आकाशीय पिण्ड [celestial bodies]


आकाशीय पिण्ड
[celestial bodies]

आकाशगंगा (Galaxy)



आकाशगंगा तारों एवं अन्य खगोलीय पिण्डों का एक पुंज है, विश्व में लगभग 10000 मिलियन आकाश गंगाये है. प्रत्येक आकाशगंगा में लगभग 100,000 मिलियन तारे पाए जाते है. इन तारों के अतिरिक्त गैस व धुल पाई जाती है. पृथ्वी सहित सौर परिवार ऐरावत पथ जो दुग्ध मेखला या मिल्की वे कहलाती है में स्थित है. यह सर्पिलाकार आकार में विस्तृत है. जिसका व्यास 100,000 प्रकाश वर्ष है.  इसका द्रव्यमान 2.6 x 1041 किलोग्राम है. हमारा सौरमण्डल आकाशगंगा के बाहरी छोर पर केन्द्र से 30,000 प्रकाश वर्ष की दुरी पर स्थित है. सुर्य, जिसके चारों ओर पृथ्वी सहित 8 ग्रह चक्कर लगाते है, स्वयं आकाशगंगा के केन्द्र का 287 किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से 224 X 106 वर्षों में एक चक्कर पुरा करता है. अमरीकी खगोलवेताओं ने विशालतम आकाशगंगा की खोज की है जो हमारी आकाश गंगा से 13 गुनी बड़ी है. यह पृथ्वी से 300 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है स्थित है. इसका नामकरण मारकेरियन-348 किया गया है. आकाशगंगाओं के मध्य स्थित तारों के बीच गैस एवं धुल के बादल फैले है, जो हाईड्रोजन परमाणुओं से मिलकर बने होते है. इन गैसों में पानी, अमोनिया, कार्बन मोनो ओक्साइड, मीथेन व मेथेनाल भी पाये जाते है. वृहत मैगेलेनिक मेघ, लघु मैगेलेनिक, अर्सा माइनर सिस्टम, स्कल्पटर सिस्टम, ड्रेको सिस्टम, एंड्रोमिडा, फोर्मेक्स सिस्टम, मेफिल आदि कुछ एनी उल्लेखनीय आकाश गंगाएं है.

नीहारिका (Nabulae)
यह अतिधिक प्रकाशमान पिण्ड है इसकी आकृति प्राय: सर्पिल होती है. इसकी नाभि में अत्यधिक प्रज्ज्वलनशील गैसे पाई जाती है नाभि के चारो ओर गैसपिण्ड भुजाओं की तरह परिक्रमा करते है एक अनुमान के तहत ब्रह्माण्ड में लगभग 50,000 नीहारिकाएं विद्यमान है. नीहारिका, धुल एवं गैस का एक बादल होता है. इसमें करोंड़ॊं तारे एक गुच्छे के रुप में होते है. ओरियन, केनिस विनेटिसी , लाइरा आदि नीहारिकाएँ उल्लेखनीय है. पृथ्वी से 1,600 प्रकाश वर्ष दुर स्थित नीले व हरे रंग की नीहारिका ओरियनहै. इसके केन्द्र में एक नीला तारा है, जो कि आयनीकृत हाईड्रोजन के बादलों से घिरा है. बादल इस तारे के प्रकाश को परावर्तित करते है, जिससे यह नीहारिका चमकती हुई दिखाई देती है. आरम्भ में विद्वानों ने का विचार था कि निहारिकाओं से तारों का जन्म होता है, किन्तु हबल ने 1915 में इस मत का खंडन किया तथा एंड्रोमिडा नामक निहारिका का अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट किया कि सर्पिल भुजाओं में सेफियरी चर होते है जो फैलते व सिकुड़ते रहते है. इसलिय इस स्पंदन के कारण निहारिकाओं का प्रकाश घटता व बढता रहता है.

