घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी और दवाओं के नाम पर लूट


घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी

आँखे मूंदकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से, जब हम बनी-बनायी तकनीक का आयात करते है तो हम दरअसल दूसरे देशों के इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों को काम मुहैया कराते हैं। अर्थात् अपने देश से विकसित देशों को रोजगार का निर्यात करते है। इस तकनीकी आयात की प्रक्रिया में भारतीय इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों को जो अतिरिक्त कार्य दिया जा सकता था और अधिक रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते थे, वे एकदम समाप्त हो जाते हैं। इससे हमारे देश के इंजीनियर व तकनीकी विशेषज्ञ बेकार रहते है, वही दूसरी ओर किसी विकसित औद्योगिक, देश को जहाँ की कम्पनी होती है, अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हो जाते हैं। इसके अलावा जब बनी बनायी तकनीक का आयात होता है तो भारतीय इंजीनियरों का कार्य सिर्फ तन्त्र को चालू रखने का होता है। सर्वविदित है कि कारखानों के रख-रखाव के लिये किसी बड़ी प्रतिभा की जरूरत नहीं होती है। जबकि तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान नयी विधियाँ विकसित करने में और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान द्वारा विकास करने में होता है। इस प्रकार जो इंजीनियर या तकनीकी विशेषज्ञ देश में काम में लगे हूये हैं, उनकी प्रतिभा का भी सही उपयोग नहीं हो पाता है। औद्योगिक देशों को एक और बड़ा लाभ उस बुद्धि शक्ति के आयात से मिलता है जो सुनहरे भविष्य की खोज में भारत जैसे देशों से उनके यहाँ जाती है। प्रौद्योगिकी विज्ञान तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों में विशेष शिक्षा पाकर जो लोग देश को उसका कुछ भी लाभ दिये बगैर ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी इत्यादि चले जाते हैं वे उन देशों को न सिर्फ आर्थिक व बौद्धिक लाभ पहुँचाते हैं बल्कि ऐतिहासिक लाभ भी।सेंटर फार प्लानिंग रिसर्च एण्ड एक्शन’ (नयी दिल्ली) के अध्ययन के मुताबिक प्रतिभा पलायन के कारण भारत को अब तक 13 अरब (247 अरब रूपये लगभग) का नुकसान हो चुका है और अगर यह नही रूका तो शताब्दी के अंत तक 5 लाख से ज्यादा कुशल और प्रशिक्षित भारतीय विदेशों में काम कर रहे होंगे। फिलहाल 4 लाख 10 हजार भारतीय विदेशों में काम कर रहे है। अध्ययन के अनुसार भारतीय इंजीनियर विदेशी में 32
प्रतिशत, डॉक्टर 28 प्रतिशत और वैज्ञानिक 5 प्रतिशत है। जब एक डॉक्टर भारत को छोड़कर अमेरिका जाता है तो देश को 3ण्5 करोड़ रूपये का नुकसान होता है लेकिन वह अमरीका में 60 करोड़ यानि 20 गुना धन कमा कर उस देश की समृद्धि में भागीदार होता है। जबकि दूसरी ओर भारत एक विकासशील देश है जहाँ डॉक्टरों का अभाव है, जहाँ शहर में 5 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है तथा गाँव में 45 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है।
                भारत से निकलने वाली प्रतिभाओं की एक बड़ी संख्या अमेरिका चली जाती है। 1957 से 1965 तक अमेरिका में भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों तथा इंजीनियरों की संख्या सिर्फ 1000 थीं वही 1966 से 1968 तक वह संख्या 4000 हो गयी। 1977 तक भारत में 16,849 वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका चले गये।
