राजस्थान में पशुधन एवं डेयरी विकास


पशुधन एवं डेयरी विकास

राजस्थान की अर्थव्यवस्था मुख्य रुप से कृषि कार्यों एव पशुपालन पर ही निर्भर करती  है तथा कृषि के उपरान्त पशुपालन को ही जीविकापार्जन का साधन माना जा सकता है। 
  राजस्थान का पशुधन - राजस्थान के पशु-सम्पदा का विषेश रुप से आर्थिक महत्व माना गया है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का 61 प्रतिशत मरुस्थलीय प्रदेश है जहाँ जीविकोपार्जन का मुख्य साधन पशुपालन ही है। इससे राज्य की शुद्व घरेलू उत्त्पति का महत्वपूर्ण अंश प्राप्त होता है। राजस्थान में देश के पषुधन का 7 प्रतिशत था भेड़ों का 25 प्रतिशत अंश पाया जाता है।भारतीय संदर्भ में पशुधन की महत्त्व को दर्षाने के लिए नीचे कुछ आँकड़े दिए गए है जो इस प्रकार है। 

राजस्थान में देश के कुल दुग्ध उत्पादन का  अंश लगभग 10 प्रतिशत हाता हैं
राज्य के पशुओं द्वारा भार-वहन शक्ति 35 प्रतिशत है। 
भेड़ के माँस मे राजस्थान का भारत में अंश 30 प्रतिशत  है। 
ऊन में राजस्थान का भारत में अंश 40%
वर्तमान में राज्य में भेंड़ों की संख्या समस्त भारत की संख्या का लगभग 25% है। 

राजस्थान की अर्थव्यवस्था के बारे में यह कहा जाता है कि यह पूर्णत कृषि पर निर्भर करती है तथा कृषि मानसून का जुआ माना जाती है। इस स्थिति में पशुपालन का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। राजस्थान में पशुधन का महत्व निम्नलिखित तथ्यों से देखा जा सकता है। 
(1) राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान:- राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में पशुधन का योगदान लगभग 9% है। 
(2) निर्धनता उन्मूलन:- निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम में भी पशु-पालन की महत्त्व स्वीकार की गई है समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम  में गरीब परिवारों को दुधारु पशु देकर उनकी आमदनी बढ़ाने का प्रयास किया गया था। लेकिन इसके लिए चारे व पानी की उचित व्यवस्था करनी होती है तथा लाभान्वित परिवारों को बिक्री की सुविधाएं भी प्रदान करनी होती है। 
(3) रोजगार-सृजन:-  पशु-पालन में ऊँची आमदनी व रोजगार की संभावनाएँ निहित है। पशुओं की उपादक्ता को बढ़ाकर आमदनी में वृद्धि की जा सकती है। राज्य के शुष्क व अर्द्व-षुष्क भागों में कुछ परिवार (विषेशतया लघु व सीमान्त कृशक तथा खेतिहर श्रमिक) काफी संख्या में पशु-पालन करते है और इनका यह कार्य वंश-परम्परागत चलता आया है। इन क्षेत्रों में शुद्ध घरेलू उत्त्पति का ऊँचा अंश पशुपालन से सृजित होता है। इसलिए मरु अर्थव्यवस्था मूलतः पशु-आधारित है। 
  (4) डेयरी विकास:- पशुधन की सहायता से ग्रामीण दुग्ध उत्पादन को शहरी उपभोक्तओं के साथ जोड़कर शहरी क्षेत्र की दूध आवष्यकता की आपूर्ति तथा ग्रामीण क्षेत्र की आजीविका की व्यवस्था होती हे। राजस्थान देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 10 प्रतिशत उत्पादन करता है। राज्य में 1989-90 में 42 लाख टन दूध के उत्पादन हुआ जो बढ़कर 2003-04 में 80.5 लाख टन हो गया है। 
(5) परिवहन का साधन:- राजस्थान में पशुधन में भार वहन करने की अपार क्षमता है। बैल, भैंसे, ऊंट, गधे, खच्चर आदि कृषि व कई परियोजनाओं में बोझा ढोने व भार खींचने के काम करते है। देश की कुल भार वहन क्षमता का 35 प्रतिशत भाग राजस्थान के पशु वहप करते है। देश में रेल व ट्रकों द्वारा कुल 30 करोड़ टन माल की ढुलाई होती हे जबकि बैलगाडियों से आज भी 70 करोड़ टन माल ढोया जाता है। 
  (6) खाद की प्राप्ति:- पशुपालन के द्वारा कृषि के लिए खाद की प्राप्ति भी होती है। इस समय जानवरों के गोबर से निर्मित ‘‘वर्मी कम्पोस्ट’’ खाद्य अत्यधिक प्रचलन में है। 
  (7) चमड़ा एवं अन्य हड्डियों की प्राप्ति भी जानवरों से होती है। 
राजस्थान में पशुधन की संरचना:- राज्य में विभिन्न प्रकार के पशु पाए जाते है। जिनकी संख्या को नीचे वाली तालिका में दर्षाया गया है। 
2003 में विभिन्न प्रकार के पशुओं की संख्या 
गौवंश अथवा गाय-बैल  1.09 करोड़
भैंस जाति के   1.04 लाख  
भेड़ जाति के  1.00 करोड़
बकरी-जाति के  1.68 करोड़
शेश ऊँट, घोडै़, गधे, सूअर आदि   0.10 करोड़ (अथवा 10 लाख)