तारे
        आकाश गंगाओं में गैस के विशाल बादलों के भीतर तारे स्थित होते है. ओरियन निहारिका में स्थित विशाल गैसीय मेघ राशि से 100,000 तारों की रचना हो सकती है. अग्नि पुंज होने के कारण तारों में निरंतर ऊर्जा व ऊष्मा पैदा होती है है और वे टिमटिमाते है. सूर्य भी एक तारा है जिसमे हाइड्रोजन के जलने पर हीलियम उत्पन्न होने से परमाणु ऊर्जा का प्रवाह विगत लगभग 400 करोड़ वर्षों से हो रहा है. तारा हीलियम एवं हाईड्रोजन गैसों के बादलों के सिकुड़ने से बनता है. तारे के कुल भार में 70% हाईड्रोजन, 28% हीलियम, 1.5% नाईट्रोजन, कार्बन, ऒक्सीजन 0.5% लौह व अन्य भारी धातुएं होती है. प्रत्येक तारे का जीवनकाल निश्चित होता है, जो तारे की चमक पर आधारित होता है. तारों में चमकने का कारण संलयन प्रक्रिया है. जिसमें 4 हाइड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक बनाते है. इस प्रक्रिया में अत्यधिक उर्जा निकलती है, जिससे तारे चमकते हुये दिखाई देते है. आकाश में कुछ तारे दो या दो से अधिक के समूह में पाए जाते है जिन्हें युग्म तारा कहते है. क्विपर के अनुसार आकाशगंगा में 83% तारे युग्मों में विद्यमान है. अक्टूबर 1986 में यूरोपीय एवं अमरीकी खगोलविदों ने आकाश गंगा में एक विचित्र युग्म तारे की खोज की है जो पृथ्वी से 20,000 प्रकाश वर्ष दूर है तथा अत्यधिक तीव्र गति से परिभ्रमण कर रहे है.

तारे का अंत
तारे स्वयं पैदा होते है, प्रकाश उत्सर्जित करते है और समाप्त हो जाते है. संलयन प्रक्रिया अनवरत चलने से तारे के क्रोड की हाइड्रोजन समाप्त हो जाती है. इसके बाद तो यह संलयन प्रक्रिया भी बंद हो जाती है. गुरुत्वाकर्षण के कारण क्रोड सिकुड़ने लगता है परन्तु बाहरी भाग में संलयन प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, जिससे बाहरी कवच के आकार में वृद्धि होने लगती है. तारा लाल रंग का एवं अपने आकार से कई गुना बड़ा दिखाई देता है. इस स्थिति में तारे को लाल दानव (RED GAINT) कहा जाता है. सुर्य 450 करोड़ वर्ष बाद इस अवस्था में आ जाएगा. पृथ्वी सहित अन्य दोनों निकटतम ग्रहों बुध एवं शुक्र को भी अपनी लपेट में ले लेगा, परिणाम स्वरुप ये तीनों ग्रह नष्ट हो जाऎंगे. तारे का अंत उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है. सुर्य के बराबर, सुर्य से कम एवं सुर्य से अधिक द्रव्यमान के तारे अलग-अलग प्रकार से अपनी अंतिम अवस्था को प्राप्त होते है.

श्वेत वामन
यह स्थिति सुर्य के समान द्रव्यमान वाले ग्रह प्राप्त करते है. लाल दानव की अवस्था के बाद बाहरी कवच फैलता हुआ लुप्त हो जाता है तथा क्रोड सिकुड़ता रहता है. इस अवस्था में क्रोड में हीलियम के अणुओं का संलयन होने लगता है. हीलियम के अणु कार्बन में बदलने लगते है. इस स्थिति में तारे का तापमान अत्यधिक हो जाता है, वह सफेद रंग का अत्यधिक चमकदार तारा बन जाता है. इस अवस्था में तारे को श्वेतवामन कहा जाता है. क्रोड के हीलियम का संलयन समाप्त होने के बाद धीरे-धीरे ठण्डा होकर दिखाई देना बंद हो जाता है.