                उदार आर्थिक नीतियों के चलते देश में विदेशी अनुबंधों की बाढ़ आ गयी है। जुलाई 1995 तक देश में 20,000 से अधिक विदेशी अनुबंध चल रहे हैं। जिनके चलते गैर जरूरी क्षेत्रों में आर्थिक विकास ज्यादा हुआ है। पिछले 5 वर्षों में संगठित क्षेत्रों (बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ व निजी देशी कम्पनियाँ) में सबसे अधिक विकास हुआ है जबकि इस क्षेत्र में रोजगार अवसरों की वृद्धि दर मात्र 1.5 प्रतिशत रही है। यानि संगठित क्षेत्र में पूँजी निवेश सबसे अधिक हुआ है लेकिन रोजगार के अवसर उस तुलना में पैदा नहीं हुये।
                दूसरी ओर देश का लघु उद्योग का क्षेत्र है जिसमें सबसे कम पूँजी का निवेश किया जाता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के जितने भी रोजगार है उनमें से 80 प्रतिशत इन असंगठित लघु उद्योगों में है। लघु उद्योगों में 1986-87 में रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 10.1 करोड़ थी जो वर्ष 1987-88 में बढ़कर 10.7 करोड़ तक पहुँच गयी भारत में 1988 के अन्त तक लघु उद्योगों की कुल संख्या 14.6 लाख थी। इसमें से 3 लाख लघु इकाईयाँ इन विशालकाय कम्पनियों के बाजार म
एकाधिकार के चलते बीमार हो गयी हैं और बन्द होने के कगार पर हैं। चूँकि इन विदेशी कम्पनियों ने लघु उद्योग में बनने वाले हर सामान को बनाने के क्षेत्र में घुसपैठ कर रखी है, अतः लगभग 10 लाख 30 हजार अन्य छोटी इकाईयाँ इनके सामने प्रतिस्पर्धा में धीरे-धीरे चल रही है। हर वर्ष देश में बीमार इकाईयों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिससे लाखों लोग बेराजगार होते जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 1 करोड़ 84 लाख नये बेराजगार लोग पैदा हो जाते है। इनमें से अधिकांश छोटी इकाईयों के बन्द हो जाने की वजह से बेरोजगार हो जाते है। इसके अतिरिक्त इन विदेशी कम्पनियों ने विकास के नाम पर सैकड़ों वर्षो से चल रहे हमारे देशी कारोबार, हुनर और हस्त शिल्प को रौंदा है, जिसमें लगे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी है। आधुनिकीकरण की सबसे ज्यादा मार पड़ी है कारीगरों, दसतकारों व कुटीर उद्योगों पर। जूता उद्योग का आधुनिकीकरण होगा तो कोन मारा जायेगा ? मोची। कपड़ा उद्योग का मशीनीकरण होगा तो कौन बरबाद होगा ? बुनकर। वस्त्र
उद्योग का रेडीमेडीकरण (सिले सिलाये कपड़े) होगा तो कौन नष्ट होगा ? दर्जी। मिठाई बनाने के क्षेत्र में जब विदेशी कम्पनियाँ घुसेंगी तो कौन हैरान होगा ? हलवाई। कुल्हड़ की जगह विदेशी कम्पनियाँ प्लास्टिक के गिास बनाने लगेंगी तो कुम्हार किस काम का रह जायेगा ? फलों का रस डिब्बा बन्द करके बेचने  के लिये विदेशी कम्पनियाँ आयेंगी तो कौन समाप्त होगा ? फलों का रस बेचने वाले लोग। पानी बेचने के लिये भी विदेशी कम्पनियाँ आयेंगी तो आगे कहा नहीं जा सकता, हम लोग स्वयं सोच लेें। सरकारी आँकड़ों के अनुसार सन् 1994 के अन्त तक देश में कुल बेरोजगारी की संख्या लगभग 16 करोड़ है। यह संख्या उन लोगों की है जिन्होंने अपना पंजीकरण सरकार कार्यालयों में करवा लिया है। इसके अतिरिक्त देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो कभी इस तरह का पंजीकरण करवाने के लिये प्रस्तुत नहीं होते है। गाँव के अधिकांश युवक तो पंजीकरण करवाते ही नहीं है। इस तरह के लोगों को मिलाकर अनुमानित बेरोजगारों की संख्या 20 करोड़ से अधिक है।