इस प्रकार संख्या की दृष्टि से पशुओं में गाय-बैल तथा भेड़-बकरी प्रमुख है राजस्थान में उपलब्ध विभिन्न जानवरों जैसे गाय, बकरी, भेंड आदि का वर्णन निम्नलिखित है। 

1. राजस्थान में गाय:-  गाय पशुपालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। तथा इसकी निम्नलिखित नस्ले राजस्थान मे पाई जाती है । कुल पशु-सम्पदा में गौ-वंश का 22.8 प्रतिशत है।

नागौरी
इसका उत्त्पति क्षेत्र ‘‘सुहालक’’ प्रदेश नागौर है। 
इस किस्म के बैल अधिकतर जोधपुर, नागौर तथा नागौर से लगने वाले पड़ौसी जिलों में पाये जाते हैं।
इस नस्ल की गायें कम दूध देती है। 

कांकरेज
राजस्थान के दक्षिण-पष्चिमी भागों बाड़मेर, सिरोही तथा जालौर जिलों में पाई जाती है। 
इस नस्ल की गायें प्रतिदिन 5 से 10 लीटर दूध देती है। 
इस नस्ल के बैल भी अच्छे भार वाहक होते हैं। अतः इसी कारण इस नस्ल के गौ-वंश को ‘‘द्वि-परियोजनीय नस्ल’’ कहते है। 

थारपारकर
इसका उत्त्पति स्थल मालाणी (बाड़मेर) है। यह गायें अत्यधिक दूध के लिए प्रसिद्ध है,
इसे स्थानीय भागों में ‘‘मालाणी नस्ल’’ के नाम से जाना जाता है।

राठी
यह राजस्थान कें उत्तर-पष्चिमी भागों में श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर में पायी जाती है।
इस नस्ल की गायें अत्यधिक दूध के लिए प्रसिद्ध है, किन्तु इस नस्ल के  बैलों में भार वहन क्षमता कम होती है। 

गिर
यह गुजरात के सौराष्ट्र के गिर बन में रहने वाले पशु है।
यह पशु दक्षिणी-पूर्वी भाग (अजमेर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, कोटा आदि जिलों) में सर्वाधिक पाये जाते हैं। 

2.  भेंड़:- देश की कुल भेंडों की लगभग 25 प्रतिशत राजस्थान में पाई जाती हें राज्य के लगभग 2 लाख परिवार पशुपालन कार्यों में संलग्न है। 

 भेंड की प्रमुख नस्ले इस प्रकार है। 
1.  जैसलमेरी:- यह जैसलमेर में पाई जाती है। 
2.  नाली:- हनुमानगढ़, चूरु, बीकानेर था झुँझुनू जिलों में पाई जाती है। ये अधिक ऊन के लिए प्रसिद्ध है। 
3.  मालपुरी:- इसे ‘‘देषी नस्ल’’ भी कहा जाता है।  यह  जयपुर, दौसा, टोंक, करौली तथा सवाई माधोपुर जिला में पाई जाती है। 
4.  मगरा:- यह प्रतिवर्ष औसतन 2 किलोग्राम ऊन देती है।   इस नस्ल की भेड़ अधिकांशतः जैसलमेर, बीकानेर, चूरु, नागौर आदि मे ं पायी जाती है। 
5.  पूगल:-इनका उत्त्पति स्थान बीकानेर की तहसील ‘‘पूगल’’ होने के कारण इस का नाम पूगल हो गया। 
6.  मारवाड़ी नस्ल  :- राजस्थान की कुल भेड़ों में सर्वाधिक भेड़ें मारवाड़ी नस्ल (लगभग 45 प्रतिशत) की है।   ये राजस्थान में सर्वाधिक जोधपुर, बाड़मेर, पाली, दौसा, जयपुर आदि जिलों में पाई जाती है। 
7.  चोकला या शेखावाटी:- इसे भारत की मेरिनो भी कहा जाता है।  यह सबसे उत्तम किस्म की ऊन देने वाली नस्ल है। यह प्रतिवर्ष 1 से 1.5 किलो तक ऊन देती है। 
8.  सोनाडी :-राजस्थान में बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर जिलों में पाई जाती है। जब यह भेड़ जमीन पर घास चरती है तो इसके कान जमीन को स्पर्ष करते है। 