सुपरनोवा
सुपरनोवा के रुप में नष्ट होने वाले तारे का द्रव्यमान सुर्य से कुछ गुना अधिक होता है. लाल दानव अवस्था के बाद भी हीलियम की अधिकता के कारण क्रोड का तापमान बहुत अधिक हो जाता है. हीलियम, कार्बन में संलयन प्रारंभ हो जाता है. इससे उत्पन्न अत्यधिक उर्जा के कारण तारे के बाहर का कवच एक बड़े विस्फोट के साथ नष्ट हो जाता है. इस विस्फोट को सुपरनोवा कहते है. इसके बाद क्रोड सिकुड़ता रहता है. सुपरनोवा के बाद की स्थिति में तारे के एक चम्मच प्रदार्थ का द्रव्यमान 1 अरब टन वजन के बराबर हो जाता है. इस अवस्था में यह केवल न्युट्रोन ले रुप में ही रहता है. अत: इसे न्युट्रोन तारा भी कहते है.

कृष्णविवर या ब्लेकहोल
यदि कोई तारा सुर्य के द्रव्यमान से 15 गुना अधिक बड़ा हो तो, सुपरनोवा विस्फोट के बाद भी उसका क्रोड सिकुड़ता रहता है. अंत में समस्त द्रव एक बिन्दु में ही समा जाता है. इस अवस्था में इसका घनत्व एवं गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक हो जाता है. इसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रकाश की किरणे तक अवशोषित हो जाती है. इस तारे की उपस्थिति केवल इसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से ही लगाया जाता है.

तारामण्डल
तारामण्डल  तारों का एक समुह होता है. जिनमें कुछ विशिष्ट आकृतियों में दृष्टिगोचर होते है. प्राचीनकाल में इन्हें राशियों के रूप में पौराणिक नाम दिए गये. अभी तक वैज्ञानिक ऎसे 89 तारामण्डलों की पहचान कर चुके है. इनमें हाइड्रा नामक तारामंडल विशालतम है जिसमें 68 तारे नग्न आँखों से देखे जा सकते है. सेन्टॉरस, जेमिनी, लियो, हर्कुलिस, विर्गो आदि अन्य प्रमुख तारामंडल है.

ग्रह (planets)
ग्रहों में अपना प्रकाश नहीं होता. छोटे पिण्ड होने के कारण इनके केन्द्र में अपेक्षित ताप व दाब न होने के कारण इनके भीतर नाभिकीय अभिक्रिया नहीं हो पाती . इसलिए ग्रह तारे की तरह प्रज्ज्वलित नहीं हो पाते. ये तारे से प्रकाश ग्रहण करते है तथा उसकी परिक्रमा करते है.

उपग्रह (satellites)
ये लघु आकाशीय पिण्ड किसी ग्रह की परिक्रमा करते है. ये भी प्रकाश रहित होते है तथा तारे से ही प्रकाश ग्रहण करते है.

क्वैसर [Quasars or Quasi-stellar Radio Sources]
        इन अत्यधिक प्रकाशमान पुंजो की स्थिति का ज्ञान 1962 में प्राप्त हुआ. पहले क्वैसर 3-C-273 की खोज 1960 में की गई थी. इसमें आकाश गंगा के समस्त तारों से भी अधिक प्रकाश होता है. क्वैसर तारे, रेडियों विकिरणों का स्त्रोत होते है. ये पृथ्वी से लगभग 6 से 8 प्रकाश वर्ष दुर होने के कारण एक धुंधले बिन्दु के रुप में दिखाई देते है. इनसे निकलने वाली अत्यधिक उर्जा का अनुमान इसी तथ्य से लगा सकते है कि एक क्वैसर से निकलने वाली उर्जा 1053 जूल प्रति  सैकण्ड होती है, जो दस लाख सुर्यों के बराबर होती है. 1983 में एक ऐसे ही क्वैसर का पता चला है जिसमें सूर्य की अपेक्षा 1.1 x 1015 गुना अधिक प्रकाश है.