                एडीडास प्यूमा     ड्यूक    नाईक  लाट्टो    आदि विदेशी कम्पनियों के भारत में सिले हुये (रेडीमेड) कपड़ों के क्षेत्र में घुस जाने से देश भर के लाखों दर्जियों की आजीविका छिनेगी। भारत में बहुत तेजी से सिले हुये कपड़ों का बाजार
बनता जा रहा है। एडीडास, प्यूमा, लोट्टो द्वारा भारत के खेल सामान बनाने वाले क्षेत्र में घुस जाने से, जालन्धर के खेल सामान उत्पादन के लघु उद्योग में लगे हुये 60 हजार कुशल कारीगरों के अस्तित्व को खतरा है। इसके अलावा उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा दिल्ली में लगे हुये लगभग 1 लाख 80 हजार अन्य कुशल श्रमिकों का रोजगार भी खतरे में पड़ जायेगा। ब्रिटानिया के चलते उ.प्र., बिहार, व मध्यप्रदेश के बेकरी उद्योग में लगे 1 लाख 22 हजार से भी अधिक श्रमिकों की रोजी-रोटी चौपट होने के कगार पर है।
                बाटा व प्लास्टिक के जूतों के चलने से देश के लाखों मोचियों को बरबाद किया है। विमको ने बरेली व शिवाकाशी के माचिस उद्योग में लगे हजारों श्रमिकों को चौपट कर दिया है। पेप्सी कोला के आने से खाद्य सामग्री और पेय बनाने वाली देश की 2525 छोटी इकाइयों में से अधिकांश बंद हो गयी। लगभग 3 लाख 75 हजार कुशल कारीगर श्रमिक अपनी आजीविका के लिए दर-दर भटक रहे है।


दवाओं के नाम पर लूट
अपने आप को शिक्षित व जागरूक समझने वाले किसी भी व्यक्ति से अगर कहा जाय कि वह मात्र कुछ पैसे खर्च करके मूंगफली की खलीबाजार से खरीद कर रोज दूध में डालकर या वैसे ही खाये तो वह व्यक्ति पहले कहने वाले की मूर्खता पर हँसेगा और नाक-भौ सिकोड़ते हुये अन्त में कहने वाले को भाषण पिलाकर दुरूस्त कर देगा। फिर किसी दिन बाजार से जाकर बूस्ट’, ’हॉर्लिक्स’, ’कॉम्प्लान’, ’प्रोटीनेक्सखरीद कर लायेगा और जरोज दूध में डालकर डॉक्टर के बताये अनुसार दिन में तीन बार  या दो बार पियेगा औश्र अपने आप को तरोताजा व शक्तिशाली महसूस करेगा। उसे शायद यह नहीं मालूम, कि बूस्ट’, ’प्रोटीनेक्स’, ’हॉर्लिक्स’, या कॉम्प्लानआदि को ताकात का टॉनिक समझ कर वह विशुद्ध मूंगफली की खलीबाजार से उठा लाया है। बस अन्तर इतना ही है कि यह मूंगफली की खली आकर्षक पैकिंग में अच्छी खुशबू के साथ बन्द है। यह कहानी हममें से किसी की भी हो सकती है। प्रचार तन्त्र द्वारा दिखाये गये आकर्षक विज्ञापनों से हमें खूब अच्छे तरीकेे से बेवकूफ बनाया जाता है।
                टेलीविजन पर दिखाया जाता है कि कपिल देव या सचिन तेन्दुलकर बूस्ट खाते है और उसी के कारण उन्हें क्रिकेट खेलेने की शक्ति मिलती है। इसका सच क्या है ? दूसरी ओर टेनिस का विश्व चैम्पियन पीट सम्प्रास या बोरिस बेकर विश्व स्तरीय टेनिस प्रतियोगिता जीतने के लिये केला खाते है। 9 जुलाई 1995 को लंदन में खेले गये विम्बलडन के फाइनल मैच में अन्तराल के समय पीट सम्प्रास केला खा रहा था। पीट सम्प्रास चिल्ला-चिल्ला कर यह नहीं कहता कि अच्छा टेन्सि खेलने के यिे उसे बूस्ट या प्रोटीनेक्स या कॉम्पलान जैसे टॉनिकों की जरूरत होती है ? वह तो केला खाकर ही अपनी ऊर्जा की पूर्ति करता है। 200 किमी. की रफ्तार वाली गेंद को वापस उससे भी अधिक रफ्तार से भेजना ओर वह भी एक छोटे से मैदान में किसी विशेष कोने पर कितना कठिन काम है ? कितनी शक्ति की आवश्यकता है ? यह सारी शक्ति तात्कालिक रूप से पीट सम्प्रास और बोरिस बेकर जैसे खिलाड़ी मात्र केला खाकर ही पूरी कर लेते है। तब सोचने और समझने की बात है कि केले में अधिक शक्ति है या बूस्ट में ?