पशुधन विकास की समस्याऐं:
1.  मानसून की अनिष्चिता: राजस्थान में प्राय सूखे की समस्याऐं रहती है। इसी वजह से पशुओं की पर्याप्त मात्रा में चारा उपलब्ध नहीं हो पाता। 
2.  योजना एवं समन्वय का अभाव:- सरकार अभी तक इस क्षेत्र के विकास के लिए एक सम्पूर्ण योजना का खाका तैयार नहीं कर पायी है। तथा समन्वय का अभाव देखा गया है। 
3.  पशु स्वास्थ्य योजना: अक्सर देखा जाता है कि किसी एक बीमारी के कारण सभी पशु उसकी चपेट में आ जाते है। इस स्थिति को समाप्त करने के लिए योजना एवं
सुविधाओं का अभाव देखा गया है। 
4.  पशु आधारित उद्योगों की कमी:- राजस्थान में ऊन, दूध तथा चमड़ा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है परन्तु इन पर आधारित उद्योगों की राजस्थान में कमी होने से दूध, चमड़ा दूसरे राज्यों या में निर्यात कर देने से राज्य को पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता है।

पशुधन विकास हेतु समाधान: 

1.  ‘‘गोपाल’’ कार्यक्रम:- यह कार्यक्रम 1990-91 में चालू किया गया था। इस गैर-सरकारी संगठन अथवा गांव के षिक्षित युवक (गोपाल) को उचित प्रषिक्षण देकर उसकी सेवाओं का उपयोग किया जाता है। इसमें विदेषी नस्ल का उपयोग बढ़ाने के लिए गोपाल को क्रॉस प्रजनन के लिए कृत्रिम गर्भाधान की विधि का प्रषिक्षण दिया जाता है। एक क्षेत्र के बेकार साडों को पूर्णतः बधिया दिया जाता है। पशु-पालकों को इस बात का प्रषिक्षण दिया जाता है कि वे अपने पशुओं को स्टॉल पर किस प्रकार खिलावें और सदैव बाहर चरने की विधि पर आश्रित न हों।

2.  भेड़ प्रजनन कार्यक्रम :- राज्य में ऊन व मांस के उत्पादन में गुणात्मक व मात्रात्मक सुधार करने के लिए भेड़ प्रजनन कार्य में सुधार के व्यापक प्रयास किए गए है। क्रॉस-प्रजनन कार्यक्रम नाली, चोकला, सोनाड़ी व मालपुरा नस्लों पर लागू किया गया है। इसमें कृत्रिम गर्भाधान के जरिए भेड़ों की नस्ल सुधारी जाती है। इसके अलावा चयनित प्रजनन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। 

3.  विपणन व्यवस्था:- पशुपालकों को उनके उत्पादन का उचित मूल्य प्राप्त हो, इसके लिए एक तरफ पशुओं के क्रय-विक्रय हेतु पशु मेला लगाये जाते है। दूसरी तरफ दूध को बिना मध्यस्थों के सीधा उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की स्थापना की गयी है। राज्य में पशु मेलों का आयोजन ग्राम पंचायत, नगरपालिका एवं पंचायत समितियों के माध्यम से किये जाते है। राज्य में वर्तमान में 50 पशु मेले लगते है जिनमे ं 10 मेले राज्य स्तरीय प्रसिद्ध पशु मेलें, पशुपालन विभाग द्वारा आयोजित किये जाते है। 

4.  पशु चिकित्सा:- राज्य में पशुओं की बीमारियों से रक्षा एवं रोकथाम के लिये नये चिकित्सालय खोले गये है। जहाँ 1951 में 147 चिकित्सालय थे। 2001-02 में राज्य में 12 पशु क्लिनिक्स, 22 प्रथम ग्रेड के पशु चिकित्सालय, 1386 पशु चिकित्सालय, 285 पशु औशधालय तथा 1720 उपकेन्द्र कार्यरत है। इसके अलावा 34 जिला रोगप्रयोगषालाएँ राज्य में कार्यरत है। पशुपालकों को उनके घर पर ही पशु चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने हेतु उपखण्ड स्तर पर 8 चल पशु चिकित्सा इकाइयाँ गठित करने की योजना बनाई है। 

