाटा हुआ, जो 1985-86 में बढ़कर 9,586 करोड़ रूप्ये तक पहुँच गया। 1985-86 से 1987-88 तक औसतन व्यापार घाटा 9,412 करोड़ रूपये रहा। 1995 के अन्त तक व्यापार घाटा 7,500 करोड़ रूपये तक पहुँच जायेगा।
इस घाटे का मूल कारण देश में अपनायी जाने वाली उदारीकरण की नीति है। तकनीकी को उन्नत बनाने के इरादे से अधिक से अधिक
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्यौता दिया जा रहा है। कम्पनियों की संख्या देश में बढ़ रही है। और उसी अनुपात में आयात बढ़ रहा है जबकि निर्यात में लगातार कमी आ रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने निर्यात के लक्ष्य को पूरा कर पाने में असफल सिद्ध हो रही हैं। वर्ष 1988-89 के दौरान ही 293 बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने निर्यात लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी हैं।
इन सबके बावजूद सरकार विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के दबाव में, निर्यात बढ़ाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली छूट दे रही है। वास्तव में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का निर्यात भारत के कुल निर्यात का 0.5 % ही रहता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मार्च 1992 की रिपोर्ट के अनुसार 326 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1987-88 में केवल 810.37 करोड़ रूपये का निर्यात किया, जबकि इस वर्ष में भारत का कुल निर्यात 15,674 करोड़ रूपये के लगभग था। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ निर्यात बढ़ाने के नाम पर आती है लेकिन इनकी नीयत भारतीय बाजार पर कब्जा करने की रहती है। पॉलिटिकल इकॉनामी ऑफ इण्डियाकी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1 करोड़ रूपये से अधिक की चुकता पूँजी वाली 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1986-87 में केवल 412.71 करोड़ रूपये का निर्यात किया जबकि इन कम्पनियों की कुल बिक्री 9,879.77 करोड़ रूपये थी। अर्थात् इन 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1986-87 में अपनी कुल बिक्री का मात्र 4.18 प्रतिशत ही निर्यात किया। इसी रिपोर्ट के अनुसार 1985-86 में इन 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियांे ने 8,997 करोड़ रूपये की कुल बिक्री की, लेकिन निर्यात मात्र 384.67 करोड़ रूपये का ही किया। अर्थात् कुल बिक्री का 4.23 प्रतिशत मात्र।
सरकार ने विश्व बैंक और मुद्राकोष के दबाव में जुलाई 1991 में रूपये का लगभग 25 प्रतिशत अवमूल्यन किया। इसके लिये वित्तमंत्री का तर्क था कि देश का निर्यात और अधिक बढ़ाने के लिये अवमूल्यन किया गया है। लेकिन इसके बावजूद 1990-91 के मुकाबले 1991-92 के निर्यात् में 15 प्रतिशत की कमी आयी। जबकि इसके पहले के 5 वर्षों में निर्यात में 16.8 प्रतिशत औसतन बढ़ोत्तरी हुयी। इ. 5 वर्षो में निर्यातत 9.7 अरब डालर से बढ़कर 18.1 अरब डालर तक हो गया। परन्तु 1991-92 में निर्यात घटकर 17.8 अरब डालर रह गया।
वर्ष       
निर्यात (करोड रू.)
निर्यात (करोड रू.)
घाटा (करोड रू.)
1979&80
 6.418
 9,143
 2.725
1980&81
 6.576
 12,544
 5.967
1981&82
 7.766
 13,887
 6.121
1982&83
 9,137
 11,913
 1,776
1983&84
 10,169
 16,039
 5,871
1984&85
 11,959
 18,680
 6,721
1985&86
 11,578
 21,164
 9,586
1986&87
 13,315
 22,669
 9,354
1987&88
 16,396
 25,633
 9,296
1988&89
 20,646
 34,202
 13,556
1989&90
 28,234
 41,173
 10]640
1990&91
 32,553
 43,193
 10,640
1991&92
 44,042
 47,851
 3,806
1992&93
 14,921
 52,205
 10,284
1993&94
 55,824
 57,649
 1,825
1994&95
 65,482
 71,247
 5,765

 सन् 1988 बाद घाटे में और तेजी से वृद्धि हुयी है। औसतन भारत की निर्यात आया, आयात भुगतान का 60 प्रतिशत है।
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