                एक अनुमान के अनुसार इस देश में प्रतिवर्ष लगभग 1900 करोड़ रूप्ये के हैल्थ टॉनिकखाये जाते है। लगभग 50 करोड़ रूपये से भी अधिक के हैल्थ फूड्सबेचे जाते है। जबकि सच यह है कि हमें इन हैल्थ टॉनिकों या हैल्थ फूड्स की कतई जरूरत नहीं है। हमारे देश की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करती है। इस आबादी की आमदनी इतनी कम है कि वह रोज संतुलित भोजन भी नहीं कर पाती। ऐसा व्यक्ति जो अपने और अपने परिवार के लिये संतुलित भोजन का प्रबंधा भी नहीं कर सकता उसके लिए किसी डॉक्टर द्वारा हैल्थ टॉनिक  लिखना सरासर अन्याय है। जो लोग संतुलित भोजन लेते है या ले सकते हैं, उन्हें तो फिर हैल्थ टॉनिक की कोई जरूरत ही नहीं। आजकल इस बात का फैंशन हो गया है कि जरूरत न होने पर भी दवाओं को खाया जाय।बीकोसूलया बीकोजाइमका कोई कैप्सूल या टेबलेट खाने के कुछ समय के बाद, यह देखा जाता है कि पेशाब (मूत्र) का रंग पीला हो गया। जो बीकोसूलया बीकोजाइमखाया गया, उसे आंतों ने पचाया और आवश्यकता नहीं होने के कारण गुर्दे द्वारा पेशाब के रूप में बारह निकाल दिया गया। पैसे भी खर्च हुये, आमाशय, लीवर तथा गुर्दे को काम भी अध् िाक करना पड़ा और फायदा हुआ कम्पनी को। अधिकतम 20 रूपये की लागत वाले इन तथाकथित शक्तिवर्धक टॉनिकों को 40 रूपये से लेकर 200 रूपये तक में बेचा जाता है। इन टॉनिकों को बेचने वाली कम्पनियों के मुनाफे का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। भारतीय दवा उद्योग के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। इस समय भारतीय दवा बाजार में लगभग 60,000 दवायें हैं जिनमें से मात्र 250 दवायें हमारे काम की हैं, बाकी 59,750 दवायें एकदम बेकर है जो किसी काम की नहीं है। इन बेकार दवाओं को बेचकर ये विदेशी कम्पनियाँ 100 प्रतिशत अथवा 200 प्रतिशत का मुनाफा नहीं बल्कि 800 प्रतिशत तक मुनाफा कमा रही है। एक-एक दवा बाजार में 40 से अधिक नामों के बिक रही है। कम्पनी का मुनाफा उतने ही गुना बढ़ता चला जा रहा है। 90 प्रतिशत ऐसे टॉनिक बनाकर बेचे जा रहे है जिनकी हमारे जीवन में कोई उपयोगीता नहीं है। इतना ही नही उल्टे वे हमारे शरीर पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। इन निरर्थक और नुकशानदेह दवाइयों के जरियें हर वर्ष करोड़ों रूपये देश से बाहर जा रहे हैं। इतना ही नही, इसके अलावा ये विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में उन दवाओं को बनाकर बेच रही हैं जो इनके अपने देश में विषैले प्रभावों के कारण जहर घोषित की जा चुकी है। दुनिया के अन्य देशों में कई वर्ष पहले प्रतिबन्धित की गयी दवायें हमारे देश में धड़ल्ले से बिक रही है। मौत का व्यापार करने वाली इन विदेशी कम्पनियों ने जब देखा कि विकसित देश  एक-एक करके जानलेवा जहरीली दवाइयों को प्रतिबन्धित करते चले जा रहे है, तब उनकी निगाह कई गरीब व विकासशील देशों की और। चूँकि उत्पादन बन्द करना उनके लिये आत्मघाती कदम होता, इसलिये व विकासशील देशों में उनकी गरीबी का फायदा उठाते हुये तथाकथित विकास का वहम फैलाने में सफल हो गये और खतरनाक कारखाने एक पर एक करके खोलते गये इन गरीब देशों में कानूनी बंदिशें कागजी शेर के
सिवा कुछ नहीं होती। इस बात का इन कम्पनियोंने पूरा फायदा उठाया। दिसम्बर 1984 में भोपाल में जो कुछ हुआ वह इन विदेशी कम्पनियों की करतूत का एक हिस्सा ही है। ये कम्पनियाँ लगातार भारत या अन्य विकासशील देशों में ऐसे प्रयोग करती रहती हैं जिनसे भयंकर बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