5.  एकीकृत पशु विकास कार्यक्रम:- 8 वीं योजना के प्रारम्भ में यह जयपुर एवं बीकानेरसंभाग में चालू किय गया था, परन्तु वर्तमान में यह कार्यक्रम प्रदेश के कोटा, जयपुर, बीकानेर, अजमेर, उदयपुर संभागों के 21 जिलों में लागू हैं जहां 749 उपकेन्द्र स्थापित किये गये है। इस योजना में पशुओं के स्वास्थ्य के अतिरिक्त कृत्रिम गर्भाधान, बेकार पशुओं का बन्ध्याकरण तथा उन्नत किस्म के चारे के बीजों का वितरण का उद्देष्य शामिल है।

6.  पशुपालन व अनुसंधान:- राज्य में द्वितीय पंचवर्षीय योजना में दो पशु चिकित्सा महाविद्यालय बीकानेर तथा जयपुर में स्थापित किये गये है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिशद् ने बीकानेर एवं सूरतगढ़ में भेड़ अनुसंधान केन्द्र स्थापित किये हैं। जोधपुर मेंऊन एवं भेड़ प्रषिक्षण स्कूल स्थापित किया गया है। विष्व बैंक की सहायता से जामडोली में पशु चिकित्सकों एवं अधिकारियों को विषेश तकनीकी प्रषिक्षण हेतु राजस्थान पशु-धन प्रबंध संस्थान का भवन निर्माण कार्य करवाया है। 

7.  राज्य में डेयरी विकास कार्यक्रम:- डेयरी या दुग्ध विकास नीति के अन्तर्गत राजस्थान सहकारी डेयरी फैडरेशन  अमूल के नमूने पर राष्ट्रीय डेयरी विकास के सहयोग से राज्य में डेयरी कार्यक्रम संचालित कर रहा है। डेयरी फैडरेशन उपभोक्ताओं को उत्तम किस्म का दूध तथा दूध से बने पदार्थ उपलब्ध कराने में संलग्न है। यह पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति सुधार, पशु आहार की सुविधा तथा दुग्ध उत्पादको को उचित मूल्य दिलवाने का भी प्रयास कर रहा है। वर्तमान मे दूध-संकलन का कार्य 16 जिला डेयरी संघों के द्वारा संचालित किया जा रहा है जिनकी क्षमता क्रमषः 9 लाख लीटर से बढ़कर 14.30 लाख लीटर प्रतिदिन कर दी गयी है। गहन डेयरी विकास कार्यक्रम राज्य के सभी 30 जिलों में चलाया जा रहा है। इस कार्य मे 16 दूग्ध उत्पादक संघों का सहयोग भी प्राप्त हो रहा है। 2006-07 में दिसम्बर 2006 तक डेयरी फैडरेशन का औसत दुग्ध संग्रहण 13.49 लाख किलोग्राम प्रतिदिन रहा था तथा इसके दूध की बिक्री प्रतिदिन औसतन 12.01 लाख लीटर की थी। 
       राज्य में मार्च, 2006 के अन्त में कार्यषील दुग्ध उत्पादक प्राथमिक सहकारी समितियों की संख्या 8874 हो गई और इनमें जिला दुग्ध संघों की संख्या 16 हो गई है। सहकारी समितियों के विकास के फलस्वरुप दुग्ध उत्पादकों को काफी लाभ पहुंचा। दुग्ध उत्पादन को विपणन के साथ जोड़ा जाने से दुग्ध उत्पादकों को उचित मूल्य मिल पाया है और मध्यस्थ वर्ग के शोशण से मुक्ति मिली हैं। डेयरी फैडरेशन के अधीन 4 पशु आहार संयंत्र कार्यरत है। जिनमे ं पशु-आहार का उत्पादन कर उसका विपणन किया जाता है।
       राजस्थान में डेयरी के विकास में ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी व रोजगार में वृद्धि हुई है। लघु व सीमान्त कृशकों तथा भूमिहीन श्रमिकों को आर्थिक लाभ पहुँचा है। समाज के निर्धन वर्ग को लाभ हुआ है, मानवीय खुराक में प्रोटीन की मात्रा बढ़ी है तथा बायो-गैस के माध्यम से ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत का विकास हुआ है। शहरी क्षेत्रों में दूध व दूध से बने पदार्थों की बढ़ी हुई मांग की पूर्ति करने में मदद मिली हैं, जो अन्यथा कठिन थी।  डेयरी विकास पर टेक्नोलोजी मिशन- भारत सरकार ने डेयरी विकास पर टेक्नोलोजी मिशन प्रारम्भ किया है, इसके लिए निम्न उद्देष्य है:- 
1.  उत्पादकता बढ़ाने व लागत घटाने के लिए आधुनिक टेक्नोलोजी को अपनाकर ग्रामीण रोजगार व आमदनी में वृद्धि करना,
2.  दूध व दूध से बनी वस्तुओं की उपलब्धि को बढ़ाना ।  


स्रोत : माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान - राजस्थान अध्ययन
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