पुच्छल तारा
इनकी रचना गैसीय पदार्थों से होती है. इनकी लम्बी पूंछ होती है. इसे पुच्छल तारा इसकी पुंछ के कारण कहते है. केपलर की मान्यता थी की पुच्छल तारे अंतरिक्ष में बाहर से प्रवेश करते हुए सौर परिवार में से गुजरकर सदा के लिए लुप्त हो जाते है.किन्तु हैली ने इस मत का खंडन करते हुए इन्हें सौर परिवार का ही सदस्य माना तथा यह बताया कि धूमकेतु निश्चित अवधि पर देखे जा सकते है. इसके केन्द्र में बर्फिले पदार्थों का एक कोर होता है. यह सुर्य के चारों और एक दीर्घ वृताकार क्षेत्र में परिक्रमा करता है. कभी वे सूर्य के निकट आते है कभी दूर चले जाते है अधिक दूर होने पर हम उनको नग्न आँखों से नहीं देख सकते है . सूर्य के निकट आने पर ही वे प्रकाशमान होते है तथा उनकी पूंछ विकसित होती है. इसकी रचना में सामान्यत: तीन मुख्य भाग होते है – (१) शीर्ष बड़ा होता है, (२) मध्य पिण्ड ठोस किन्तु लघु आकार होता है तथा (३) पूंछ सर्वाधिक लम्बी होती है. धुमकेतु का सिर हमेशा सुर्य की दिशा में तथा पुंछ विपरीत दिशा में रहती है. अनेक धूमकेतुओं का नाम उनके खोजकर्ता के नाम पर किया गया है. एन्के, द-वाइको-स्विफ्ट, टेम्पल 1, फ़ोर्ब्स, डी-अरेस्ट, फिनले, होम्स, whipple, गेल, कोमास सोला, आदि कुछ उल्लेखनीय धूमकेतु है. शताब्दी का सर्वाधिक चर्चित धूमकेतु हैली है. 11 अप्रेल 1986 में इसी तरह का एक धुमकेतु हेलीदिखाई दिया था. हैली का अध्ययन सर्वप्रथम चीनी खगोलज्ञ शजुमा शिआइन ने किया था किन्तु इसका नामकरण ब्रिटिश खगोलज्ञ हैली के नाम पर हुआ.  इसके सन 2062 में पुन: दिखने की संभावना है.

क्षुद्र ग्रह
क्षुद्र ग्रह, मंगल व बृहस्पति ग्रह की कक्षाओं के मध्य स्थित सुर्य की परिक्रमा करने वाले चटानी पिण्ड है. इनकी अनुमानित संख्या 50,000 है. इनका आकार सामान्यत: 100 से 300 किमी का होता है. अभी तक के सबसे बड़े क्षुद्र ग्रह की खोज 1801 में इटालियन वैज्ञानिक पियाजीने की थी. इस क्षुद्र ग्रह का नाम सेरेसरखा गया. इसका व्यास लगभग 1,050 किमी है. अन्य कुछ बड़े क्षुद्र ग्रह पाल्लास’, ’वेस्टा’, हीजियातथा डेविडाहै. एक क्षुद्र ग्रह चिरान’(CHIRON) है जो कि शनि व युरेनस के चक्कर लगाता है. इसकी खोज 1977 में अमरिकी वैज्ञानिक सी.टी. कोअल ने की थी.

उल्का एवं उल्कापिण्ड-
ये टूटते हुए तारे की भांति रत में दृष्टिगोचर होते है. किन्तु वास्तव में ये ठोस आकाशीय कण होते है जो पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर घर्षण के कारण जलने लगते है. घर्षण के समय ये चमकीली रेखाओं के रुप में दिखाई देते है. प्राय: ये जलने पर नष्ट हो जाते है किन्तु कभी-कभी उल्का पात के रूप में पृथ्वी पर आकर गिर जाते है तथा खंडित हो जाते है. इनकी रचना लोहे, निकिल, एलुमिनियम, ओक्सिजन, गंधक आदि भारी पदार्थो से होती है अत: भूमि पर गिरने पर यह भूकम्प तथा विशाल गर्त्त उत्पन्न करते है. इनकी गति सामान्यत: 11 से 72 किमी  प्रति सैकण्ड होती है. 
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