                40 से अधिक दवा बनाने वाली कम्पनियों ने वर्ष 1988 में मनमाने तरीके के  आवश्यक दवाओं के दाम बढ़ाकर करोड़ों रूप्ये का मुनाफा कमाया। उपलब्ध सरकारी आँकड़ों (दवा-रसायन मंत्रालय) के अनुसार ग्लैक्सो’    ने 37 करेाड़ रूपये, ’हेक्सट’   ने करोड़ रूपये व साइनामाइड इण्डिया’   ने 3 करोड़ रूपये का अवैधानिक मुनाफा कमाया।
                सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इससे उपभोक्ताओं के हितों को चोट पहुँचती है। अतः सरकार ने इन कम्पनियों से कमाये गये इस अवैधानिक मुनाफे को डी.पी. ई. (ड्रग प्राइस इक्वलाइजेशन) में जमा करने को कहा है। दूसरी ओर आर्गेनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल प्रोड्यूसर्स ऑफ इण्डियाजो बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की प्रतिनिधित्व करता है, ने धामकी दी है कि यदि भारत सरकार ने अपनी यह नीति नहीं बदली तो अने वाले समय में रिफामपिसिन’, ’पैरासीटामोल’ ’क्लोरोफेनिकोल’, ’इथामब्यूटोलऔर टेट्रासाइक्लीनजैसे दवाये बाजार से गायब हो जायेंगी। जिससे कुष्ठ रोग, टाइफाइड व टी. बी. आदि रोगों की रोकथाम के लिये आवश्यक दवाओं का अभाव हो जायेगा। ध्यान रहे ऊपर दी गयी दवायें इन रोगों में काम आती हैं।
1988 में अवैधानिक रूप से दवाओं के दाम बढ़ाकर जिन 10 विदेशी कम्पनियों ने 89.2 करोड़ रूपये कमाये वे निम्न है:-

1. जानवेथ 2. फाईजर  3. पार्क-डेविस 4. सैन्डोज 5. एबॉट लेबोरेटरी 6. मेरिन्ड  7. इथनोर  8. फुलफोर्ड          
9. गिफान लेबोरेटरी 10. निकोलस लेबोरेटरी

                बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारतीय कानूनों का खुला उल्लघंन करती है। भारत सरकार 15 जून 1988 को विशेष गजट नोटिफिकेशन एक्स 11018/1/88 डी.एम.एस.पी.एफ.ए. जारी किया था। इस नोटिफिकेशन के तहत इस्ट्रोजन-प्रोजेस्ट्रॉन और क्लोराम्फेनीकॉल-स्ट्रेप्टोमाइसीन के संयोग से बनने वाली दवाओं को पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित किया गया। लेकिन आज भी ये दवायें बाजर में धड़ल्ले से बिक रही है और इन्हें बेचने का काम बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कर रही है। इन घातक दवाओं के प्रयोग से महिलाओं पर बहुत ही बुरे प्रभाव पड़ते है। यदि गर्भवती महिला को ये खाने को दी जायें तो अपंग बच्च्े पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। इन दवाओं से महिलाओं के मासिक धर्म में भी गड़बड़ी पैदा होती है। ये खतरनाक दवायें-ई.पी.फोर्ट, मैस्ट्रोजन फोर्ट, ओरसेक्रोन फोर्ट तथा ओगल्यूटिन आदि नामों से बाजार में बेची जा रही है। इसी तरह 23 जुलाई 1983 में केन्द्र सरकार ने गजट नोटिफिकेशन एक्स 11014/2/83/ डी.सी.एम.एस. एण्ड पी.एफ.ए. के तहत 27 प्रकार की मूल दवाओं का व्यापार प्रतिबन्धित किया। लेकिन इनमें से कुछ दवायें आज भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बेची जा रही है। इन दवाओं को सिनेल्जेसिक, एक्रोमाइसिन, टेट्रामाइसिन, डेकाबोलिन, हिस्टाप्रेड, पेरोकॉर्ट, पेरोड्रान आदि नामों से बाजार में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है।
26 दिसम्बर 1990 तथा 1991 को कन्द्र सरकार द्वारा जारी किये गये अध्यादेशों द्वारा 15 जेनरिक दवाओं को प्रतिबन्धित किया गया लेकिन आज भी ये दवायें - ब्यूटा प्राक्सीवान, कार्ब्यटाईल, बालाजेसिक, वेगानिनफोर्टजेसिक, मोन्टोरिप, डिकेरिस, जेफराल, ल्यूपीहिस्ट, टिक्सीलिक्स, कोरेक्स, ट्रब्यूसाइन, ड्रीस्ट्रान आदि नामों से बाजार में बेची जा रही है। इससे एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितना भंयकर और जानलेवा घोटाला दवा उद्योग में चल रहा है।
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